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Showing posts from June, 2020

मृगतृष्णा।

मृगतृष्णा। तुम्हें देखकर मन में गुदगुदी सी होने लगती है तेरे तीखे नैन नख्श पीपल के कोमल पात से सुर्ख होठ बलखाती तेरी कमर गुब्बारे सी उन्नत उरोज तेरे खिले खिले कपोल विकट नितंबिनी आते हैं स्वप्न में भी सोते जागते तेरे ही स्वप्न सताते खयालात आगोश में न भरने का याद आते ही तेरा सुन्दर मुखड़ा भूल जाता हूँ  खाना पीना सोना जागना पढ़ना लिखना  भी बैठ जाता हूँ गुम सुम अपनी जगह इस उम्मीद में कि मिलोगी ही आज नहीं तो कल भूल जाता हूँ उस वक्त  अपने आँगन की तुलसी भी नहीं समझ पाता तब  खिलखिलाते मदमस्त यौवन  के इस खेल को  जो रेगिस्तान में धूप की चमक से चमकती रेत को  पानी का सोता समझ बैठते हैं दौड़ लगाते हैं बुझाने को प्यास करने को तर अपने सूखे होठ मृगतृष्णा में।। ...........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

सबकुछ लेलक लपेट

सबकुछ लेलक लपेट ई कोरोना  अब तो नींदो न आवे  खाली पेट का जनि कहिया होव हे अब लछमी से भेंट। चौका चुल्हा  सभे हथ पड़ल उपास लेले मनमें एक विशवास कुबेर के खजाना के कहिया खुल हे गेट। हमनी के महराज से तो एकदमे न होव हे भेंट अयलन हल तबकी कहलन हल आयम जलदी न करम लेट। बकि का कहुँ दीठ गड़ौले ही दुआरी पर असनी बिछौले ही का जनि कखनी आ जैतन महराज ले ले ओने से झोली में अनाज कहतन बाबा लेऊँ आ गेली करेला अपने से भेंट। माफ करूँ जे होयल गलती पाँच बरिस में करीत ही बिनती एक बेर फिर से दे देउँ अपन अशीष पी के सब खीस वादा करित ही ई बेर मिले मे  अब अपनन्हीं से  एकदम न होयेत लेट न करे पड़त हमर वेट कसम कमल के।। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

हो गर दर्द

हो गर दर्द कहीं दबा न  लेनी चाहिये दर्दे दिल में बताई दवा   लेनी चाहिये मासूक को हर शै ये बात मासुका को बता देनी चाहिये ना समझ होते हैं वो  जिन्हें ये बात पता नहीं मुहब्बत में न कोई बात छुपा  लेनी चाहिये दरिया ए दिल महान होता है मनोज न सोंच कुछ भी थोड़ा झुककर ही सही  रूठी हो जिन्दगी तो मना लेनी चाहिये क्या पता कब आ जाये बुलावा परवरदिगारे आलम के यहाँ दिखे जो कहीं कीचड़ में  पद्मनाभ  बस तोड़कर गले से लगा लेनी चाहिये।। .........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

डरता हूँ।

डरता हूँ अब अखबार से।       रोज सबेरे डरता हूँ        अब अखबार से।        खबर न हो कोई        बच्ची के बलात्कार से। किसी लफंगे के बहकावे मे कहीं भाग गई कोई लड़की। हस्त्र क्या होगा कल उसके डरता हूँ इस सोच से।।           मिली है नंगी लाश            किसी यौवना की।             बीती होगी कल की रात              उसके कैसे डरता हूँ               इस सोच से।। एक बेरहम पति ने कर दिया कत्ल अपनी पत्नी का उसे रोकती थी शराब गोशी से।                 एक नवजात बच्ची फेकी                  रात मिली है झाड़ी मे।                   बेदर्द है वह माँ कितनी                    डरता हूँ इस सोंच से।। बाहर किया बेटे...

कातिल कौन।

कातिल  वो नहीं  जो कत्ल करते हैं कातिल तो हम हैं  जो कत्ल को दफन करते हैं कातिलाना मिजाज के बनते ही दफन कर दें  गर जज्बातों को हम  जिगरे कब्र के भीतर मातम पुरसी की नौबत  फिर कहाँ आये ।। ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

हिन्दी के वर्णों का प्रयोग।

*हिन्दी के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयोग* ======================== हिन्दी लिखने वाले अक़्सर 'ई' और 'यी' में, 'ए' और 'ये' में और 'एँ' और 'यें' में जाने-अनजाने गड़बड़ करते हैं...। कहाँ क्या इस्तेमाल होगा, इसका ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए...। जिन शब्दों के अन्त में 'ई' आता है वे संज्ञाएँ होती हैं, क्रियाएँ नहीं। जैसे: मिठाई, मलाई, सिंचाई, ढिठाई, बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, निराई, गुणाई, लुगाई, लगाई-बुझाई...। इसलिए 'तुमने मुझे पिक्चर दिखाई' में 'दिखाई' ग़लत है... इसकी जगह 'दिखायी' का प्रयोग किया जाना चाहिए...। इसी तरह कई लोग 'नयी' को 'नई' लिखते हैं...। 'नई' ग़लत है , सही शब्द 'नयी' है... मूल शब्द 'नया' है , उससे 'नयी' बनेगा...। ● क्या तुमने क्वेश्चन-पेपर से आंसरशीट मिलायी...? ( 'मिलाई' ग़लत है...।) आज उसने मेरी मम्मी से मिलने की इच्छा जतायी...। ( 'जताई' ग़लत है...।) उसने बर्थडे-गिफ़्ट के रूप में नयी साड़ी पायी...। ('पाई' ग़लत है...।) ● अब आइए 'ए' और 'ये...

कलम बिक रही है।

कलम बिक रही है। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 हाँ !आज कलम बिक रही है शायद इसलिये क्योंकि इसका निर्माण कल कारखानों में हो रहा है अब वो समय कहाँ रहा जब खेत की मेढ़ पर अपने से उपजे सरकंडों को तोड़कर लाता था चाकू की तेज धार से तरास कर कलम बनाता था फिर स्याह काजल को घोरकर स्याही बनाता था और तब  बोर बोर कर ताड़ के पत्तों पर एक एक शब्द सजाता था इसीलिये शायद कलम की मोल समझ पाता था तब बाजार कहाँ था जनाब घर की चौखट या आम की अमराईयों में या फिर मंदिरों के दरो दीवार पर ही उपजा करते थे सारे ख्वाब तब मंच नहीं सजते थे वारांगनाओं के नृत्य के लिये महफिलों में ही घुंघरुओं की  झनकार झनकते थे और फना हो जाते थे दर्शक झूमकर इसीलिये शायद अब कामायनी ने घूँघट ओढ़ लिया है क्योंकि वह  वारांगना नहीं थी जिसका मोल लग सके सजी हुई महफिल में यशोधरा भी हो गई मौन क्योंकि अब गौतम बुद्ध बनने को तत्पर नहीं दिखते मधुशाला में भी ताला लटक रहा क्योंकि पीने वाले अब रहे नहीं चेतना के पंख भी अब फड़फड़ा रहे हैं उर्द्धवरेता को धराशायी करने को मेघ भी मंडरा रहे दूत बनकर खोजते कालीदास को कृष्ण का बालपन ढूँढ रहा बाबा सूर को लोरियाँ सुनाने...

सत्यनारायण व्रत कथा।

मित्रोआज गुरुवार है, आज हम आपको भगवान सत्यनारायण की कथा बतायेंगे!!!!!!! सत्यनारायण व्रत की सम्पूर्ण कथा पांच अध्यायों में। हम अपने पाठकों के लिए पाँचों अध्याय प्रस्तुत कर रहे है। सत्यनारायण कथा का,पहला अध्याय!!!!!!!! श्रीव्यास जी ने कहा – एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूत जी महाराज से पूछा – महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं, आप कहें। श्री सूतजी बोले – इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान कमलापति ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूं, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश दुख भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनके दुखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक गये। वहां चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्लवर्ण भगवान...

बाबु ई बिहार हे।

बाबू ई बिहार हे! ************* अरे बाबू ई बिहार हे इहां पढनिहारन के बहार हे। न स्कूल न कालेज न पढ़वेवालन के दरकार. हे चोरी चकारी घूस दरबारी पैरवी आउ लठमारन के भरमार हे।                 अरे बाबू................।. बाबूजी के कहलापर  नाम लिखौली मन के मार गेली पढ़े बस्ता लेके उहां देखली जूतम पैजार हे।                 अरे बाबू.................। सोंच लेलक तहिए मन हमर बस्ता ढोएब न करब दूसर खादी के कुर्ता लंबाआउ पैजामा सटकदार हे। दुनो कंधा पर गमछा लहरदार हे।                   अरे बाबू............। घरे आके सूत गेली हम मार खराटा खरर खरर मैया आके डंटलक जब कहली तोहनी भटक दर दर पढ़ल लिखल पंडित बनल सब्भे इहां बेकार हे लाओ लाठी तेल पिआएम फेंक कलम दे बस्ता ओने एकरे से सरकार हे।            अरे बाबू............। बिन पढ़ले बन जायम मंत्री पढ़ला से रह जायम संत्री आइएस आइपिएस कुछो होएब अइसन नौकर के भरमार हे।               ...

मुस्कुराते मिजाज।

ये सिलवटें भी बयाँ करती हैं जीवन के हालात की किसी के आह की या फिर बीते पल के प्रवाह की इन्हें देखकर ये न समझ लेना चकरघिन्नी है सुखद अहसास की सम्भव है कसक में करवटें बदली हों उसने पूरी पूरी रात की हम कल्पना कर सकते हैं क्या देखकर इन सिलवटों को बीते अवसाद की या फिर किसी के मुस्कुराते मिजाज की। ........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

कुछ भी कोरो ना।

घूँघट में देखकर दिल उछल पड़ा था वल्ले वल्ले शुरु हुये नखरे तो सोंचा  कर लूँगा कब्जे में धीरे धीरे नयी नयी है सँभल जायेगी  पर दिन ब दिन बढ़ते  नखरों को देख  ठान  लिया अब तो जीना मरना है संग तेरे ही फिर रोज रोज क्यों रोना चलो सीख लेते हैं जीना तुम्हारे नखरों के साथ ही चाहे कुछ भी कोरो ना।। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।