मृगतृष्णा। तुम्हें देखकर मन में गुदगुदी सी होने लगती है तेरे तीखे नैन नख्श पीपल के कोमल पात से सुर्ख होठ बलखाती तेरी कमर गुब्बारे सी उन्नत उरोज तेरे खिले खिले कपोल विकट नितंबिनी आते हैं स्वप्न में भी सोते जागते तेरे ही स्वप्न सताते खयालात आगोश में न भरने का याद आते ही तेरा सुन्दर मुखड़ा भूल जाता हूँ खाना पीना सोना जागना पढ़ना लिखना भी बैठ जाता हूँ गुम सुम अपनी जगह इस उम्मीद में कि मिलोगी ही आज नहीं तो कल भूल जाता हूँ उस वक्त अपने आँगन की तुलसी भी नहीं समझ पाता तब खिलखिलाते मदमस्त यौवन के इस खेल को जो रेगिस्तान में धूप की चमक से चमकती रेत को पानी का सोता समझ बैठते हैं दौड़ लगाते हैं बुझाने को प्यास करने को तर अपने सूखे होठ मृगतृष्णा में।। ...........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"