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Showing posts from May, 2021

कान पर जनेऊ।क्यों?

शौच के समया जनेऊ कान पर लपेटना जरूरी क्यों  〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼 आम बोलचाल में यज्ञोपवीत को ही जनेऊ कहते हैं। मल-मूत्र त्याग के समय जनेऊ को कान पर लपेट लिया जाता है। कारण यह है कि हमारे शास्त्रों में इस विषय में विस्तृत ब्यौरा मिलता है। शांख्यायन के मतानुसार ब्राह्मण के दाहिने कान में आदित्य, वसु, रुद्र, वायु और अग्नि देवता का निवास होता है। पाराशर ने भी गंगा आदि सरिताओं और तीर्थगणों का दाहिने कान में निवास करने का समर्थन किया है। कूर्मपुराण के मतानुसार निधाय दक्षिणे कर्णे ब्रह्मसूत्रमुदङ्मुखः। अनि कुर्याच्छकृन्मूत्रं रात्रौ चेद् दक्षिणामुखः ॥ -कूर्मपुराण 13/ अर्थात् दाहिने कान पर जनेऊ चढ़ाकर दिन में उत्तर की ओर मुख करके तथा रात्रि में दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्र त्याग करना चाहिए। पहली बात तो यह है कि मल-मूत्र त्याग में अशुद्धता, अपवित्रता से बचाने के लिए जनेऊ को कानों पर लपेटने की परंपरा बनाई गई है। इससे जनेऊ के कमर से ऊपर आ जाने के कारण अपवित्र होने की संभावना नहीं रहती। दूसरे, हाथ-पांव के अपवित्र होने का संकेत मिल जाता है, ताकि व्यक्ति उन्हें साफ कर ले। अह्निककारिका में...

उसके बाद।

उसके बाद। ********* बालापन था बीत चुका जब आई जवानी चितवन में छूट गये सब खेल खिलौने यौवन के ही उलझन में काश! पुनः आ पाती वह याद फिर क्या हुआ था उसके बाद? सघन वनों की शीतल छाया अद्भुत थी तब गाँव की माया झरने से बहते निर्मल जल भाया मुझको कल कल वह नाद फिर क्या हुआ था उसके बाद? सुन्दर सुरभि पुष्प खिले थे हरित तृण भी पाँव तले थे शायद हम तुम वहीं मिले थे संग संग हिल मिल एक हुये थे प्रणय गीत की मधुर कंठ से  तुमने थी छेड़ी मधुर निनाद फिर क्या हुआ था उसके बाद? ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

होमाहुति।

होमाहुति विशेष 🔸🔸🔹🔸🔸 १👉 अग्नि के "मुख" में आहुति देने से सर्व कार्य सिद्धि होते है। २👉 अग्नि के "कर्ण प्रदेश" में - व्याधि होती है। ३👉 अग्नि के "नेत्र" में - अन्धापन आ सकता है। ४👉  अग्नि के "नासिका" में - मानसिक कष्ट होंगे। ५👉 अग्नि के "मस्तक" में आहुति देने से - धन का क्षय होता है। अग्निदेव जानकारी    🔸🔸🔹🔹🔸🔸 १👉 जिस भाग में काष्ठ हो - कर्ण २👉 कम जलने वाला भाग - नेत्र ३👉 धुआं वाला भाग - नासिका ४👉 अंगारों वाला भाग- मस्तक व ५👉 अग्नि शिखा वाला भाग - अग्नि का मुख (जिह्वा)कहलाता है। हवन आहुति फल 🔸🔸🔹🔸🔸 १👉 मधु के होम से - उपद्रव नष्ट  २👉 घी-सम्पत्ति प्राप्ति ३👉 दही-आरोग्य प्राप्ति ४👉 दूध-गांव प्राप्ति ५👉 अंगूर-इष्ट सिद्धि ६👉 लाजा(खील)-राज्य प्राप्ति ७👉 कमल-धन प्राप्ति ८👉 अनार-राजा वश ९👉 बिजौरा-क्षत्रिय वश १०👉 नारंगी-वैश्य वश ११👉 पेठा-शूद्र वश १२👉 केला-मंत्री वश १३👉 चम्पा व गुलाब-विश्व वश १४👉 नारियल-सम्पत्ति प्राप्ति १५👉 गुग्गुल-दु:ख नष्ट १६👉 गुड़-मनोरथ सिद्धि १७👉 तिल-अभीष्ट सिद्धि १८👉 क्षीर-धन धान्य प...

पुरोवाच प्रजापतिः।

पुरोवाच प्रजापतिः। ***************** नियतं कुरु कर्म त्वं          कर्मज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते           न प्रसिद्धयेदकर्मणः।। शास्त्रोक्त कर्म ही प्रधान हैं।अकर्मण्य होकर बैठ रहने से श्रेष्ठ होता है कर्म में निरत रहना। इससे दूसरों का भला तो होता ही है साथ साथ आत्म निर्वहन भी होता है और शारीरिक शुद्धि तो अवश्यमेव होती है।सिर्फ आत्मकल्याण या स्वकल्याण के निमित्त किये जाने वाले कर्म हमारे जन्म मृत्यु के बंधन का कारण बनते हैं इसीलिये शास्त्रविहित कर्म करने को प्रोत्साहित किया गया है।इसे यज्ञ की संज्ञा दी गई है।आत्मार्थ किये गये कर्म आसक्तियुक्त होते हैं और परार्थ किये गये कर्म आसक्ति रहित।अतः कर्म करते समय मानव मात्र को तीन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिये... **अपने मैं तत्व को अपने से अलग रखना चाहिये।यह शरीर सहित मेरा कुछ भी नहीं का भावबोध होना चाहिये। **मैं सिर्फ कर्म का अधिकारी हूँ। **स्वार्थ मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। यदि इन भावों से सन्नद्ध होकर हम कर्मरत होते हैं तो उपरोक्त तीनों बातें क्रमवार हमारे भीतर प्रविष्ट होकर हमें प...

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो। ****************** सृष्टि में प्राणियों का प्रजनन किस कारण संभव हो पाता है इस संबंध में श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीहरि ने स्वयम् श्रीमुख से वर्णन करते हुये कहा है कि "अन्नाद्भवन्ति भूतानि"।अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति का कारण तत्व अन्न है।अब प्रश्न यह उठता है कि यदि जीव मात्र की उत्पत्ति अन्न से होती है तो फिर अन्न को पैदा कौन करता है?क्या जीवों के द्वारा अन्न उपजाये जाते हैं?नारायण कहते हैं नहीं।"पर्जन्यादन्नसम्भवः"।कहने का तात्पर्य यह कि अन्न की उत्पत्ति का कारण तत्व वर्षा है।चलो मान लिया अन्न से जीव और वर्षा से अन्न तो फिर इस वर्षा का कारक कौन सा तत्व है?प्रभु श्री कृष्ण बताते हैं"यज्ञाद्भवति पर्जन्यो"।अर्थात् वर्षा का कारण तत्व यज्ञ में सन्निहित है।ठीक है यह भी माना कि यज्ञ धूम से आकाश में मेघ का निर्माण होता है ,मेघ के कारण जल वृष्टि का होना संभव है।वृष्टि अन्नोत्पत्ति का कारण बनती है और अन्न भक्षण के उपरांत जीव में ऊर्जा का स्रोत उत्पन्न होता है और फिर जीव से जीव में संसर्गजा वह ऊर्जा समाहित होकर नये जीव की उत्पत्ति का क...

कर्मों की योनियाँ।

कर्मों की योनियाँ ~~~~~~~~~~~ प्रश्न :- कितने प्रकार की और कितनी योनियां हैं? उत्तर :- तीन प्रकार की योनियाँ हैं- १.कर्म योनि। २.भोग योनि। ३.उभय योनि। कुल योनियाँ चौरासी लाख कही जाती है। *कुल्लियात आर्य मुसाफिर* में _स्वर्गवासी पं. लेखराम जी_ ने अनेक महात्माओं की साक्षी देकर यह लिखा है।चौरासी लाख योनियों की गणना इस प्रकार कही गयी है। जल-जन्तु ७ लाख,पक्षी १० लाख,कीड़े-मकोड़े ११ लाख,पशु २० लाख,मनुष्य ४ लाख और जड़ (अचल,स्थावर) ३२ लाख योनियाँ हैं।(देखो गीता रहस्य ले. तिलककृत पृष्ठ १५४) श्रेष्ठतम योनि:- 〰〰〰〰 प्रश्न :- कर्म योनि और भोग योनि तो मैंने भी सुनी हैं।कर्म योनि तो मनुष्यों की है और भोग योनि पशुओं की।परन्तु यह उभय योनि तो आज ही नई सुनी है।इसका क्या आशय है? उत्तर :- जो तुमने सुन रखा है,वह भी यथार्थ नहीं। वास्तव में भोग योनि वही है जिसमें केवल भोग ही भोगा जाता है और कर्म नहीं किया जाता। वह बंदी के समान है,उसे ही पशु योनि कहते हैं।उभय योनि वह है जिसमें पिछले कर्मों का फल भी भोगा जाता है और आगे के लिए कर्म भी किया जाता है।वह योनि मनुष्य योनि कहलाती है। फिर यह कर्म योनि भी दो प्रकार की है। ...

सकाम और निष्काम साधना।

सकाम और निष्काम साधना ~~~~~~~~~~~~~~~~~ 1. परिभाषाएं : ~~~~~~~~~~~ सकाम साधना 👉 इस प्रकार की साधना सांसारिक लाभ प्राप्ति की अपेक्षा से की जाती है । उदाहरण के लिए : प्रार्थना करना, प्रसाद अर्पण करना, उपवास अथवा कोई अन्य विधि करना – धनप्राप्ति के लिए नौकरी हेतु खोई वस्तु प्राप्त करने के लिए गर्भाधारण हेतु, बीमारी दूर करना प्रियजनों की सुरक्षा इत्यादि के उद्देश्य से निष्काम साधना👉  यह साधना आध्यात्मिक उन्नति के एकमेव उद्देश्य से की जाती है। अतः इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, साधक जीवन की प्रत्येक घटना का अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयोग करते हैं। यदि उनके जीवन में कठिन परिस्थितियां भी आएं तो अहं निर्मूलन करके वह उस परिस्थिति का उपयोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए करते हैं और परिस्थिति के परिणाम को ईश्वरेच्छा मानकर स्वीकार करते हैं। 2. सकाम और निष्काम साधना का तुलनात्मक अभ्यास ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जब हम साधना करते हैं तो कुछ मात्रा में आध्यात्मिक उर्जा उत्पन्न होती है। जब यह आध्यात्मिक ऊर्जा सांसारिक लाभ प्राप्ति के लिए उपयोग की जाती है, जैसे कि सकाम साधना, तो इच्छाओं की प...

सहे जा रहा हूँ।

सहे जा रहा हू। ************* सहे जा रहा हूँ...... सितमगर तेरे हर सितम को सहे जा रहा हूँ नहीं कोई माँझी नहीं है खेवैया भँवर बीच अब तो पड़ी है ये नैया नहीं कोई किश्ती किनारा नहीं है मेरे गम का कोई सहारा नहीं है पतवार बिन ही बहे जा रहा हूँ सहे जा रहा हूँ सितमगर तेरे हर सितम को  सहे जा रहा हूँ। ये गम के हैं साये मुझको सताते न अपना पता ये मुझको बताते न लेना किसी का किसी को न देना अकेले भँवर बीच बहे जा रहा हूँ सहे जा रहा हूँ सितमगर तेरे हर सितम को सहे जा रहा हूँ। शिकवा नहीं है न कोई शिकायत बन गई हर गिला बस अब है एनायत हर दुआ है मुकम्मल तुम्हारे लिये लो विष का हलाहल पिये जा रहा हूँ सहे जा रहा हूँ सितमगर तेरे हर सितम को सहे जा रहा हूँ।। ....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

रामायण।

🌷 रामायण 🌷 'रा' का अर्थ है प्रकाश, 'मा' का अर्थ है मेरे भीतर, यानी रामा का अर्थ है मेरे भीतर का प्रकाश। दशरथ और कौसल्या ने राम को जन्म दिया। दशरथ का अर्थ है 10 रथ। दस रथ 5 इन्द्रिय अंगों (ज्ञानेंद्रिय) और 5 क्रिया अंगों (कर्मेन्द्रिय) के प्रतीक हैं। कौशल्या का अर्थ है कौशल। 10 रथों का कुशल सवार राम को जन्म दे सकता है। राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। अयोध्या का मतलब एक ऐसी जगह है जहां कोई युद्ध नहीं हो सकता है। जब हमारे मन में कोई संघर्ष नहीं है, तो चमक आरंभ हो सकती है। रामायण का एक दार्शनिक, आध्यात्मिक महत्व और एक गहरा सत्य है। कहा जाता है कि रामायण हमारे ही अंदर हो रही है। हमारी आत्मा राम है, हमारा मन सीता है।  हमारी सांस या जीवन-शक्ति हनुमान है। हमारी जागरूकता लक्ष्मण है और हमारा अहंकार रावण है। जब मन (सीता), अहंकार (रावण) द्वारा चुराया जाता है, तब आत्मा (राम) बेचैन हो जाती है। अब आत्मा (राम) अपने आप ही मन (सीता) तक नहीं पहुँच सकती। इसे जागरूकता (लक्ष्मण) में रहकर जीवन-शक्ति (हनुमान) का सहारा लेना होगा। जीवन-शक्ति (हनुमान) और जागरूकता (लक्ष्मण) की मदद से, मन (सीता) ...

नील सरस्वती साधना।

💐 नील सरस्वती साधना 💐       निल सरस्वती के दो स्वरूप की उपासना होती है । सौम्य स्वरूप वाकसिद्धि , धनधान्य , शत्रु कलह शमन केलिए ओर उग्र स्वरूप तारा तंत्र की अनेक सिद्धिया प्राप्त करने केलिए । यहां सौम्य स्वरूप की उपासना का एक विधान दे रहे है । इन सौम्य स्वरूप की उपासना से अचूक फल मिलता है । शत्रु ओर कलह का शमन हो जाता है और वाकसिद्धि प्राप्त होती है जो समाज , व्यापार , राजनीति , शिक्षण , प्रवचन बिगेरा क्षेत्रमे सफलता दिलाती है ।       ज्योतिष भविष्यवाणी को सम्पूर्ण करने वाली नील सरस्वती साधना अगर कोई ज्योतिष नील सरस्वती की साधना कर ले, तो उसे ज्योतिष शास्त्र का सम्पूर्ण ज्ञान हो जाता हैं. नील सरस्वती की साधना को पूर्ण करने पर ज्योतिष द्वारा की गई भविष्यवाणी सत्य तथा अकाट्य हो जाती हैं तथा इस साधना को करने के बाद ज्योतिष अगर किसी व्यक्ति की कुंडली का विश्लेषण या उसके जीवन से जुडी किसी प्रकार की भविष्यवाणी कर दे, तो वह भी पूर्णत: सत्य सिद्ध हो जाती हैं.निल सरस्वती स्तोत्र पाठ करने से शत्रु ओर कलह शांत हो जाते है । साधना सामग्री :-  1.   ...

दुर्गापदुद्धारस्तवराजः।

॥ दुर्गापदुद्धारस्तवराजः ॥❤🙏 नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे नमस्ते जगद्वयापिके विश्वरूपे। नमस्ते जगद्वन्द्य-पादारविन्दे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥1॥ नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे। नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥2॥ अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः। त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥3॥ अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्येऽनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे। त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥4॥ अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे बिपत्सागरे मज्जतां देहभाजाम्‌। त्वमेका गतिर्देविनिस्तारहेतुर्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥5॥ नमश्चण्डिके चण्डदुर्दण्डलीला-समुत्खण्डिताखण्डिताशेषशत्री। त्वमेका गतिर्देवि निस्तारबीज नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥6॥ त्मेवाघभावाधृतासत्यवादीर्न जाताजितक्रोधनात्‌ क्रोधनिष्ठा। इडा पिंगला त्वं सुषुम्णा च नाडी नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥7॥ नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे सरस्वत्यरुन्धत्यमोघस्वरूपे। विभूतिः शची कालरात्रिःसतिस्त्वं नमस्ते जगत्तारिण...