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Showing posts from May, 2022

क से कलम।

आज जब भी  कलम पकड़ता हूँ उंगलियों में क से कलम और ज्ञ से ज्ञानी तक याद आ जाता है। अ से अक्षर दौड़ते हुये अः पर थम जाता है। मस्तिष्क झंकृत हो उठता है एकबारगी मानो कोई कह रहा हो "बाबू" आज याद कर लेना सब शाम को चाकलेट दूँगा। मुड़कर पीछे देखता हूँ बैठकखाने बाबूजी की तस्वीर विहँस रही होती है मेरी आड़ी तिरछी लेखनी को देखकर। मैं आँखें बंद कर लेता हूँ मन ही मन नमन निवेदित करता हूँ ह्रदय की वेदना छलक आती है आँखों से मौन मुख सिर्फ इतना ही कह पाता हूँ बाबूजी सब आपका दिया आशीर्वाद है आपकी ही कीर्ति को आगे बढ़ा रहा हूँ स्वीकार करें ये शब्दपुष्प जो आपकी चरणों पे चढ़ा रहा हूँ। .....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

होमाहुति।

होमाहुति विशेष 🔸🔸🔹🔸🔸 १👉 अग्नि के "मुख" में आहुति देने से सर्व कार्य सिद्धि होते है। २👉 अग्नि के "कर्ण प्रदेश" में - व्याधि होती है। ३👉 अग्नि के "नेत्र" में - अन्धापन आ सकता है। ४👉  अग्नि के "नासिका" में - मानसिक कष्ट होंगे। ५👉 अग्नि के "मस्तक" में आहुति देने से - धन का क्षय होता है। अग्निदेव जानकारी    🔸🔸🔹🔹🔸🔸 १👉 जिस भाग में काष्ठ हो - कर्ण २👉 कम जलने वाला भाग - नेत्र ३👉 धुआं वाला भाग - नासिका ४👉 अंगारों वाला भाग- मस्तक व ५👉 अग्नि शिखा वाला भाग - अग्नि का मुख (जिह्वा)कहलाता है। हवन आहुति फल 🔸🔸🔹🔸🔸 १👉 मधु के होम से - उपद्रव नष्ट  २👉 घी-सम्पत्ति प्राप्ति ३👉 दही-आरोग्य प्राप्ति ४👉 दूध-गांव प्राप्ति ५👉 अंगूर-इष्ट सिद्धि ६👉 लाजा(खील)-राज्य प्राप्ति ७👉 कमल-धन प्राप्ति ८👉 अनार-राजा वश ९👉 बिजौरा-क्षत्रिय वश १०👉 नारंगी-वैश्य वश ११👉 पेठा-शूद्र वश १२👉 केला-मंत्री वश १३👉 चम्पा व गुलाब-विश्व वश १४👉 नारियल-सम्पत्ति प्राप्ति १५👉 गुग्गुल-दु:ख नष्ट १६👉 गुड़-मनोरथ सिद्धि १७👉 तिल-अभीष्ट सिद्धि १८👉 क्षीर-धन धान्य प...

बुद्धावतार एक दृष्टिकोण।

श्री गुरु भागवतानंद  जी की लेखनी से 👇👇👇💐💐💐💐 *क्या बुद्ध भगवान् विष्णु के अवतार हैं ?*  बुद्धावतार के विषय में कुछ धारणाएं निम्न हैं - १) सनातनी मानते हैं कि बुद्ध भगवान् विष्णु के अवतार हैं। २) बौद्ध मानते हैं कि बुद्ध स्वतन्त्र हैं, किसी के अवतार नहीं। ३) कुछ सनातनी मानते हैं कि गौतम ही एकमात्र बुद्ध हैं और उन्होंने ही बौद्ध धर्म चलाया। ४) कुछ अधिक अध्ययन करने वाले सनातनी मानते नहीं कि नहीं, गौतम से पूर्ववर्ती अजिनपुत्र बुद्ध भी थे और वही भगवान् विष्णु के अवतार हैं। ५) कुछ लोग मानते हैं कि गौतम बुद्ध, अजिनपुत्र महात्मा बुद्ध, ये सभी भगवान् विष्णु के ही अवतार हैं एवं बुद्ध अनेकों हुए हैं और आगे भी होंगे। मैं शास्त्र प्रमाण और परम्परा के आधार पर यह मानता हूँ कि आस्तिक एवं नास्तिक दर्शन दोनों साथ साथ ही आये हैं। नास्तिक दर्शन के प्रसार हेतु समय समय पर बुद्धों का अवतार होता आया है एवं ब्राह्मण महात्मा बुद्ध तथा क्षत्रिय गौतम बुद्ध, दोनों ही भगवान् विष्णु के अवतार हैं। अब पुनः लोग कहेंगे कि आपके वचन का श्रीकरपात्री स्वामी आदि के वचनों से विरोध हो रहा है, तो मैं यही कहूंगा क...

सत्यनारायण कथा एक दृष्टिकोण।

सत्यनारायण कथा एक दृष्टिकोण। ********************** यूँ तो हम सभी अपने घरों में मासिक पूर्णिमा को सत्यनारायण व्रत का विधान करते हैं।सत्यनारायण रूप भगवान विष्णु की उपासना कर कथाश्रवण वा वाचन भी करते हैं।किंतु प्रथमोध्यायतः सप्ततमोध्याय वा पंचमोध्याय पर्यंत ब्राह्मण, बनिया ,राजा आदि प्रतीकों की कथामात्र है यह।क्या यह एक मासिक बैठकी या कथासुनकर पंचामृत एवं अन्य भोगपदार्थों के सेवन कर निज निज गृह जाहु भर है!आईये अपनी विचारणाशक्ति से दृष्टिपात करते हैं। कथारंभ कलिकाल में लोगों के कष्ट निवारण हेतु ऋषियों की संगोष्ठी से होता है।पुनः नारद विष्णु संवाद का क्रम जहाँ सत्यनारायण पूजा का विधान एवं स्वरूप को वर्णित किया जाता है।अब इसके आगे की कथा एक गरीब ब्राह्मण के द्वारा सत्यनारायण की उपासना से आरंभ हो साधु नामक वैश्य से विस्तार पाआगे.. राजा एवं यदुवंशियों तक पहुचती है।इस पूरे कथाप्रकरण में ध्यातव्य यह कि कथा कभी भी किसी एक अकेले के द्वारा सम्पन्न नहीं होती।जिसने भी की अपने इष्टमित्रों परिजनों को आमंत्रण देकर ही सबके साथ मिलकर की।सर्वप्रथम वह ब्राह्मण जो अतिनिर्धन है ।जीवोपार्जन हेतु नित्य भिक्षाट...

सत्यनारायण कथा एक दृष्टिकोण।

कलौ अन्नगताप्राणा। ****************** "कलिकाल में प्राण अन्न के अधीन है।" बिल्कुल सही अर्थ लगाया आपने।शब्दगत अर्थ यही बनता भी है।इस जीवात्मक शरीर का निर्माण पंचतत्वों से मिलकर हुआ है।मरणोपरांत पुनः उन्हीं पंचतत्वों में इसे विलीन भी होना है।श्राद्धीय कर्म भी पिण्ड रूप इन्हीं पंच तत्वों से सम्पादित होते हैं।"क्षिति जल पावक गगन समीरा पंचतत्व मिली बना शरीरा" या" धूम ज्योतिः शलिल मरुतां सन्निपातः क्व मेघः"का अर्थ भी यही है।किंतु हम शायद यह नहीं समझ पाते या जान पाते या युँ कहें कि जानने की कोशिश ही नहीं करते कि यह शरीर सिर्फ एक पुतला रूप ऐसे ही नहीं बन जाता।इसके भीतर अनेक कोषों का निर्माण भी होता है।इनमें अन्नमय,ज्ञानमय,विज्ञान मय प्राणमय,मनोमय ,आनंदमय आदि अनेक प्रमुख कोषों की चर्चा हमारे पूर्ववर्ती मनीषियों ने की है।जिसका उल्लेख किसी एक ग्रंथ या शास्त्र में नहीं मिलता।इसके लिये सनातन परम्परा से जुड़े विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन मनन चिंतन अपेक्षित है।किंतु यह सबके बस की बात नहीं।ग्रंथ का अध्ययन बड़ी दुरूह प्रक्रिया है।इसीलिये महर्षियों ने इसे आसान बनाते हुये छोटी ...