एषणा
चाचा चौधरी,जंगल मे
अकेले चले जा रहे थे।
हो गई शाम छा गया अंधेरा
सन्नाटा चारो ओर मार्ग अप्रशस्त।
स्थापित कर लिया अपना साम्राज्य
घुप्प अंधेरे ने।
नहीं होता दृष्टि गोचर कुछ भी,
कूएँ, खाई,गढ्ढे,नाले कैसे करूँ पार
समझ नहीं आता कुछ भी।
आगे बढ़े पैर धीरे धीरे कि
अचानक चले गये कूएँ. मे ः
अरे ये क्या?टकराई एक डाल हांथों से
जान मे आई जान पकड़ लिया।
देखा नीचे पुनश्च तेज हो गई धडंकने
एक तो कूआँ गहरा चार चार अजगर
ऊपर से फुंफकारते,मुह फैलाए तैयार
डँसने को।
इधर दो चूहे कुतरने लगे,डाली को
बँध गई घिघ्घी चाचा की,
सोचा अब तो गये
सूख गई हलक।
पर चमत्कार अचानक ये कैसा
डाल को हिलाया एक हाँथी ने।
मधुमख्खियाँ उड़ी छत्ते से
मीठे बूंद मधु के सूखते होठों को
तर करने लगी चाचा के।
मधुरस ने चाचा को भयमुक्त कर दिया
मृत्यु से।
भूल गये चाचा कि महाकाल नीचे है
इंतज़ार मे।
हाँथी के हिलाने से कमजोर
डाल भी गिरनेवाली है अब।
तत्काल जंगल से गुजरते संन्यासी ने
अपना हाँथ दिया चाचा को
बोला पकड़ो,बाहर आ जाओ
चाचा बोले बस एक बूंद और
फिर निकाल देना
टपकता रहा शहद बूंद बूंद
बाबा चले गये चाचा पीते रहे।
सत्यमेव कथ्यते ,सुख की आस मे
न माया मिलती है न ही राम मिलते हैं।
मनोज मिश्र।,गया।
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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