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Showing posts from June, 2018

हमारी बिसात

आज एक पेड़ के नीचे भग्न विग्रह को देखा उस पर न चंदन न फूल न ही प्रसाद के कण समझ गया टूट जाने के बाद जब लोग भगवान को भी भूल जाते हैं फिर हमारी बिसात ही क्या?                                 💐💐मनोज💐💐

आदर

कल घर पर एक मेहमान आये प्रमादवस मैंने उनका आदर नहीं किया जाते हुए हस्त से स्पर्श भी नहीं कर पाया परम पावन पाँव का वे चले गये किन्तु उदास से छोड़ गये मेरे लिये चिन्तन पता नहीं फिर आयेंगे भी या नहीं? यह भी एक इत्तफाक ही है कि कल ही शाम को आदर भी आया पर बादर नहीं लाया बेचारी चादर इसी की आश में निहारती रही नीले आसमान को अबतक सूखी फटी दरारें लिये। बेचारे धरतीपुत्र भी तो आँखें फाड़ फाड़ देख रहे हैं उमड़ते घुमड़ते श्यामल तन लिये आते जाते मेघ को। याद आई इन्हें देखकर बुजुर्गों की कही वह बात आवत आदर ना दिये जाते दिये न हस्त इतने में दोनो गये पाहुन और गृहस्त।                                     💐💐मनोज💐💐

बेसहारा

********बेसहारा******** उम्र सारी बीत गई यारों न किसी के हम हुए न कोई हमारा हुआ। वक्त जब चलने का हुआ सारी हेकड़ी धरी की धरी रह गई बस मुझे ढोने को चार जन का सहारा हुआ।                 💐💐मनोज💐💐

योगः

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः पातञ्जलयोग सूत्र के अनुसार योग से चित्त की वृत्तियों का शमन होता है।अर्थात् योग हमें हमारे चित् को शुद्ध कर दुष्प्रवृत्तियों से इतर सद्प्रवृत्तियों की ओर  ले जाता है।और जब हम सद्वत्तियों को धारण कर लेते हैँ तब हमारा योग पराशक्तियों से होता है।अर्थात हम ईश्वर का साक्षात्कार कर पाने में सक्षम हो पाते हैं।त्रेलोक्य योगेश्वर भगवान कृष्ण ने संपूर्ण गीता में इसे ही प्रतिभाषित किया है।तभी तो स्वयम् कहते हैं"योगक्षेमं वहाम्यहम्"।    अतः आज विश्व योग दिवस पर जगतियोगेश्वर श्री कृष्ण को नमन निवेदित करते हुए आप सबको अशेष शुभकामनाएं ।           योगः कर्मसुकौशलम्।।                                       💐💐मनोज💐💐

छाप तिलक

छाप तिलक अब रहा नहीं कलम सियाही सोख छात्र धर्म भी खतम हुआ छतरी छाया हीन भूमिहीन हैं हो रहे भूमिपुत्र भू हीन। बुद्धि जड़ता प्राप्त हुई हम तो हो गये दीन हीन। दादा हाथी रखते थे सिक्कड़ को हम ढो रहे। सिक्कड़ को भी जंग लगा पर सुखद स्वप्न में सो रहे।                                       💐💐मनोज💐💐

बलात्कार

ए बाबु ई तो बहुते बढ़िया सरकार हे जेकर राज में रोज बलात्कार हे लाचार बेबस पति आउ बाप बेचारा बनल पेड़ से बंधल अप्पन आँखे देखैत सब अत्याचार हे सब देखैत सुनैत हथ सब कोई तैयो बड़ी जोश में कह हथ इहाँ तो सुशासन बरकरार हे जब भी घट हे ऐसन कोई घटना शुरु हो जा हे करेजा सबके फटना पहिले कोई कुछ न सोच हथ आखिर एकरा से बचे लेल हमनी के का करतब हे करना जे कैलक बलात्कार ओकरा मार जूता चार कोई कोई इहो कह हथ एतना मार कि मर जाये सार बकि सोंच ऊ के हे हम ही तु ह आउ हमनिये के ई रेंगन हे चेंगन हे शरम से मूड़ी झुक जा हे समाचार जब कान में सुना हे सब कोई बतियैला पर एही कह हे हमनी ही अथवा लचार ए बाबु लग हौ सच्चे में बिहार हौ बिमार काहे कि इहाँ लगतरिये होइत हौ बलात्कार।।                                     💐💐मनोज💐💐

दिखता नहीं

दिखता नहीं ................. ये मुर्दों का शहर है जिन्दादिल क्या खाक जीयेंगे जहाँ हर शख्स बुत बना बैठा सिले होठों को लेकर गिले हैं जब्त हर सीने में यहाँ मगर डर है कि कहीं रूक न जाये धड़कन खुली है आँख मोतियाबिंद की नाईं सुनाता कान में है स्वर मगर दिखता नहीं कुछ भी।।                                       💐💐मनोज💐💐

बाबु ई बिहार हे

बाबू ई बिहार हे! ************* अरे बाबू ई बिहार हे इहां पढनिहारन के बहार हे। न स्कूल न कालेज न पढ़वेवालन के दरकार. हे चोरी चकारी घूस दरबारी पैरवी आउ लठमारन के भरमार हे।                 अरे बाबू................।. बाबूजी के कहलापर नाम लिखौली मन के मार गेली पढ़े बस्ता लेके उहां देखली जूतम पैजार हे।                 अरे बाबू.................। सोंच लेलक तहिए मन हमर बस्ता ढोएब न करब दूसर खादी के कुर्ता लंबाआउ पैजामा सटकदार हे। दुनो कंधा पर गमछा लहरदार हे।                   अरे बाबू............। घरे आके सूत गेली हम मार खराटा खरर खरर मैया आके डंटलक जब कहली तोहनी भटक दर दर पढ़ल लिखल पंडित बनल सब्भे इहां बेकार हे लाओ लाठी तेल पिआएम फेंक कलम दे बस्ता ओने एकरे से सरकार हे।            अरे बाबू............। बिन पढ़ले बन जायम मंत्री पढ़ला से रह जायम संत्री आइएस आइपिएस कुछो होएब अइसन नौकर के भरमार हे।                     अरे बाबू............।                               💐💐मनोज💐💐

क्या करूँ

क्या करूँ कुछ समझ आता नहीं बैठे ठाले से वक्त जाता नहीं एक वक्त था जब हुजूमे अता फर्मावदार थीं एक वक्त है जब कोई किसी को याद आता नहीं फुर्सत नहीं थी काम से तब राम याद आते नहीं थे महरूम हूँ जब काम से अब मुफलिसी में राम याद आते नहीं जिनको दिया था साथ अपना बुरा वक्त मैं जानकर दर किनारे हो गये वो मुख मोड़ते पहचान कर अपनी तो आदत है वही जाने जिगर डंक मारता हो वृश्चिक फिर भी तू सप्राण कर।।                                    💐💐मनोज💐💐

हम तुम्हारे साथ हैं

तुमने तो कहा था आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं मैने बढ़कर आगे सीने पे गोलियाँ खाई चोटिल लहु लुहान हुआ पर पीठ ना दिखाई बदहवासी में तेरी कही बात जब मुझको याद आई अचानक पीछे मुड़कर देखा कंधे पे मैंने तेरी हाथ नहीं पाई।।                                         💐💐मनोज💐💐

वक्त

वक्त बीतता नहीं रहता हूँ परेशान कर याद बीते वक्त को अब हो रहा हैरान कल तलक भीड़ में था खोया हुआ अब तड़पता हूँ जब अकेला हुआ अहमियत वक्त की है वक्त पर ही  दोस्तों वक्त का मारा हुआ आंसू बहाता रह गया मित्र हो या शत्रु कि पहचान है बस वक्त ही जिसने न जाना वक्त को हैरान है बेवक्त ही दौलत भी लाता वक्त ही शोहरत दिलाता है गर वक्त दे ना साथ जो हिम्मत डोलाता है वक्त का मारा हुआ इन्सां गर टूट जाता है फिर वक्त ही उंगली पकड़ बढ़ना सिखाता है वक्त देगा साथ जो वक्त की पहचान कर उंगली पकड़ तू वक्त की मित्र तेरा जानकर कल तलक भी वक्त था है आज भी तो वक्त ही कल भी होगा वक्त तेरे साथ मनुज पहचान कर।।                                         💐💐मनोज💐💐

पर्यावरण

पर्यावरण दिवस विशेष ............................... स्वच्छ वायु शुद्ध जल प्रदूषण मुक्त वातावरण है जरूरत आम जन की पर वृक्ष दोहन जल अरक्षण विषयुक्त है पर्यावरण पहचान ही गर चाहते हो प्राण वायु गर चाहिए जो नीर शुद्ध बस एक आरजू है मनुज तू दान कर एक पौध बन जा शुद्ध बुद्ध प्रबुद्ध।।                                      💐💐मनोज💐💐