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Showing posts from August, 2019

कूपोदकं।

कूपोदकं वटच्छाया श्यामास्त्रि स्निग्ध भोजनम्। शीतकाले भवेदुष्णा उष्णकाले च शीतलम्।। 🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂 कूपोदक हो जहाँ वटवृक्ष की छाँव स्निग्ध भोज्य पदार्थ हो श्यामा कामिनी ठाँव शीतलता अनुभव करें हो                           💐 उष्णकटिबंध                                      💐 जो पावे उष्णाकाले                               💐 शीतल सुरभि सुगंध।                              💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 @पद्मनाभ*********

यामिनी।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐संस्कृत साहित्ये विरह श्रृंगारस्य अनुपम सौंदर्यं💐दृश्यतां एकः नायकस्य विरह व्यथा💐 💐गतप्राया रात्रि कृशतनु शशि शीर्यत इव💐 💐प्रदीपोयं निद्रा वशमुपगतो घूर्णत इव💐💐 💐प्रणामांतो मानम् न त्यजसि क्रुधमहो💐💐 💐कुचप्रत्यासन्न हृदयमपि ते चण्डि कठिनम्💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐है बीतने को यामिनी 💐मान तू कर भंग अब हे मानिनी 💐कर जागरण है थक चुका यह चाँद भी 💐दीप घूर्णन कर रहा 💐कोमल हृदय की मल्लिका 💐कारण कहो क्रोध का हे क्रुधमहो      💐कुच काठिन्य के संयोग से है 💐हुआ तेरा हृदय काष्ठवत् अहो 💐कर त्याग तू दे मान अपना दामिनी 💐हे भामिनी स्वाभिमानिनी।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐@पद्मनाभ*********

तपती रेत।

तपती रेत ने राहत की साँस ली आखिर आज तूने प्यास जो बुझाई आँखे तरस गई थीं तेरे मनोहारी रूप को देखे बिन सिहर उठा चितवन तेरे कोमल स्पर्श पा  पर घबराहट है पता नहीं कब तक साथ रहेंगे हम इसीलिये शायद मेरे तेज थिरकते पाँव थम से गये फिर भी खुश हूँ कुछ देर ही सही सुकून तो मिला अंतःसलिला के वाह्य सलिल रूप को निहार कर विष्णुपाद तृप्त हुआ उभय तट संयोग से। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 @पद्मनाभ*********

वंदे बोधमयं नित्यम्।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐वंदे बोधमयं नित्यम्💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 गतांक से आगे----- अपने पीछे के आलेख में मैं चर्चा कर रहा था जीवन के तीन प्रारंभिक पाठशालाओं की,जिनका अस्तित्व ही आज समाप्तप्राय है।आज आँचलवाली माँ का प्रतिशत कम होता जा रहा है।आज अनुशासन प्रिय पिता का प्रतिशत भी कम दीखता है।गुरु से रूपांतरित सर का गुरुगांभीर्य भी समाप्तप्राय हो चुका है।ऐसे में राम जैसे पुत्र की कल्पना कोरी कल्पना ही रह गई है।गुरु कैसा हो इस संबंध में वर्णन करते हुये महाकवि तुलसी लिखते हैं------ वंदे बोधमयं नित्यम् गुरुं शंकर रूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोपि चंद्रः सर्वत्र वन्द्यते।। गुरु का स्वरूप शंकर सरीखा होना चाहिये, जो बिल्कुल टेढे चंद्रमा को भी त्रैलोक्य पूज्य बना देता है।एक गुरु हम हैं जो एक थोड़ा शैतान छात्र मिला नहीं कि हम उससे अपने आपको अलग कर लेते हैं।कारण स्पष्ट है हममे शंकर जैसा गुरुगांभीर्य नहीं है।हम ध्यानी नहीं, शंकर ध्यानी हैं।जब ध्यान ही नहीं तो धारणा की बात कहाँ।फिर बिना ध्यान और धारणा के समाधि की स्थिति कहाँ।तो न ध्यान न धारणा न समाधि फिर शंकर नहीं।जब शंकर नहीं बन स...

वन्दे बोधमयं नित्यम्।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐वंदे बोधमयं नित्यम्💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 वंदे बोधमयं नित्यम् गुरुं शंकर रूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोपि चंद्रःसर्वत्र वंद्यते ।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 आज निराला साहित्य परिषद् एवं मानस मंच के तत्वावधान में महामना गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती का आयोजन किया गया।इस पावन अवसर पर यद्यपि मैं एक श्रोता की हैसियत से गया था किन्तु अपने आत्मीय आयोजक एवं मंच के संचालक भाई राजीव पाठक जी के आग्रह को नकार नहीं सका और गोस्वामी जी को समर्पित अपने गद्यांजलि के क्रम में अपने विचारों को भी उद्भाषित किया।महामना की अमर कृति श्री राम चरित मानस के बालकाण्ड में श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन करते हुये उन्होंने एक सामान्य मानव से महामानव बनने की बात बतलाते हुये लिखा है----- प्रात काल उठि के रघुनाथा  मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। संस्कृत के विद्वानों ने भी कहा है----- अभिवादन शीलस्य नित्यम् वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्द्धंते आयुर्विद्या यशोबलम्।। अर्थात् राम नित्यप्रति प्रातः जागने के उपरांत सर्वप्रथम अपनी माताओं को,पिता को और गुरुचरणों को नमन करते थे।आगे उनक...

नेतृत्व।

गर करना चाहते हो नेतृत्व  भूलना होगा पहले अपना अस्तित्व तुम्हारी आड़ी तिरछी चाल से नहीं कटेगी व्याल  बरछी ओर भाल से। ताल से ताल मिलाना होगा दो हाँथों से करताल बजाना होगा। एक हाँथ भला अकेला कर क्या सकता है दो बैल़ो की जोड़ी ही हल कर्षण करता है। भूलकर अहंकार करो समता का व्यापार वर्ना कहते रह जाओगे हम तो हैं सदा लाचार।                                  💐💐मनोज💐💐

कश्मीर की कली।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 खिल चुकी है अब वादियो़ में कली कश्मीर की। फैलेगी फिजां में जल्द ही महक केशर के क्यारियों की। कहवा का स्वाद भी ले पायेंगे जल्द ही घर बैठे हिन्दुस्तान के आम अवाम। अरे क्यों नहीं  हो गया न  धारा तीन सौ सत्तर का काम तमाम। मम्मट कल्हण के घर से वेद की ऋचाओं के स्वर गूँजेंगे एक बार फिर। स्वर्ग की अप्सराओं का होगा नर्त्तन गन्धर्व गान के साथ कश्मीर की वादियों में। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐@पद्मनाभ**********

हालमस्त कोई रामदिवाना।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐हालमस्त कोई राम दिवाना💐💐💐 आज साहित्य के महानायक रामचरिमानस के प्रणेता जिसने गागर में सागर भरकर हरेक आत्मा को तृप्त किया उन महान् संत गोस्वामी तुलसीदास जी के अवतरण एवं महाप्रयाण दिवस के पावन अवसर पर श्री चरणों में अपनी श्रद्धा निवेदित करते हुये उनके जीवन की अंतिम अभिलाषा की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा। भगवत्प्रेम के मतवाले तुलसी प्रभु श्रीराम के गुणानुवाद में इतने उन्मत्त हो जाते हैं कि उन्हें अपनी अवस्था का भी भान नहीं रहता।देहानुसंधान को भूल जाते हैं।  एवं व्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या              जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति               गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः।। भगवन्नाम रटन में ऐसे खो जाते हैं कि कभी उच्चस्वर में नाम बोलने लगते हैं,कभी हँसते हैं,कभी रोते हैं,कभी चिल्लाते हैं,और कभी कभी खूब जोर जोर से गाते हुये लोकोत्तर भाव में नाचने लगते हैं। तभी तो अपनी अभिलाषा को अभिव्यक्ति देते हुये कहते हैं------- अनुराग सो निज रूप जो जग ते बिलच्छन देखिये। संतोष सम सीतल सदा दम देहवंत न लेखिये।। निरमल निरामय एकरस तेहि हरष सोक न...

जानामिधर्मं।

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐जानामिधर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्मं                 न च मे निवृत्तिः। केनापि देवेन ह्रदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि                        तथा करोमि।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 जब धर्माधर्म की बात चलती है तो मानव यह कहकर अपने मनोभाव व्यक्त करता है कि मैं सब जानता हूँ।किन्तु क्या करूँ ,न तो धर्म में मेरी प्रवृत्ति है और न ही अधर्म से निवृत्ति ही हो पाती है।ऐस लगता है मानो कोई देवता हमारे भीतर बैठा है जो मुझे ऐसा करने को प्रेरित करता है।वस्तुतः मानव का यह कहना सत्य ही है।वह देव और कोई नहीं ये उस मानव मन के भीतर बैठी उसकी कामना होती है जिसके वशीभूत हो वह आचरण करता है।कहता है मेरा मन ऐसा करने को कहा इसलिये मैंने ऐसा किया।अर्थात् मानव मन के वशीभूत होता है ,मन मानव के वशीभूत नहीं होता।जिस दिन मन मानव के वशीभूत हो जाये उस दिन ये जान लेना चाहिये कि अब हमारे ऊपर परमपिता की अहैतुकी कृपा आनी आरंभ हो चुकी है।एतदर्थ येन केन प्रकारेण हमें अपनी कामनाओं पर विजय प्राप्त करने को सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये।इन कामनाओं के कारण ही हम नानाविध पाप कर्मों में निरत रहकर धर्म की प...