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Showing posts from June, 2021

गिलोय।

अमृत संजीवनी #गिलोय ----------- इसका वैज्ञानिक नाम है--तिनोस्पोरा कार्डीफोलिया । इसे अंग्रेजी में गुलंच कहते हैं। कन्नड़ में अमरदवल्ली , गुजराती में गालो , मराठी में गुलबेल , तेलगू में गोधुची ,तिप्प्तिगा , फारसी में गिलाई,तमिल में शिन्दिल्कोदी आदि नामों से जाना जाता है। गिलोय में ग्लुकोसाइन ,गिलो इन , गिलोइनिन , गिलोस्तेराल तथा बर्बेरिन नामक एल्केलाइड पाये जाते हैं। अगर आपके घर के आस-पास नीम का पेड़ हो तो आप वहां गिलोय बो सकते हैं । नीम पर चढी हुई गिलोय उसी का गुड अवशोषित कर लेती है ,इस कारण आयुर्वेद में वही गिलोय श्रेष्ठ मानी गई है जिसकी बेल नीम पर चढी हुई हो. गिलोय हमारे यहां लगभग सभी जगह पायी जाती है। गिलोय को अमृता भी कहा जाता है .यह स्वयं भी नहीं मरती है और उसे भी मरने से बचाती है , जो इसका प्रयोग करे . कहा जाता है की देव दानवों के युद्ध में अमृत कलश की बूँदें जहाँ जहाँ पडी , वहां वहां गिलोय उग गई . यह मैदानों, सड़कों के किनारे, जंगल, पार्क, बाग-बगीचों, पेड़ों-झाड़ियों और दीवारों पर लिपटी हुई दिख जाती है। इसकी बेल बड़ी तेजी से बढ़ती है। इसके पत्ते पान की तरह बड़े आकार के हरे रंग के होते...

आस्था का महत्व।

#आस्था .... मध्यप्रदेश में आगर मालवा नाम का जिला हैं। वहाँ के न्यायालय में सन १९३२ ई. में जयनारायण शर्मा नाम के वकील थे। उन्हें लोग आदर से बापजी कहते थे। वकील साहब बड़े ही धार्मिक स्वभाव के थे और रोज प्रातःकाल उठकर स्नान करने के बाद स्थानीय बैजनाथ मन्दिर में जाकर बड़ी देर तक पूजा व ध्यान करते थे। इसके बाद वे वहीं से सीधे कचहरी जाते थे ...! घटना के दिन बापजी का मन ध्यान में इतना लीन हो गया कि उन्हें समय का कोई ध्यान ही नहीं रहा। जब उनका ध्यान टूटा तब वे यह देखकर सन्न रह गये कि दिन के तीन बज गये थे। वे परेशान हो गये क्योंकि उस दिन उनका एक जरूरी केस बहस में लगा था और सम्बन्धित जज बहुत ही कठोर स्वभाव का था। इस बात की पूरी सम्भावना थी कि उनके मुवक्किल का नुकसान हो गया हो। ये बातें सोचते हुए बापजी न्यायालय पहुँचे और जज साहब से मिलकर निवेदन किया कि यदि उस केस में निर्णय न हुआ हो तो बहस के लिए अगली तारीख दे दें ...! जज साहब ने आश्चर्य से कहा .... ”यह क्या कह रहे हैं। सुबह आपने इतनी अच्छी बहस की। मैंने आपके पक्ष में निर्णय भी दे दिया और अब आप बहस के लिए समय ले रहे हैं ...!“ जब बापजी ने कहा कि म...

देह विद्युत संरक्षण।

           ----:देह विद्युत्-संरक्षण:---           *********************       देह विद्युत् सबसे बहुमूल्य है। तीनों शरीरों (स्थूल, भाव ओर सूक्ष्म) की विद्युत् एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है। वे कम न हों और उनकी उत्तरोत्तर वृद्धि हो। इसके लिए आवश्यक है कि--        कम-से-कम बोलना, अधिक-से-अधिक एकान्त में रहना, प्रकृति के समीप रहना, स्त्री-स्पर्श से अलग रहना, किसी के भी सिर पर हाथ न रखना, मस्तक का स्पर्श न करना, आवश्यक समझ कर ही किसी को आशीर्वाद देना, मूर्खों और दूषित संस्कार वालों से अलग रहना, अपने पैरों का स्पर्श न करने देना, विधवा स्त्री, रोगी, अपाहिज, कपटी व्यक्ति से तो कभी चरण-स्पर्श नहीं कराना चाहिए। ये तत्काल आतंरिक शक्ति का क्षय कर देते हैं। सबसे अधिक शक्ति सूक्ष्मशरीर में होती है। इन सबसे यह तुरन्त प्रभावित होती है जिसका प्रभाव चिन्तन-मनन, ध्यान-जप, पूजन आदि पर पड़ता है। शारीरिक विद्युत् को तो सबसे अधिक क्षीण करता है पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण। इसलिए साधकगण लकड़ी के खड़ाऊं का प्रयोग करते हैं। काठ के त...

जनेऊधारी।

भारी था भारी है रहेगा आगे भी भारी सब पर जनेऊधारी। आजाद ही पैदा हुआ आजाद सफर जीवन का आजादी लेकर स्वप्न विदा हुआ ब्रह्मलोक संसारी। कुछ तो बातें खास रही हैं आजादी से अबतक सबके मन में आश रही हैं ब्रह्मज्ञान विश्वास रहा है चाहे नर हो या नारी। कभी तोड़ा कभी जोड़ा देखकर ऊँची उड़ान  कभी मुखमोड़ा अंततः मन में चिंतन कर भारी बनने को बेताब हुये  अब स्वयम् "जनेऊधारी"।। .....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

कृश्चिनीटि।

कृष्णनीति। आज की राजनीति कृश्चिनीटि  मेकाले की पद्धति पर  आधारित इसीलिये खेलते हैं खेल जोड़ तोड़ का महर्षि वेदव्यास की परिभाषित नीति कृष्णनीति जहाँ जोड़ है हर तोड़ का बातें होती हैं सिर्फ जोड़ने की तोड़ने की नहीं विशाल आर्यावर्त्त बना भारतवर्ष  पहुँचा फर्श से अर्श जब तक रहा हिन्दुस्तान पाता रहा उत्थान बनते ही इंडिया हम भूल गये रास डांडिया करने लगे डांस ब्रेक,बैले कृश्चिनीटि के बैनर तले पुनः चाहिये यदि "आर्यावर्त्त" माननी होगी आपको कृष्णनीति की अकाट्य शर्त।। .....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

खवातीन।

जिधर भी नजर दौड़ाई धनसुख ही नजर आये मनसुख भाई शांतिलाल जी का तो पता ही नहीं कहाँ चले गये पलक पाँवड़े बिछाये प्रतिक्षारत्त हूँ। हाँ  माँगीलाल वक्त बेवक्त  आते रहते हैं लेकिन देवीलाल को तो देखे अर्सा बीत गया। हाँ पर एक बात है ज्ञानचंद जी शहर की गलियों में घूमते दिख जाते हैं। अरे यार अब पूछो मत रायचंद का तो कहना ही क्या इनसे तो कोई भी गली मुहल्ला चौक चौराहा अछूता ही नहीं भगवान बचाये इनसे। बड़ी अजीब विडंबना है जिन्हें ढूंढा वो मिले नहीं सिर्फ कहने को मित्र हैं दंभी हैं तो सात  कहने को साथ फिर भी हूँ अनाथ जरूरत के तीन रूठे हैं खवातीन पता नहीं ये चार रहते हैं क्यों सदा मिलने को तैयार ।। ...मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

पंचमुखी हनुमान कथा।

मित्रो आज मंगलवार है, आज हम आपको हनुमानजी के पंचमुखी रूप की कथा विस्तार से बतायेगें!!!!!!  लंका में महा बलशाली मेघनाद के साथ बड़ा ही भीषण युद्ध चला. अंतत: मेघनाद मारा गया। रावण जो अब तक मद में चूर था राम सेना, खास तौर पर लक्ष्मण का पराक्रम सुनकर थोड़ा तनाव में आया। रावण को कुछ दुःखी देखकर रावण की मां कैकसी ने उसके पाताल में बसे दो भाइयों अहिरावण और महिरावण की याद दिलाई। रावण को याद आया कि यह दोनों तो उसके बचपन के मित्र रहे हैं। लंका का राजा बनने के बाद उनकी सुध ही नहीं रही थी। रावण यह भली प्रकार जानता था कि अहिरावण व महिरावण तंत्र-मंत्र के महा पंडित, जादू टोने के धनी और मां कामाक्षी के परम भक्त हैं। रावण ने उन्हें बुला भेजा और कहा कि वह अपने छल बल, कौशल से श्री राम व लक्ष्मण का सफाया कर दे। यह बात दूतों के जरिए विभीषण को पता लग गयी। युद्ध में अहिरावण व महिरावण जैसे परम मायावी के शामिल होने से विभीषण चिंता में पड़ गए। विभीषण को लगा कि भगवान श्री राम और लक्ष्मण की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी करनी पड़ेगी. इसके लिए उन्हें सबसे बेहतर लगा कि इसका जिम्मा परम वीर हनुमान जी को सौंप दिया जाए। राम-ल...

बग्लामुखी स्तोत्र।

।।ब्रह्मास्त्र महा विद्या श्रीबगला स्तोत्र।। ध्यानः----- मध्ये सुधाब्धि-मणि-मण्डप-रत्न-वेद्याम्, सिंहासनोपरि-गतां परिपीत-वर्णाम् । पीताम्बराभरण-माल्य-विभूषितांगीम्, देवीं नमामि धृत-मुद्-गर-वैरि-जिह्वाम् ।। १ ।। अर्थात् अमृत का सागर । बीच में मणि-मण्डप की रत्न-वेदी । उस पर सिंहासन । उस पर पीले रंग की देवी ‘बगला’ आसीन हैं । उनके वस्त्र, आभूषण तथा पुष्प-माला- सब कुछ पीले रंग के ही हैं । बाँएँ हाथ में शत्रु की जीभ खींचकर, दाहिने हाथ से मुद्-गर लेकर, उस पर प्रहार करने जा रही है । उन्हीं माँ बगला को मेरा प्रणाम ।। जिह्वाग्रमादाय करेण देवीम्, वामेन शत्रून् परि-पीडयन्तीम् । गदाऽभिघातेन च दक्षिणेन, पीताम्बराढ्यां द्वि-भुजां नमामि ।। २ ।। अर्थात् बाँएँ हाथ में शत्रु की जीभ को खींचकर, दाहिने हाथ में गदा लेकर प्रहार करती हुई, पीताम्बरा द्वि-भुजा बगला को मेरा प्रणाम ।। *।। मूल-पाठ ।।* चलत्-कनक-कुण्डलोल्लसित-चारु-गण्ड-स्थलीम्, लसत्-कनक-चम्पक-द्युतिमदिन्दु-बिम्बाननाम् । गदा-हत-विपक्षकां कलित-लोल-जिह्वाऽञ्चलाम्, स्मरामि बगला-मुखीं विमुख-वाङ्-मनस-स्तम्भिनीम् ।। ३ ।। अर्थात् चञ्चल सुवर्ण-कुण्डलों से शोभ...

भारतीय नेत्र चिकित्सा की प्राचीनता।

भारत में #आँखों_की_सर्जरी का इतिहास भारत में 200 वर्ष पहले आँखों की सर्जरी होती थी...शीर्षक देखकर आप निश्चित ही चौंके होंगे ना!!! बिलकुल, अक्सर यही होता है जब हम भारत के किसी प्राचीन ज्ञान अथवा इतिहास के किसी विद्वान के बारे में बताते हैं तो सहसा विश्वास ही नहीं होता. क्योंकि भारतीय संस्कृति और इतिहास की तरफ देखने का हमारा दृष्टिकोण ऐसा बना दिया गया है मानो हम कुछ हैं ही नहीं, जो भी हमें मिला है वह सिर्फ और सिर्फ पश्चिम और अंग्रेज विद्वानों की देन है. जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है. भारत के ही कई ग्रंथों एवं गूढ़ भाषा में मनीषियों द्वारा लिखे गए दस्तावेजों से पश्चिम ने बहुत ज्ञान प्राप्त किया है... परन्तु "गुलाम मानसिकता" के कारण हमने अपने ही ज्ञान और विद्वानों को भुला दिया है. भारत के दक्षिण में स्थित है तंजावूर. छत्रपति शिवाजी महाराज ने यहाँ सन 1675 में मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी तथा उनके भाई वेंकोजी को इसकी कमान सौंपी थी. तंजावूर में मराठा शासन लगभग अठारहवीं शताब्दी के अंत तक रहा. इसी दौरान एक विद्वान राजा हुए जिनका नाम था "राजा सरफोजी". इन्होंने भी इस ...