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Showing posts from October, 2018

धुआँ धुआँ।

सबके घर में दीप जलेंगे मेरे घर अँधियारा होगा। इस दो रंगी नीति से आखिर कब छुटकारा होगा।। उनके घर में फुटे फटाखे मेरे घर पर धुआँ धुआँ। उनके बच्चों की किलकारी मेरे बच्चे हुआँ हुआँ।। कैसी यह नीति कैसा रिवाज है यह। बिन पेंदी के टहरी सा समाज है यह।। एबीसीडी का ज्ञान नहीं पर हुकूमत छाँट रहे। एम.ए.,पी.एच. डी.करके खाली हाँड़ी झाँक रहे।। लगातार वर्षों से ये मुफ्त में ज्ञान को बाँट रहे। उम्मीदों की देहली पर ही जीवन अपना काट रहे।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 उन सभी वित्तरहित कर्मियों को जो कि विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों में कार्यरत्त रहकर अपने जीवन को सरकार या प्रबंधन या फिर तथाकथित अहितकारी कर्मचारी संघ के मनमाने पन के शिकार हो रहे हैं, को आनेवाली दीपावली की बहुत बहुत बधाई,शुभकामनाएं।                       आपका ही एक शोषित मित्र। 💐💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐💐

सतत् षड्यंत्र।

अँगुष्ठा से कनिष्ठा तक हस्तपादात् एकीकृत नहीं अँगुलियाँ तो फिर किस बूते करते हैं हम एका की बात? स्वरूप भिन्न आकार अलग प्रकार बहुतेरे खान पान असन बसन तन मन धन चिन्तन मनन धारणा अवधारणा कुछ भी तो मेल नहीं खाती सिर्फ पुरखों की थाती वही संझा वही पराती कुछ आत्मसाती कुछ आत्मघाती फिर भी कहते सब एकता हमारा मूलमंत्र है भले मन में चल रहा सतत षड्यंत्र है।। 💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐💐

किसको नमन करूँ।

किसको नमन करूँ मैं इस चाँद को या उस चाँद को इसकी तो न जाति है नहीं है कोई मजहब। एक वो भी है चाँद जिसकी तो जाति भी  है और है एक जमात  भी सफेदपोश तो दोनों हैं पर इसकी सफेदी रास का कारक और उसकी त्रास का इसे पाने की चाहत उसके जाने से राहत पूजित भी दोनों है यह हर दिन पर वह एक दिन इसे देखने को नकाब उतर जाता है उससे मिलने को नकाब जरूरी है इसकी हर रात मुबारक उसकी तो बस ईद मुबारक।। हैं तो दोनो ही चाँद! आखिर किसको नमन करूँ मैं?                      💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐

एक नया खेल।

हर साल एक नया खेल हुजूम रेलमपेल न आगे न पीछे चतुर्दिक ठेलमठेल एक ही राग सुर भी एक पर ताल अलग अलग कभी पूरब कभी पश्चिम कभी उत्तर कभी दक्षिण पल में उदय पल मे क्षीण आलाप बस वही एक हम एक बनेंगे हम नेक बनेंगे पर करेंगे वही जो पुरखों से मिला है विरासत में आखिर खानदानी हैं हम ज्वलनशीलता हमारा धर्म है भले जननशीलता की कमी है पर जीभ तो ऊपर वाले की दया से तेज है न गरुड़ का सवार हूँ गुरूर तो रहेगा दादा की पगड़ी का शुरूर भी रहेगा भले आज मुँह पोंछने को गमछा नहीं।। 💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐💐

प्रमाद।

रोते हुये आना और रुलाकर चले जाना। फिर भी सुख के लिये निरंतर ताना बाना।। प्रतिक्षण संघर्ष प्राप्ति उत्कर्ष या अपकर्ष। हर्ष या विषाद से भी मिलता सिर्फ अवसाद।। कोशिश करते हैं पर कामयाब नहीं हो पाते। घेरे हैं चतुर्दिक केवल प्रमाद केवल प्रमाद।। 💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐 💐💐💐💐 💐💐💐 💐💐 💐      💐💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐

कल्पना से परे।

आश्चर्य है पहले रावण को बनाना फिर मिटाना स्वयम् अपने ही हाँथों क्यों न हम कल्पना से परे हों रावण के बनाने की! 💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐                        💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐

रावण वध।

विजयादशमी को हर साल डर लगता है जब देखता हूँ जलते हुये रावण को सोंचता हूँ आखिर कब तक इस तरह जलता रहेगा रावण हर साल? गर मानू इतिहास को तो आज से हजारों वर्ष पूर्व राम ने मारा था लंका में रावण को जलाया भी था। फिर तब से अब तक हर वर्ष वह कैसे जिन्दा हो जाता है मरने को जलने को राम के हाँथों? पुतले के रूप में एक दिन हम भी रावण की तरह ही जला दिये जायेंगे किसी राम के हाँथों महाश्मशान में। क्या उसी रावण की तरह हर साल फिर जिन्दा होंगे जलने को किसी राम के हाँथ से? नहीं!नहीं न! क्यों? क्योंकि सच कुछ और है यह तो मनोरंजन का दौर है। न रावण कल मरा था न आज मरा है और न कल मरेगा अगरचे मर गया रावण तो सीता हरण कौन करेगा?                          इसीलिये तो पुतले को ही जलाना है पर रावण को बचाना है सीता हरण की परंपरा को जो निभाना है।।                        💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐

अंतर्द्वंद्व।

जब भी तुझे देखता हूँ मन करता है देखता रहूँ समझ नहीं पाता यह प्रेम है या है ये वासना गर है यह प्रेम तो चाहिए प्रतिदान मुझको वासना है गर कहीं तो पाने की ललक दोनो के बीच द्वंद्व कपाट बंद खोल नहीं पाता उलझ जाता हूँ इस अनबूझ अंतर्द्वंद में प्रेम की गली अतिसांकरी वासना निर्भय स्वच्छंद। पा लिया तो आनंद नहीं मिले तो परमानंद।।                            💐💐मनोज💐💐

गुजरात ।

दो वक्त की रोटी तन पे वसन नींद आये चैन से हर रात यही सोंचकर हम तो गये थे गुजरात हमें क्या पता था जी तोड़ मिहनत के बदले मिलेगा सिर्फ जूता और लात।।

पिरो जाता हूँ।

लोगोँ ने मुझे टूटा हुआ समझकर नजरें मोड़ ली अपनी पर उन्हें कहाँ पता कि मैं वो नहीं हूँ जो टूटकर बिखर भले जाऊँ पर वक्त मिलते ही धागे में पिरो जाता हूँ। 💐💐@ मनोज.com 💐💐

हा!मुझे माता कहता है?

हा! मुझे माता कहता है धिक्कार है तुझको तूने जहाँ से जन्म लिया तू जिसकी गोद में पला तूने जिसके स्वेद से अपनी प्यास बुझाई तूने जिसका रक्त पान किया आज उसे ही रौंद रहा है जड़ को ही काट डालना चाहता है धिक्कार है तुझे धिक्कार है मुझे आखिर मैंने तूझ जैसे दानव को पैदा ही क्यों होने दिया कोख में ही तेरी जीवन लीला खतम कर देनी चाहिए थी मुझे पुत्रहंता का कलंक लगता यही न! लेकिन आज एक माँ कलंकित होने से तो बच जाती धिक्कार है तुझे तू जीकर भी क्या करेगा तू तो जीते जी ही मरेगा जिसने न माँ को पहचाना न बहन को जाना न ही बेटियों की मुस्कुराहटों को पहचान पाया धिक्कार है तेरी मर्दानगी को जिसने एक नारी को सिर्फ भोग्या समझा अरे पता भी है तुझे दुर्गा भी एक नारी थी जिसने रक्तबीज का समूल विनाश किया तू नहीं जानता? ये वही देश है जहाँ नार्यस्तु यत्र पुज्यंते रमन्ते तत्र देवता का उद्घोष होता है नित्य दशहरा हो या दिवाली या कि होली नारियां ही पूजी जाती हैं वह नारी ही होती है जो डोली में बैठ अपना अतीत भूल तुझको अपना सर्वस्व समर्पि...

नमामि गंगे।

करता हूँ मैं नमन तुम्हारी माँ गंगे स्वीकार करो उद्धार किया है सगर तनय का मेरा बेड़ा पार करो।। शिव की जटा से बहनेवाली विष्णुचरण में वास किया दीन दुखी पापी प्राणी.हो सबका बेड़ा पार किया।। पान किया अनुपान किया स्पर्श किया स्नान किया नाम लिया फिर तर गये चाहे श्रद्धा का ही दान दिया।। भूलोक नही है भुवर्लोक तक महिमा तेरी न्यारी गाते हैं सब ऋषिगण मिलकर मैं जाऊँ तेरी बलिहारी।। अवतरण दिवस तेरा है माता बलि बलि जाऊँ हे जगत्राता तर जाता है भवसागर से सानिध्य तेरा जो पाता।। सुन ले पुकार कर क्षमादान हूँ सुत तेरा नादान पुत्र कुपुत्र भले हो जग में माता होती सदा महान।।                             🎂🎂नमामि गंगे🎂🎂                              💐💐मनोज💐💐

जार बेजार।

जब भी होता है व्यभिचार हम कहते हैँ मार मार पर कभी भी इस बिन्दु पर आपस में बैठकर नहीं करते कोई ठोस विचार आज जहानाबाद कल धनवाद परसों इलाहाबाद हर दिन कहीं न कहीं हमारी ही बेटी होती है बरबाद ऐसे नहीं चलेगा अब करना होगा शंखनाद नहीं तो होती रहेगी शैतानियत आबाद ये किसी जात या जमात के नहीं होते इनका न कोई धर्म है न ईमान है इनकी आत्मा भी बेजान है इंसानियत हो रही है तार तार दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती सब रो रही हैं जार बेजार।                                         💐💐मनोज💐💐

वह बेचारी ।

वह बेचारी तड़प रही थी अकेली सुनसान सड़क पर भीख मांगती अपने आबरू की एक दो नहीं सात सात दरिंदे जिनके शायद न बेटियां थीं न बहने नोच रहे थे गिद्ध की तरह कतरे कतरे मांस के और मैं कुछ दोस्तों संग मोबाइल से सूट कर रहा था दृश्य लुटती अश्मत का अपनी बहन और बेटी के ।                                    💐💐मनोज💐💐

मैं तो एक विवश मजदूर हूँ।

आज मजदूर दिवस है लेकिन वह बेचारा आज भी विवश है। साहब के घर शाम को कुछ मेहमान आनेवाले हैं आई.ए.एस.,आई.पी.एस. मुखिया,विधायक,सांसद मंत्री से संतरी तक सब मिलकर जश्न मनानेवाले हैँ आज महकमें के सारे कार्यालय में छुट्टी है सचिवालय के पासवाले दुकान की ठंढी हो रही लिट्टी है बेचारा बुधना लगाये आश बैठा है उदास मैं क्या मैं तो एक मजदूर हूँ अपनी आदत से मजबूर हूँ पेट की आग जब सुबह धधकती है भूल जाता सारे दस्तूर हूँ आज भी कुछ ऐसा ही हुआ साहब के घर आने को मजबूर हूँ क्या करूँ आखिर मैं तो एक विवश मजदूर हूँ।                             सभी सरकारी सहकारी एवं                                   गैर सरकारी मजदूर                                       भाईयों को                                            नमन                                     💐💐मनोज💐💐

जब भी तुझे देखता हूँ।

जब भी तुझे देखता हूं तुझमें अपना अक्स ढूंढता हूँ कभी हंसना कभी रोना कभी रूठना कभी मचलना कभी कभी हठ कर बैठना बाबूजी की डांट मां की ममता दादाजी जी की प्यार भरी घुट्टी सारी शैतानियों की पलभर में कर देती छुट्टी फिर क्या वही मस्ती का आलम  ना दोस्ती ना दुश्मनी कौन अपना कौन पराया जिसने हाथ बढ़ाया उसने मेरे प्यार का बोसा पाया कहाँ गये वो दिन कोई तो लौटा दे वो पलछिन काश एक बार फिर से देख पाता निश्छल निर्विकार निश्चेष्ट उन सुनहरे पलों को जी पाता निश्चिंत भाव से।                                         💐💐मनोज💐💐

सपट बयानी।

हम लिख ही पढ़ ही बढिया बात सोंच ही सबसे बोल ही बतिया ही अपन मन के बात। तोरा एकरा ला चीढ़ काहे बर हौ ई तो ईशवरीय देन हे बघुआ के मत देख। हमर बात तोरा समझ में न आवे त कुड़कुड़ाये से का होयतो मथवा तोरे न पिरैतो। तोहर समझदानी हौ छोटा त अंटतो कहाँ से हमर बात मोटा। हम जे कह ही सीधा सरपट न रखी मन में छल कोई कपट। जेकरा जे कहेला होव हे सामने से कह ही सुनेला उत्तर बाट भी जोह ही। तू एकरा समझल कर नाली के पानी रोक न पयब हमर सपट बयानी।                                  💐💐मनोज💐💐

सीता अब बचतो कैसे।

राम के भेस में रावण घूम रहलो हे सीता अब बचतो कैसे ई देश में। बेचारा लक्षमण केतना खींचत रेखा विभीषण के हांथ भी मिलल ई केस मे। हनुमान भी लग हे हो गेलन पंगु न जानि केतनन अभी आउ हथ रेस में।                                       💐💐मनोज💐💐

महाभारत।

महाभारत के पात्रों का पुनर्जन्म धृतराष्ट्र अंधा हो चुका गांधारी की आंखों पर काली पट्टी दुर्योधन का अत्याचार मामा शकुनी के चौपड़ की बिसात दुःशासन के हांथों हो रहा बेचारी द्रौपदी का बलात्कार विदुर युधिष्ठिर भीम अर्जुन नकुल सहदेव कुंती सभासद सभी हो गये लाचार कृष्ण भी हैं मौन आखिर द्रौपदी की लाज बचायेगा कौन?                                     💐💐मनोज💐💐

लुतरी लगा के।

का मिललो तोरा ई लुतरी लगा के झुठो झुठो सबके अपने में उलझा के। रांड़ी बेटमारी भतरमारी करा के तुहूं बैठल हमहूं बैठली सभे बैठ गेलन ठंढा के।। बकि का कहियो तोरा तू तो ह थेथर न केकरो कहल सुनब न मानब समझावल। लछ्छन हौ बिगड़ल खूने में हो खराबी जरे के जरजरायके आऊ बैठल बैठल बघुआयके अभियो तो समझ सबके समझावल। आखिर का मिललो तोरा लुतरी लगा के।                                      💐💐मनोज💐💐

मैं कुछ भी करूँगा।

कुर्सी के लिए मैं कुछ भी करूँगा दे दो चाहे फांसी मैं नहीं मरूंगा।। देश भले जाये रसातल में मैं तो भूतल पर ही रहूँगा।।                                  💐💐मनोज💐💐                                             🎂

गीता में कर्मयोग।

गीता में कर्मयोग .......................               भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग की स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की है।अपनी मनोवैज्ञानिक शैली में अर्जुन को संबोधित करते हूए भगवान ने कहा है कि लक्ष्य को ऊंचा रखते हुए भी यथाशक्ति प्रयत्न करने के उपरान्त भी सफलता पूर्णतया सुनिश्चित नहीं होती।परिस्थितियां भी अपना काम करती हैं।कई बार ऐसे परिणाम भी सामने आते हैं जहाँ प्रयास भी असफलता के निकट जा पहुंचता है।ऐसी घटनाओं से कर्मयोगी को गहरा आघात लग सकता है।वह हताशा की स्थिति को प्राप्त हो साहस और प्रयास भी गंवा सकता है।ऐसी स्थिति से उबरने का संकेत देते हुए भगवान ने कहा है कि श्रेष्ठ कर्म करने भर को संतोष,गौरव और उल्लास एवं श्रेय का केन्द्र बिन्दु मान लिया जाए।अपने किये गये श्रेष्ठ कर्म को अपनी महानता एवं साहसिकता की सफल अभिव्यंजना मान कर्मफल को गौण समझा जाए।भौतिक सफलता या असफलता का मुल्यांकन तो दूसरे लोग करते हैं। अपना मूल्यांकन और अपनी सफलता उस शुभारंभ के साथ ही उपलब्ध कर लिया जाना चाहिए।श्रेष्ठ कर्म करने की दिशा में कदम उठाते आम तौर पर लोभ एवं मोह से ग्रस्त लोग कतराते...

क्यूँ जोहते हो बाट।

क्यूं जोहते हो किसी की बाट किसे दिखलाते हो अपनी शानो शौकत और ठाट पता है एक दिन जब पहुंचोगे घाट! कुछ भी नहीं होगा तुम्हारे हाथ असन वसन न तन न मन होगी सिर्फ तुम्हारी यादें शेष तुम्हारे कृत्य के रूप में।                                💐💐मनोज💐💐                                            🎂

काम करो कुछ काम करो।

काम करो कुछ काम करो जग में रहकर कुछ नाम करो यूं हीं न किसी को बदनाम करो अपने कृत्यों पर ध्यान धरो न उनकी तुम परवाह करो रवि शशि पवन वरुण रहते हैं सब सदा मगन प्रात सान्ध्य है आना जाना मध्याह्न कहाँ देता ताना विचार करो व्यवहार धरो मत बून निरर्थक ताना बाना। जग में अमरत्व तुझे मिल जाएगा स्वर्ग धरा पर तू तब लायेगा। बस ध्यान धरो सुज्ञान वरो कर त्याग मिथ्याभिमान तू आराध्यदेव को नमन करो।।                                      💐💐मनोज💐💐                                                  🎂

मानवीय मूल्यों के आधार भगवान राम।

मानवीय मुल्यों के आधार           भगवान राम ************ रामनवमी का पावन त्योहार बड़े ही धूमधाम से संपन्न हूआ।बड़े बड़े समूह में बड़ी बड़ी पताकाओं ,ढोल ,नगाड़े,बैंड बाजे ,तलवार ,भाले,कहीं कहीं अत्याधुनिक शस्त्रों संग आम अवाम ने खूब मस्ती की।हम मंदिर वहीं बनायेंगे के कर्ण कटु स्वर से सम्पूर्ण वातावरण गुंजायमान होता रहा।गली कूचों से लेकर चौक चौराहों और राजमार्ग तक जनसैलाव दीखा।जिसे देखा भगवा पगड़ी में भगवे ड्रेस पहने पूरे जोशो खरोश से जय श्रीराम के गगनभेदी नारों में मशगूल दिखा।कई संगठनों ने भी इनकी अगवानी में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया।अहले शुबह से देर रात तक सम्पूर्ण देश ने इसी प्रकार अपनी उपस्थिति प्रदर्शित की। एकता अखंडता के बड़े बड़े नारे भी जहाँ तहां बड़े बड़े बैनर पोस्टर की शक्ल में दिखे।पर एक प्रश्न इन सबको देखने के बाद पूरी रात परेशान करता रहा।क्या राम का आदर्श यही था?हम जिसे मर्यादा पुरुषोत्त्तम की संज्ञा से अभिहित करते हैं उसने ऐसी ही मर्यादा का पाठ पढ़ाया है।?              राम आदर्श हैँ शांति के,मर्यादा के,सामाजिक समरसता के,।त्याग के आत्म बलिदान के,सादगी के,मातृपितृ भक्ति के,गुरु के प्...

चुनाव लड़ना चाहता हूँ।

चुनाव लड़ना चाहता हूं! ****************** हाँ मै चुनाव लड़ना चाहता हूँ पर क्या करूँ कैसे कहूँ कुछ समझ में नहीं आता न कोई समझता है न समझा पाता झूठ से मुझे सख्त नफरत है सच बोलना नहीं आता जुमलेबाजी सीखी नहीं लूट खसोट की कला में महारत हासिल नहीं किया आज तक एक चींटी को तो मार नहीं पाया मैं आदमी को क्या खाक मारूंगा अपनी मुंह अपनी बात भला मेरी क्या बिसात अपनो से कभी लड़ा नहीं गैरों को फिर लड़ाऊं कैसे न दाढ़ी है न हूँ खद्दरधारी एक है बस ईमानदारी न गले में मफलर है न भगवाधारी हूँ न सम्प्रदाय का पोषक हूँ न जातिवाद का तोषक हूँ घर में दौलत है नहीं ना ही पैसे की लाचारी है हां शादी तो की है मैंने पर बाल ब्रह्भचारी हूँ जेल यात्रा हुई नहीं न ही हत्या चोरी या व्यभिचार अभिसार किया इन्हीं सोचों ने मुझको लाचार किया मन में उम्मीदों को पाला है क्योंकि चुनाव का मौसम जल्द ही आनेवाला है होगी टिकटों की मारामारी सोंचा पहले से कर लूँ चुनाव लड़ने की तैयारी क्या पता किस्मत साथ दे दे।                               💐💐मनोज💐💐

यत्र नार्यस्तु पुज्यंते।

नारी सत्ता पर आए दिनो आघात की खबरों से लवरेज अखवारों के पन्नों को देखकर ऐसा लगता है मानो हमने अपने आपको पूरी तरह से तंगोतबाह करने का मन बना लिया है।हम यूं कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह तंगोतबाही सिर्फ हमारी नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति की होगी।क्योंकि हम जिस नारी शक्ति को तंगोतबाह करने पर तुले हैं वही हमारा उद्गम स्थल है।हम उसके जिन शारीरिक अंगों उर्द्ध्वाधःको अपना शिकार बनाते हैं हम शायद यह भूल जाते हैं कि वही अध्वांग जहाँ हमारा उद्गम स्थल है वहीं वह उर्द्धवांग हमारा पालक है।और हम क्षणिक पिपासा की भंगुर शांति हेतु अपनी ही इन जीवनदायिनी महायंत्रों को भग्न करने पर तुले हैं। आज किसी की यही बिटिया कल किसी की बहु बनकर एक नई सृष्टि की रचना में संलग्न होगी। एक बिटिया का नाश मतलब एक पूरी पीढ़ी का सर्वनाश।हम पढ़े लिखे वा मूर्ख चपाट सब प्रकृति प्रदत्त इन गुणों से परिचित हैं फिर भी ऐसे दुर्नीतिपूर्ण कृत्य से अपने आपको अलग नहीं रख पाते।और तो और संत का लवादा ओढ़कर भी सिर्फ तन के लिबास ही बदलते हैं मन वहीँ अनीतिपूर्ण विचारों वाले सरोवर में गोते लगाता रहता है,तभी तो आशाराम या रामरहीम अवतर...

भग्न विग्रह।

आज एक पेड़ के नीचे भग्न विग्रह को देखा उस पर न चंदन न फूल न ही प्रसाद के कण समझ गया टूट जाने के बाद जब लोग भगवान को भी भूल जाते हैं फिर हमारी बिसात ही क्या?                                 💐💐मनोज💐💐

बलात्कार।

ए बाबु ई तो बहुते बढ़िया सरकार हे जेकर राज में रोज होईत बलात्कार हे लाचार बेबस पति आउ बाप बेचारा बनल पेड़ से बंधल अप्पन आँखे देखैत सब अत्याचार हे सब देखैत सुनैत हथ सब कोई तैयो बड़ी जोश में कह हथ इहाँ तो सुशासन बरकरार हे जब भी घट हे ऐसन कोई घटना शुरु हो जा हे करेजा सबके फटना पहिले कोई कुछ न सोच हथ आखिर एकरा से बचे लेल हमनी के का करतब हे करना जे कैलक बलात्कार ओकरा मार जूता चार कोई कोई इहो कह हथ एतना मार कि मर जाये सार बकि सोंच ऊ के हे हम ही तु ह आउ हमनिये के ई रेंगन हे चेंगन हे शरम से मूड़ी झुक जा हे समाचार जब कान में सुना हे सब कोई बतियैला पर एही कह हे हमनी ही अथवा लचार ए बाबु लग हौ सच्चे में बिहार हौ बिमार काहे कि इहाँ लगतरिये होइत हौ बलात्कार।।                                     💐💐मनोज💐💐

निःशब्द।

जमाने के बदलते परिवेश मे एक नई सी चलन का आरंभ हाँथ पैर दिल दिमाग सलामत फिर भी बैसाखी के सहारे की आदत। गर है दम तो अपनी लाठी बनो स्वयम् वर्ना टूटते ही बैसाखी के धराशायी हो जाओगे लूले लंगड़े बन वापस घर को आओगे लोग कहेंगे लौट के बुद्धु घर को आये पाये क्या घर का आँटा गील कराये। होकर मौन चुपचाप निःशब्द बेजुबान से अतीत की स्मृतियों में खोये अवाक्  दृष्टिपात मात्र ही कर पाओगे।।                                      💐💐मनोज💐💐

कमल के फूल।

कुछ तुमने लिया कुछ उसने लिया पर इतना तो बतला दो मुझको क्या दिया? सजदे मैंने भी किये थे तेरी जीत की खातिर तपती दोपहर मे घर से निकलकर बटन दबाये थे। बड़ी मशक्कत से कमल के फूल खिलाये थे मेरे कुछ भाईयों ने पंजे भी दिखाये थे पर मैं तो खुश था कमल की कोमल मुलायम पंखुड़ियों को देखकर । यंत्र तंत्र मंत्र षड्यंत्र सब हो गये फेल क्या यही है राजनीति का खेल? अब समझ में कुछ कुछ आ रहा है शायद कलियुग अपना खेल दिखा रहा है तभी तो जिसने सबकुछ अर्जा उसको मिला दोयम का दर्जा। मातापिता हो गये वृद्धाश्रम के अधीन बच्चे बन गये गद्दीनसीन।                                 💐💐मनोज💐💐

एषणा।

एषणा चाचा चौधरी,जंगल मे अकेले चले जा रहे थे। हो गई शाम छा गया अंधेरा सन्नाटा चारो ओर मार्ग अप्रशस्त। स्थापित कर लिया अपना साम्राज्य घुप्प अंधेरे ने। नहीं होता दृष्टि गोचर कुछ भी, कूएँ, खाई,गढ्ढे,नाले कैसे करूँ पार समझ नहीं आता कुछ भी। आगे बढ़े पैर धीरे धीरे कि अचानक चले गये कूएँ. मे ः अरे ये क्या?टकराई एक डाल हांथों से जान मे आई जान पकड़ लिया। देखा नीचे पुनश्च तेज हो गई धडंकने एक तो कूआँ गहरा चार चार अजगर ऊपर से फुंफकारते,मुह फैलाए तैयार डँसने को। इधर दो चूहे कुतरने लगे,डाली को बँध गई घिघ्घी चाचा की, सोचा अब तो गये सूख गई हलक। पर चमत्कार अचानक ये कैसा डाल को हिलाया एक हाँथी ने। मधुमख्खियाँ उड़ी छत्ते से मीठे बूंद मधु के सूखते होठों को तर करने लगी चाचा के। मधुरस ने चाचा को भयमुक्त कर दिया मृत्यु से। भूल गये चाचा कि महाकाल नीचे है इंतज़ार मे। हाँथी के हिलाने से कमजोर डाल भी गिरनेवाली है अब। तत्काल जंगल से गुजरते संन्यासी ने अपना हाँथ दिया चाचा को बोला पकड़ो,बाहर आ जाओ चाचा बोले बस एक बूंद और फिर निकाल देना टपकता रहा श...