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Showing posts from October, 2022

मेरी मान।

सागर के तट पर खड़ा सोंच रहा था  निकल जाऊँगा पार तैरकर पर, मन ने कहा जानता हूँ तैरना आता है तुझे निकल जायेगा मेरी मान एक बार डूब कर तो देख जिंदगी बदल जायेगी। ....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

कैसे उसे बुलाऊँ मैं

नयनो से हैं रूठी नीदें सपन कहाँ सजाऊँ मैं। दूर हो गइ रूह जिगर से वापस  कैसे  लाऊँ  मैं। सूख गये आँसू आँखों के कैसे  धार   बहाऊँ   मैं। सुनने वाला पास नहीं जब हालेदिल किसे सुनाऊँ मैं। बाती है पर स्नेह नहीं जब फिर कैसे दीप जलाऊँ मैं। रिसते हों जब जख्म ह्रदय में मरहम   कहाँ  लगाऊँ   मैं। हार गया हूँ तनहा रहकर कैसे   उसे   बुलाऊँ   मैं। फूलों की खुशबु जब आती दिल  को  कहाँ  सजाऊँ  मैं। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

रावण का काम तमाम।

रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

रस पान करूँ।

अक्षर हो मेरी कविता की शब्दों में अब ढल जाओ। तन की दूरी ठीक सही पर ह्रदयाङ्गन मे बस जाओ।। कुसुम बाग की तु मेरी बन अली सरीखा मैं बन जाऊँ। अधर सुधा रस पान करूँ  उन्मुक्त गगन फिर उड़ जाऊँ।। रीत स्नेह का नहीं पता  प्रतिपल नेह लगा जाओ। निद्रा निमग्न जब हो जाऊँ स्वप्न परी बन आ जाओ।। प्राची किरणो़ं के पूर्व प्रिये आने के तुम जाना ना। स्वाति बूँद की आश लिये चातक सा प्यास बढ़ा जाना।। ...मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

यव स्थापन क्यो।

नवरात्र महोत्सव में यव रोपण ❤️ ================================= नवरात्रि के प्रथम दिन जो कलश बैठाता है वह अथवा जो कलश न बैठा कर केवल यव उगाता है दोनों भगवतीके द्वारा अभिलषित प्राप्त करतेहैं।कभी कभीपूर्व जीवनके पाप इतने बलिष्ठ होते हैं कि पूजा को ही विफल कर डालतेहैं।विघ्नोंकी प्रबलता होतो उसकी सूचनाअनेक प्रकार से मिलती है जैसे- यव का न उग पाना, रक्षा दीप या अखण्ड दीप का बूझ जाना,कलश का फट जाना, चींटियों, मूषकों द्वारा उत्पात मचाना आदि। यव चाहे कलश के मूल में उगाया जाए या अलग से मिट्टी के पात्र में उसके द्वारा भविष्य की सूचना दी जाती है।मैंने स्वयं अपने अनेक व्यक्तिगत नवरात्रि पूजन में यवों के संदेश को पढा है और उसके प्रतिफल को झेला भी है।अतः यवों के प्रतीक संदेश को यहां शास्त्र की ओर से रखा जा रहा है। अष्टमी और नवमी तिथि को यव अपने चरम उत्कर्ष को प्राप्त करता है।अतः पता चल जाता है कि यह कैसा है।कैसा फल देगा? यदि यव हरित वर्ण का ऊँचा उठे तथा झुके नहीं तो उत्कृष्ट फल देता है।यव के रंग से फल प्राप्ति का आभास होता है। १-- पत्तियाँ काली हों तो उस वर्ष कम वृष्टि होती है। २-- पत्तियाँ धूम्र व...