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टोटके।

*🥦तांत्रोत्क वनस्पति टोटके🥦* 🕉️🏹🚩🔔🐚📿🔱 छोटे-छोटे उपाय हर unघर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं।हमारे आसपास पाए जाने वाले विभिन्न पेड़-पौधों के पत्तों, फलों आदि का टोटकों के रूप में उपयोग भी हमारी सुख-समृद्धि की वृद्धि में सहायक हो सकता है। यहां कुछ ऐसे ही सहज और सरल उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है, जिन्हें अपना कर पाठकगण लाभ उठा सकते हैं। ♦बिल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है। ♦अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे। ♦नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा। ♦संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे। ♦आक की जड़ :...
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शब्दाक्षर छंदकार्यशाला "डा. रश्मि"।

*महाशय जी,* हम सभी का मकसद साहित्य के क्षेत्र में शब्दाक्षर समूह और इसके सदस्यों की उन्नति-प्रगति में सहयोगी की भूमिका निभाना है। यह प्लेटफॉर्म भी इसी उद्देश्य की चर्चा के साथ आकार लिया था। मैंने अगर आज तक इस प्लेटफॉर्म पर कोई आपत्तिजनक सामग्री डाली हो, तो कृपया उसका सबूत पेश करें। अवश्य पेश करें। *आप उपाध्यक्ष हों या महाध्यक्ष, राज्याध्यक्ष, राष्ट्राध्यक्ष, विश्वाध्यक्ष अथवा ब्रह्माण्डाध्यक्ष,* आपको मुझे अनाप-शनाप कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं, इतना तो आप अवश्य ही जान लें। आप यह न भूलें कि मैं सबको सम्मान देने की शिक्षा देते हुए हजारों लड़कियों-महिलाओं को एक छत के नीचे पढ़ाने-लिखाने वाले एक सम्मानित उच्च शिक्षण संस्थान की एक महिला प्रोफेसर हूं। और सभी लड़कियों-महिलाओं को उनके अधिकार तथा कर्तव्य के साथ ही अन्याय की स्थिति में *सभ्यता और वैधानिकता के दायरे में रहते हुए* प्रतिवाद और जरूरत पड़ जाने पर प्रतिकार के लिए प्रेरित करना भी मैं अपनी जिम्मेदारी मानती हूं। यह मुझे खुद भी ठीक से आता है और इसी वजह से अपनी बालिका और महिला छात्राओं को मैं आवश्यकता की स्थिति में प्रतिवाद/प्रतिकार लिए प्रेर...

शब्दाक्षर छंद कार्यशाला।

* *शब्दाक्षर के सभी पटलों हेतु दिशा निर्देश* *---------------------------------* *सभी सम्मानित सदस्यों को सूचित किया जाता है  प्रातः दस बजे से शाम छ बजे तक लिखित  रचनाओं के अतरिक्त अन्य कोई भी सामग्री पटल पर नहीं पोस्ट की जायेगी। अन्य साहित्यिक सामिग्री जैसे आइडियो वीडिओ व पत्र पत्रिकाओं की क्लिपिंग शाम छ बजे से लेकर सुबह दस बजे तक पोस्ट की जा सकेगी । इस अवधि में भी  लिखित  रचनाओं का स्वागत रहेगा।* *इस नियम का न करने वालों को चेतावनी उपरांत पटल से रिमूव किया जा सकता है* सत्येन्द्र सिंह सत्य राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रधान समीक्षक शब्दाक्षर *विषय राष्ट्रीय अध्यक्ष शब्दाक्षर के संज्ञान में निवेदित* ।

शब्दाक्षर।

किसने आपको इस तरह से पटल पर व्यवधान डालने का निर्देश दिया है अगर दिया है तो आपके पास उसका लिखित आदेश होगा आप उसे दिखाइए... आपको तो कुछ लिखना पढना सीखना है नहीं सिर्फ आपने आपको महिमा मंडन में ही लगी रहती हैं राष्ट्रीय समिति में पहले आप अपना स्थान देख लें  सबसे नीचे है आपसे नीचे सिर्फ गुलशन है   आप पहले भी इस संबंध में मुझसे बहस कर चुकी हैं  मैं सत्येन्द्र सिंह सत्य राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शब्दाक्षर आपको आदेश देता हूँ की बिना मेरी अनुमति के आप इस पटल पर या शब्दाक्षर के किसी भी पटल पर कोई भी अखबार की कटिंग या चित्र नहीं पोस्ट करेंगी अन्यथा सभी जगह से आपको रिमूव कर दिया जायेगा सत्येन्द्र सिंह सत्य  राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शब्दाक्षर

मेरी मान।

सागर के तट पर खड़ा सोंच रहा था  निकल जाऊँगा पार तैरकर पर, मन ने कहा जानता हूँ तैरना आता है तुझे निकल जायेगा मेरी मान एक बार डूब कर तो देख जिंदगी बदल जायेगी। ....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

कैसे उसे बुलाऊँ मैं

नयनो से हैं रूठी नीदें सपन कहाँ सजाऊँ मैं। दूर हो गइ रूह जिगर से वापस  कैसे  लाऊँ  मैं। सूख गये आँसू आँखों के कैसे  धार   बहाऊँ   मैं। सुनने वाला पास नहीं जब हालेदिल किसे सुनाऊँ मैं। बाती है पर स्नेह नहीं जब फिर कैसे दीप जलाऊँ मैं। रिसते हों जब जख्म ह्रदय में मरहम   कहाँ  लगाऊँ   मैं। हार गया हूँ तनहा रहकर कैसे   उसे   बुलाऊँ   मैं। फूलों की खुशबु जब आती दिल  को  कहाँ  सजाऊँ  मैं। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

रावण का काम तमाम।

रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"