मानवीय मुल्यों के आधार
भगवान राम
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रामनवमी का पावन त्योहार बड़े ही धूमधाम से संपन्न हूआ।बड़े बड़े समूह में बड़ी बड़ी पताकाओं ,ढोल ,नगाड़े,बैंड बाजे ,तलवार ,भाले,कहीं कहीं अत्याधुनिक शस्त्रों संग आम अवाम ने खूब मस्ती की।हम मंदिर वहीं बनायेंगे के कर्ण कटु स्वर से सम्पूर्ण वातावरण गुंजायमान होता रहा।गली कूचों से लेकर चौक चौराहों और राजमार्ग तक जनसैलाव दीखा।जिसे देखा भगवा
पगड़ी में भगवे ड्रेस पहने पूरे जोशो खरोश से जय श्रीराम के गगनभेदी नारों में मशगूल दिखा।कई संगठनों ने भी इनकी अगवानी में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया।अहले शुबह से देर रात तक सम्पूर्ण देश ने इसी प्रकार अपनी उपस्थिति प्रदर्शित की।
एकता अखंडता के बड़े बड़े नारे भी जहाँ तहां बड़े बड़े बैनर पोस्टर की शक्ल में दिखे।पर एक प्रश्न इन सबको देखने के बाद पूरी रात परेशान करता रहा।क्या राम का आदर्श यही था?हम जिसे मर्यादा पुरुषोत्त्तम की संज्ञा से अभिहित करते हैं उसने ऐसी ही मर्यादा का पाठ पढ़ाया है।?
राम आदर्श हैँ शांति के,मर्यादा के,सामाजिक समरसता के,।त्याग के आत्म बलिदान के,सादगी के,मातृपितृ भक्ति के,गुरु के प्रति श्रद्धा के,एक समरस समाज के निर्माता राम।
एक खुशहाल जीवनशैली के प्रतीक राम।एक समुन्नत राष्ट्र के निर्माता राम।एक स्वच्छ राजनीति के पोषक राम।भाइयों के प्रेरणाश्रोत राम।एक सर्वगुण सम्पन्न पति श्री राम।एक कुशल मित्र श्री राम।विवेक और बुद्धि के अतुलनीय खान श्रीराम।
विद्या के सफल अध्येता श्री राम।आखिर हम इनमें मे कौन सा गुण आत्सात करने की प्रेरणा इन आयोजनों के माध्यम से समाज को दे रहे हैं?असरस समाज, मातृपितृ प्रताड़ना का संदेश,पत्नी हंता पति बनने की प्रेरणा,धोखेबाज मित्रता की मिशाल,गुरु के प्रति अश्रद्धा का भाव,विद्या के नाम पर अविद्या,समाज तोड़क राजनीति का पाठ कुत्सित मनोभाव नारियों को सिर्फ भोग्या समझने की सीख,जातिगत भेदभाव की राजनीति या और भी ऐसे ही बहुत कुछ।हमें भगवान ने आंखें दी हैं, देखने के लिए।एक उन्नत मस्तिष्क दिया है सोचने विचारने के लिए।सुन्दर जुबान दी है विचारों की अभिव्यक्ति के लिए।यदि हम इसका इस्तेमाल किये बगैर अंधों की भांति सिर्फ इशारों पर दौड़ते हैं तो फिर राम की मर्यादा तो तार तार होगी।फिर राम मेरे आदर्श कैसे?
💐💐मनोज💐💐
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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