कल घर पर एक मेहमान आये प्रमादवस मैंने उनका आदर नहीं किया जाते हुए हस्त से स्पर्श भी नहीं कर पाया परम पावन पाँव का वे चले गये किन्तु उदास से छोड़ गये मेरे लिये चिन्तन पता नहीं फिर आयेंगे भी या नहीं? यह भी एक इत्तफाक ही है कि कल ही शाम को आदर भी आया पर बादर नहीं लाया बेचारी चादर इसी की आश में निहारती रही नीले आसमान को अबतक सूखी फटी दरारें लिये। बेचारे धरतीपुत्र भी तो आँखें फाड़ फाड़ देख रहे हैं उमड़ते घुमड़ते श्यामल तन लिये आते जाते मेघ को। याद आई इन्हें देखकर बुजुर्गों की कही वह बात आवत आदर ना दिये जाते दिये न हस्त इतने में दोनो गये पाहुन और गृहस्त। 💐💐मनोज💐💐