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Showing posts from August, 2020

धीरज की लौ।

हवा का रुख बदल रहा है संभल कर चलना पथिक तेज आँधियों में कहीं  उड़ न जायें सपने तेरे। कैद करने को आतुर हैं मछुआरे नदी के तीर पर बंसी में चेरा लगाये जोह रहे हैं बाट तेरे आने की पानी की सतह पर। पाँव जमाये रखना  तब तक जमीं पर तुम जब तक तूफान का दौर थम न जाये। अमावश की रात से पूनम की चाँदनी तक पहुँचने में वक्त लगता है धीरज की लौ कहीं बूझने न पाये। .....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

अंधभक्ति।

ये जमाना अंधभक्ति का है वाक्चातुरी की शक्ति का है जरूरत नहीं समझते तर्क की परीक्षा की घड़ी हर व्यक्ति का है।। रामलाल ने सर मुंडवा लिया श्यामलाल भी सर मुंडवाने चल पड़ा कमाल भला पीछे कैसे रहता छेदामलाल ने भी जो सर मुंडवा लिया।। छग्गनमल ने देखा मुड़ियों को पूछा कारण तो बताओ मुंडन का श्यामलाल कमाल छेदामलाल तीनो बोले पूछ लो पीछे है रामलाल।। रामलाल ने सर झुकाकर कहा बहुत प्यारा था मन का दुलारा था बहुत दिनो से घर का रखवाला था चुपचाप दिया खा लेता हर निवाला था बेचारा मर गया गधा मेरा हरदिल अजीज बिना सर मुड़ाये भला कैसे रहता ये नाचीज।। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

अंधभक्ति।

ये जमाना अंधभक्ति का है वाक्चातुरी की शक्ति का है जरूरत नहीं समझते तर्क की परीक्षा की घड़ी हर व्यक्ति का है।। रामलाल ने सर मुंडवा लिया श्यामलाल भी सर मुंडवाने चल पड़ा कमाल भला पीछे कैसे रहता छेदामलाल ने भी जो सर मुंडवा लिया।। छग्गनमल ने देखा मुड़ियों को पूछा कारण तो बताओ मुंडन का श्यामलाल कमाल छेदामलाल तीनो बोले पूछ लो पीछे है रामलाल।। रामलाल ने सर झुकाकर कहा बहुत प्यारा था मन का दुलारा था बहुत दिनो से घर का रखवाला था चुपचाप दिया खा लेता हर निवाला था बेचारा मर गया गधा मेरा हरदिल अजीज बिना सर मुड़ाये भला कैसे रहता ये नाचीज।। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

डेरा गेली हम तो।

डेरा गेली हम तो। ........................ बटेसरा भोरे भोरे दूरा पर आके बैठ गेल।तुरते मुँह हाँथ धोके बैठवे कैली हल।देख के मिजाज तो कूढ़ गेल।बकी का करूँ।दूरा पर आयेल अमदी के भगाना भी ठीक न हे।ओहु गाँव के।बगले के टोला में रहे वाला।बटेसरा से हाल चाल पुछतहीं हली कि सोनुआ गुरीच आउ तुलसी वाला काढ़ा लेके घरे से आ गेल।भौजी जान हथ कि आजकल हम चाह न पिअही।भोरे पहर मुँह धोला के बाद तुलसी,गुरीच, गोलकी,घिकुआर के गुद्दा,आदी,जावित्री आउ दूगो लौंग,एगो इलाईची के काढ़ा तनि सुन गुड़ मिला के पीअ ही।ई चलते भौजी सबेरहीं हमरा मुँह धोवे के पहिले कढ़वा बना दे हथ।आजो दूरे पर हली ओइसिहीं सोनुआ से काढ़ा भेज देलन एक कप।अब बटेसरा भी बैठल हल त ओकरो पुछना जरूरी हल।पुछली कि काढ़ा पीमे हो,हम तो चाह न पीअ हिअउ।ऊ कहलक कि न बाबु हमनी ई सब न पीओ।के एतना बनाके देतो रोज।जनबे कर ह आजकल के बेटी पुतोह के।सुत उठ के पहिले चाह बिना पीले ओकर दिने न उठ हे।लचारी में हमरो पीये पड़ हे।ऐसे भी अभी मन बड़ी घबराइत हो ।जखनी से चुलहन बाबु के देख के अएलियो हे बड़ी अकबक लगैत हो।बटेसरा के ई बात सुनके काढ़ा पियैत हमरो मिजाज गड़बड़ा गेल।चुलहन बाबु अमदी बढ़िया हथ...

गंध अभी बाकी है।

गंध बाकी है अभी  उनके यादों की लब पे लबों की छुअन  बाकी है अभी।। हैँ परेशानियां  जिन्दगी की राहों में बहुत बाकी है पर अभी  उम्मीदों का हौसला।। बढ़ा देती हैं बेहद  तनहाइयाँ मेरा दर्दे दिल हसरतें बाकी हैं अभी  विसाले यार की।। मुफलिसी में  गुजर रहा है वक्त अपना पर शेष है अभी  जोशे अमीरे कारवां।। मानता हूँ जिन्दगी की नाव  कमजोर है अभी पर समन्दर की लहरों से  खेलना बाकी है अभी।। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

शिक्षा पूर्ण हो गई।

साईकिल मिली शिक्षा पूर्ण हो गई पोशाक मिला विद्या प्राप्त कर ली छात्रवृत्ति मिल गई न समझ लो ज्ञान मिल गया विद्यालय का भवन बन गया रख दी गई आधारशिला भविष्य की प्रोत्साहन राशि ने फैलाया घर घर प्रकाश  चुनाव से ही तो होता है राज्य और देश का विकास चावल लिया न  हो गई दर्ज उपस्थिति अब जाओ घर करो खुद से तैयारी गुरु जी कर रहे हैं चुनाव की मगजमारी बनाना है वोटरलिस्ट वर्ना नाराज हो जायेंगे ईष्ट वैसे भी अभी कोरोना है बंद हैं स्कूल बदल गये हैं सब रूल ऐसे में भला क्या रोना है घबराओ नहीं  सब कर जाओगे पास अभी तो बस चुनाव जीतने की है आस देख लो अब तक के विकास की फेहरिस्त सड़कों का जाल बिछाया ओवरब्रिज बनवाया नली गली बने न बने  अपने नाम की पट्टी लगवाया जात देखकर नल जल का  पाईप बिछाया फर्जी बिल बिजली का हर घर भिजवाया लाकडाउन में फ्री अनाज की नदी बहाया बाढ़ राहत के नाम पर पानी की तरह पैसा बहाया आने दो फिर से एकबार बनने दो पुनः मेरी सरकार सबके घर समृद्धि आयेगी सच कहता हूँ तुम बोलने के लायक नहीं रहोगे सबकी शिकायत दूर हो जायेगी।। ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

बिल्वपत्र महिमा।

एक अनसुनी कथा। ये तो आप सभी जानते हैं कि बिल्वपत्र शिवजी को अत्यंत प्रिय है। सिर्फ बिल्व पत्र चढ़ाने से ही शिव जी पूर्ण पूजन का फल साधक को दे देते हैं। आखिर क्यों है बिल्वपत्र शिव जी को प्रिय, और क्या है इसके उत्पत्ति की कथा : - विष्णुप्रिया यानि लक्ष्मीजी के वक्ष:स्थल से प्रादुर्भूत हुआ बिल्ववृक्। लक्ष्म्या: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्। बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि बिल्वपत्रं शिवार्पणम्।। अर्थात्–बिल्ववृक्ष महालक्ष्मीजी के वक्ष:स्थल से उत्पन्न हुआ और महादेवजी का प्रिय है, मैं एक बिल्वपत्र शिवार्पण करता हूँ। वृहद् धर्मपुराण में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति सम्बधी कथा– इसके अनुसार बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति लक्ष्मीजी द्वारा स्तन काटकर चढ़ाने से हुई। लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए शिवजी का घोर आराधन व तप किया।  अंत में लक्ष्मीजी ‘ॐ नम: शिवाय’ इस पंचाक्षर मन्त्र से एक सहस्त्र कमलपुष्प द्वारा शिवजी का पूजन कर रहीं थीं तब शिवजी ने उनकी परीक्षा करने के लिए एक कमलपुष्प चुरा लिया। भगवान विष्णु ने जब एक सहस्त्र पुष्पों से शिवजी की अर्चना की थी, उस समय भी भगवान शिवजी ने एक...

कुशाभिषेक।

कुशाभिषेक एक अद्भुत प्रयोगः-  ज्योतिष शास्त्र में सताइस नक्षत्रों की चर्चा है,  जो इस प्रकार हैः-   १. अश्विनी २. भरणी ३. कृत्तिका ४. रोहिणी ५. मृगशिरा ६. आर्द्रा ७. पुनर्वसु ८. पुष्य ९. अश्लेषा १०. मधा ११. पूर्वाफाल्गुनी १२. उत्तरा फाल्गुनी १३. हस्ता १४. चित्रा १५. स्वाती १६. विशाखा १७. अनुराधा १८. ज्येष्ठा १९. मूल २०. पूर्वाषाढ़ २१. उत्तराषाढ़ २२. श्रवण २३. धनिष्ठा २४. शतभिष २५. पूर्वाभाद्रपद २६. उत्तराभाद्रपद २७. रेवती   ऊपर दिये गए नक्षत्र-तालिका में हम देखते हैं कि चित्रा चौदहवां नक्षत्र है। अब चित्रा को एक मानकर पुनः गणना करें, तो सारिणी इस प्रकार बनेगी—(चित्रा से प्रारम्भ करके, चार पंक्तियों में सताइस नक्षत्रों को सजाने पर प्रत्येक पंक्ति का प्रथम नक्षत्र क्रमशः)—चित्रा, पूर्वाषाढ़, रेवती और पुनर्वसु हो रहा है। हमें इन चार का चुनाव करना है। अब, पवित्र मुहूर्त में गमले में कुशा रोपण करेंगे और नियमित रुप से उसे जल से सींचते रहें, ताकि पौधा विकास करता रहे। करीब एक हाथ (अठारह ईंच) लम्बा हो जाने पर कुश का पौधा प्रयोग करने योग्य हो जायेगा। पंचांग में देखकर निश्चित क...

भारतीय संस्कृति और ब्रजराज "श्रीकृष्ण"।

भारतीय जीवनशैली हो या साहित्य,कला अथवा संस्कृति सबकी पहचान कृष्ण से ही बनती है।भारत की राजनीति अथवा भारतीय धर्म के मर्म को  जानना है तो कृष्ण को जानना ही होगा,क्योंकि कृष्ण का चरित्र ही भारतीय अस्मिता का आधार है।एकमात्र कृष्ण ही हैं जिनमें सोलहो कलायें विद्यमान हैं।जिस प्रकार पूनम का चाँद सोलह कलाओं से युक्त होने के कारण पूर्ण चंद्र की संज्ञा पाता है ठीक वैसे ही श्रीकृष्ण भी पूर्ण ब्रह्म हैं।मानवीय स्वरूप का समग्र दर्शन हमें कृष्ण के रूप में प्राप्त होता है।नृत्य,गीत,नाद,सौंदर्य,वाक्पटुता,राजनीति,योग,आध्यात्म का समग्र चिंतन उपलब्ध है कृष्ण में।गोपालन,गोचारण,गोदोहन से लेकर विप्रचरणवंदन तक यदि देखना समझना हो तो श्रीकृष्ण के निकट जाना ही होगा।समाज के सबसे पिछले पायदान पर बैठे व्यक्ति को सम्मानित करने की कला या रणांगण में आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण समझना चाहते हैं तो बिना श्रीकृष्ण शरणागति के असंभव है।इस कर्ममय संसार में बिना कर्मयोग के जाने यदि हम आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तो असफलता ही हाँथ लगती है।इसीलिये श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग के माध्यम से सफल जीवन का मर्म समझाया है कृष्ण...

प्रश्नोत्तर।

*आए दिन हमलोग इस तरह के प्रश्नों का सामना करते हैं  खासकर बच्चों द्वारा। कृपया एक बार अवश्य पढ़ लें* "क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ? यदि खाते हैं , तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती और यदि नहीं खाते हैं , तो भोग लगाने का क्या लाभ ?"  -  एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से प्रश्न किया । गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया । वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे । उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया  -       पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।       पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥       पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने सभी शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें ।       एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं । उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया । फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया , तो शिष्य ने कहा कि  -  " वे चाहें , तो पुस्तक देख लें ; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है ।” गुरु ने पुस्तक दिखाते ...

गोपी चीर हरण।

.    #परम_पवित्र_कथा_है_गोपी_चीर_हरण_की,              बड़ा गंभीर प्रसंग है,      चौरासी कोस के ब्रजमंडल में रहने वाली जो गोपी है, प्रातः ब्रह्म मूहूर्त में उठ जाती हैं, प्रातः चार बजे से लेकर साढ़े पांच बजे तक का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, सर्दी के दिनों में प्रातः चार बजे बहुत अन्धकार रहता है।      चार बजे सर्दी के दिनों में गोपी उठकर जातीं, पूरे कपड़े उतारकर यमुना किनारे रख देतीं और बिल्कुल निर्वस्त्र होकर यमुना स्नान करतीं, यमुना स्नान करके वे फिर अपने वस्त्रों को पहन लेती और कात्यायनी माता की पूजा करतीं, माता कात्यायनी की धूप-दीप नैवेद्य से पूजा करके मांगती है क्या?          #कात्यायनी_महामाये__महायोगि_न्यधीश्वरि।         #नन्द_गोप_सुतं_देवि_पतिं_मे_कुरू_ते_नमः।।      हे माता कात्यायनी ! हम आपके चरणों में प्रणाम करतीं है, नन्दगोप के पुत्र श्री कृष्ण ही हमें पति रूप में मिले, ऐसा आशीर्वाद दे दो।       ऐसा सुन्दर भाव, इस भाव का...

चोरवो करे चोर चोर।

चोरवो करे चोर चोर। ***************** कल्हे के बात हे।हमर गाँव में बढ़नमा के घर चोरी हो गेल।घर के सब परिवार कोठा पर सुतल हलन।सावन के अंतिम सोमारी हल ।दिनभर के बरत ,पूजा पाठ से थकल सबके नींद आ गेल।गरमी के चलते घर में मच्छड़ लगित हल ई चलते सबकोई कोठे पर सुते चल गेलन।मोका बढ़िया देख के नीचे कमरा मे रखल बक्सा तोड़ के गहना जेवर सब चोर चोरा के ले गेल।होत पराते कोठा पर से जखनिये सबकोई नीचे उतरल टुटल बक्सा देख के रोवा पीटी शुरु हो गेल ।भोरौकिये के बाते हल टोला के सबकोई जुट गेलन।जे देखलक सबकोई अफसोस करे लगल।बेचारा बढ़नमा मेहनत मजूरी करके बेटी के बिआह लगी थोड़ बहुत रुपैया पैसा ,कूछ कपड़ा,कुछ गहना भी बना के रखलक हल।चोरवन सब उठा के ले गेल।एही बीच चर्चा छिड़ गेल कि आखिर ऐसन के कर सक हे।कोई बाहर के तो होयेत न।या तो घरे के कोई होयत आउ न तो अगले बगले के कोई होवत।टोला जेवार के जेतना लोग जुटल हलन सब कोई चर्चा में शामिल हलन।ओही में बखोरना भी बैठल हल।गुमसुम चुपचाप।चर्चा होईत होईत सबके विचार होयेल कि एकल खबर थाना में चल के दे देवे के चही।दरोगा जी अएतन ऊ चोर के पकड़तन।सब समान एकर मिल जायेत।सबकोई ई बात पर हुँकारी भर द...

जैसन करनी वैसन भरनी।

जैसन करनी वैसन भरनी। ..................... सुते के मूड में हली ।बकि एतिये घड़ी गजोधर भाई के चलभाष चलैत चलैत हमरा भिरी पहुँच गेल।समझ गेली जरूर कोई खास बात होयेत तबे ई बेरा गजोधर भाई के चलभाष चलके आयेल हे।काहे कि हम जान ही ई लौकडाउन के बेरा में गजोधर भाई जल्दी अपन चलभाष के भी कहीं जाये न दे हथ।ई कोरोना से बड़ी डेरायल हथ।उनका लग हे कहीं चलभषवो न कोरोना के चपेट में आ जाये।अब का करूँ मन तो न करैत हल बकि उठावहीं पड़ल।ओने से अपन पुरनके अंदाज में गजोधर भाई के बोली सुनायल "सुतल हली का बाबा ।माफ करब।चाहैत तो न हली ई घड़ी बतियाय ला बकि अइसने बाते हो गेल हे कि लगल अपने के एही घड़ी बता देउँ।कोई बात न हे अगर मन न करैत हे त सुतुं कल भोरे बतियायब।"उनकर एतना बात सुनके हमरो नींद उचट गेल।हम कहली कि न न गजोधर भाई।जे बोले ला हे बोलिये द भोरे तक बात बसिया जायत त मजा न आवत।एही घड़ी कह द।अंधरा के आउ का चही दू गो आँखे न।हमरा इशारा करे में भले देर लगल गजोधर भाई के बात शुरु करे में जरको देरी न भेल।शुरु हो गेलन।जनै थी बाबा ऊ बगल के टोला में जे खदेरना रह हे ओकरा अपने जानैत ही न।हम कहली हाँ जनबे कर ही।बटोरना के...

संस्कृतम्।

जयतु संस्कृतम् वदतु संस्कृतम्।। संस्कृत दिवसस्य वेलायाम् संस्कृतम् प्रति ह्रदयोद्गारोयम्मम। *संस्कृतम् विना न संस्कृतिः। *संस्कृते एव आचाराः विचाराः भावनाश्च सन्ति।यत्रेमे भवन्ति तत्रैव संस्कृतिः। *अस्यामेव भारतीय भाषाणाम् जीवनम्। *अस्यामेव भारतीयाः भाषाः निर्गताः। *एतदर्थ सा भाषाणाम् जननी कथ्यते। *नेयं मृता भाषा। *इयं तु अजरा अमराश्च। *सा अद्यापि जीवति। *सर्वाः भारतीय भाषाः संस्कृत भाषायाःऋणं धारयंति। *अत्रैव प्राचीनम् वेदादि शास्त्रं रचितम्। *संस्कृत भाषा सरला भाषा न सा कठिना। *संस्कृत भाषायाम् खगोल विज्ञानः,बीज गणितम्,चिकित्साशास्त्रं,भौतिक विज्ञानम्,रसायन शास्त्रं,वनस्पति शास्त्रं,वास्तुविज्ञानम्,विधिशास्त्रं,संगीतशास्त्रं इत्यादीनि नानाग्रंथानि प्रकाशितानि सन्ति। *संस्कृतम् तु अतीव उपयोगिनी भाषा। अतेव सर्वैरस्माभिः मनोयोगेन संस्कृतम् पठनीयम्,वाचनीयं,वदनीयं च।धन्योयम्। साभारम् .........मनोज कुमार मिश्रः"पद्मनाभ"।

मोहरा।

मैं तो एक मोहरा हूँ शतरंज का बिसात सजी है खिलाड़ी अपने हिसाब से जब चाहे जैसे चाहे इस्तेमाल कर ले हार या जीत  इसकी परवाह नहीं किसी को वो तो सिर्फ खेलना जानता है पिटना तो होता है सिर्फ मोहरे को सह मात के इस खेल में चाल सीधी हो या टेढ़ी हाँथी घोड़े या सिपाही सब पिटते ही हैं सुल्तान तो तमाशा देखता रहता है खेल के अंत तक।। ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

मधुराभाषा।

मधुरा भाषा संस्कृत भाषा। मित्रों श्रावण पूर्णिमा को हम संस्कृत दिवस के रूप में मनाते हैं।ऐसी परम्परा शदियों से चली आ रही है।हम भी इसके निर्वहन में अपने आपको पीछे नहीं रखना चाहते।आज के दिन अनेक संस्थानों, संगठनो के द्वारा गोष्ठियों का आयोजन कर इसके महत्व पर खूब बढ़ चढ़ कर वार्ता होती है।ऐसा लगता है मानो अब हर किसी के घर में आम बोलचाल की भाषा संस्कृत ही होगी।गौर करने वाली बात ये है कि सभी कार्यक्रम किसी भी सामाजिक संगठन या व्यक्ति विशेष के द्वारा ही प्रायोजित होते हैं किसी सरकारी या गैरसरकारी शिक्षण संस्थान के द्वारा नहीं,या होता भी है तो इनकी संख्या इतनी ही होती है जितने में अनुपस्थिति का भान न हो।वह भी सिर्फ आज ही केवल चंद लोगों के द्वारा खानापूर्ति के रूप में।कोई  मीडिया भी इसके प्रचार प्रसार से परहेज ही करती है।अगले दिन इसे तब तक के लिये विराम  दे दिया जाता है जबतक पुनः संस्कृत दिवस न आ जाये।ऐसे मे यह प्रश्न लाजिमी है कि क्या इतने से हम इस अजर अमर भाषा को संरक्षित कर पायेंगे?क्या विद्यार्थियों या अभिभावकों से इतर चंद तथाकथित संस्कृत प्रेमियों के इस विषय में थोड़ी वार्षिक चर्चा ...

ब्राह्मण देवता।

ब्राह्मण को क्यों शास्त्रों में कहा गया है देवता, जानना चाहते हैं ज़रूर पढ़ें ये 2019-12-08T12:52:37.963      शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ आप में से लगभग लोग जानते होंगे कि हिंदू धर्म में ब्राह्मण देवता तो किसी देवी-देवता के कम नहीं माना जाता। कहने का भाव हैं इन्हें भी देवी-देवताओं की ही तरह पूजनीय माना जाता है। मगर इन्हीं लोगों में से बहुत से लोगों के मन में ये सवाल भी आया होगा कि आख़िर क्यों ब्राह्मण को देवता का रूप माना जाता है? इसके पीछे का कारण क्या है? दरअसल इस बात का विवरण धार्मिक ग्रंथों में बाखूबी किया गया है। जी हां शास्त्रों से जानते हैं कि क्यों ब्राह्मण को देवता समान पूजनीय माना जाता है। शास्त्रीय मत- पृथिव्यां यानी तीर्थानि तानी तीर्थानि सागरे । सागरे सर्वतीर्थानि पादे विप्रस्य दक्षिणे ।। चैत्रमाहात्मये तीर्थानि दक्षिणे पादे वेदास्तन्मुखमाश्रिताः  । सर्वांगेष्वाश्रिता देवाः पूजितास्ते तदर्चया  ।। अव्यक्त रूपिणो विष्णोः स्वरूपं ब्राह्मणा भुवि । नावमान्या नो विरोधा कदाचिच्छुभमिच्छता ।। अर्थात- उपरोक्त श्लोक के अनुसार पृथ्वी में जितने भी तीर्थ ...

संस्कृतम्।

संस्कृति संस्कारस्य भाषा संस्कृत भाषा। *************** वर्त्तमान संघर्ष एवं घात प्रतिघात को झेलते हुये भी इस भौतिक जगत में देववाणी संस्कृत अपनी समृद्ध श्रेष्ठता को कायम रखकर भारतीय भाषावाङ्मय में अपना ध्वज लहरा रहा है।अभिनव साहित्य एवं शास्त्रीय सृजन के द्वारा अपना कीर्तिमान स्थापित करने में सक्षम है।कतिपय विद्वान तो यह भी मानते हैं कि संस्कृत के विकास के लिये बीसवीं शदी का काल स्वर्णकाल के रूप में माना जायेगा।कारण यह है कि संस्कृत भाषा में जितनी रचनायें इस शताब्दी में हुईं उतनी शायद पूर्व में नहीं हो पायीं।इससे स्पष्टतया यह प्रतीत होता है कि देववाणी संस्कृत आज भी पूर्णतया जीवंत है।भाषा मानकों के आधार पर भी यदि आकलन किया जाय तो एक आधुनिक संपन्न भाषा के लिये जितने भी मानक वैज्ञानिकता के आधार पर निर्धारित किये गये हैं उनमें सर्वोपरि स्थान इस एक भाषा को ही जाता है।प्राचीनता के साथ साथ आधुनिकता का परिदृश्य भी हमें अपनी संस्कृति के प्रति प्रबुद्ध बनाता है।आधुनिक विषयों को भी आत्मसात करने की ओर यह प्रवृत्त करता है।राष्ट्रीय एकता को अक्षुण्ण रखने के लिये बहुभाषिक राष्ट्र में एकमात्र इस भाषा क...

अन्नपूर्णा।

माता अन्नपूर्णा साबर मंत्र साधना आज के इस आधुनिक युग और आर्थिकी परिवेश में सम्पन्न आर्थिक स्थिति वालो को अधिक मान्यता, सम्मान दिया जाता हैं | मानव का कोई मूल्य ही नहीं रहा, धन, दौलत ही मुख्य सर्वश्री का स्थान ले चुकी हैं |  जिस इन्सान के पास धन का आभाव हैं, वो खुद ही अपनी आर्थिक स्थिति से परेशान हैं, घर का खर्चा, ये लाना, वो लाना, उसका कर्जा, इसका कर्जा ना जाने किस किस की परेशानी पाल रखी हैं वो भी केवल “धन” आधारित | बिना धन के इन्सान कुछ सोचने, करने लायक नहीं रहता, सोच सकता हे तो धन की टेंसन परेशान करती हैं | कुछ भी हो आज इन्सान के जीवन में इन्सान, रिश्तो से ज्यादा “धन” की अहमियत हैं | अगर आपके पास धन हैं तो आप को आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ेगा, लोगो से सम्मान, प्रेम, साथ सब मिलेगा, और अगर आपके पास धन नहीं हैं तो आपको लोगो के ताने, गुलामी, घृणा आदि का सामना करना पड़ता हैं | आपके सामने ऐसी ही एक साधना बताने जा रहा हूँ जो आप इस दिवाली से शुरू करे जिसके प्रभाव से आप अपने कष्टो से छुटकारा पा सकोगे और आपकी आर्थिक स्थिति भी सुधर जाएगी | और आर्थिक स्थिति भी सुधर जाने से घर परिवार में...