खामोश रहकर भी कभी कभी रहता हूँ सुर्खियों में अखवार के बेवजह बकना भी क्या जरूरी है हर दिन किसी के लिये न काल न परिधी न सीमायें जिसे कभी लाँघ भी पाऊँ बेवजह कान दिये रहता हूँ सन्नाटे को चीरती साँयें साँयें की आवाज़ पर। @*****पद्मनाभ💐💐💐💐💐💐💐💐
रोम रोम सिहर उठा झुरझुरी समाई है सराबोर था पसीने से मौसम ने ली अँगड़ाई है तेरे स्नेहिल स्पर्श से लगता आ गई तरुणाई है न जाओ छोड़कर बस सहलाती रहो ऐ हवा।। @********पद्मनाभ💐💐💐💐💐💐💐
विहार करना छोड़ अब ऐ बिहारी रहनुमा बुझ रही नित पल पल घर की जलती शमा कौन जाने कब छा जाये मातम तेरे गुलजार कुनबे में कबतक छुपाओगे दाग सफेद खद्दर के कुर्ते का मासूमों की चीख ही काफी हैं हरम में तेरे पायजामे गीला करने को बददुआ न ले मजलूम के सूने आँचल का तेरा दर भी शावकों से खाली नहीं। *****पद्मनाभ💐💐💐💐💐💐💐💐💐
बड़ा सुकून मिलता है तब ओढ़कर सो जाता हूँ तुम्हें जब अपनों के साये भी पास नहीं होते स्थिर शांत निश्तब्ध चिरनिद्रालीन एहसास से परे रिश्तों से दूर ऐ कफन। *****पद्मनाभ💐💐💐💐💐💐💐💐💐
तेरी एक झलक में हम तो दीवाने हो गये ऐसे जैसे जलते दिये को देख परवाने हुआ करते हैं जल रहे हैं अब तो तपन से तुझसे मिलने की उम्मीद में रोक रखा हूँ साँसों को आओ न एकबार फिर से बुझा दो प्यास कातर मन की दहकते तन की झमाझम बरस कर। ******पद्मनाभ💐💐💐💐💐💐💐💐💐
पिता ही वह हस्ती है जिसके सा़ये में जीवन करता मस्ती है. स्वच्छंद निर्द्वंद आनंद के पल छिन जाते हैं तब जब पिता का साया साथ नहीं होता. जाड़ा गर्मी हो या कि बरसात सुबह दोपहर या कि घनेरी रात पिता के रहते सर पे हाँथ. निश्चिंत निर्भय निर्विकार करने को साकार चल पड़ते हैं स्वप्नलोक की अनंत यात्रा पर. @*****पद्मनाभ
पढ़ लिया चार वेद को रिग् यजुः साम अथर्व ग्यानार्जन हो गया सर्व अर्थोपार्जन किया खर्व पढ़ा आगे भी वेदान्त पर हो न पाया अब तक किसी भी वेदना का अंत आखिर वजह क्या है समझ न पाये आज तक गुणी ग्यानी फक्कड़ संत. ******@पद्मनाभ.
मैंने सोचा था दिल के अरमाँ आँसुओं में बह जाएँगे हम वफा करके भी तनहा रह जाएँगे पर ऐसा हो नहीं पाया अबतक आँसू निकलते ही नहीं आँखों से तनहाईयों में भी यादों की तस्वीर जो उभर आती है मानस पटल पर. @.*****पद्मनाभ
याद है मुझे आज भी वो दिन जब चिलचिलाती धूप के बाद अस्ताचलगामी सूर्य के विलुप्त होने के पूर्व अपने घर के आँगन के बीचोबीच स्थित ईनारे से रस्सी और डोल के सहारे भरकर पानी पटाया करता था छत पर बाल्टी के सहारे आती थी नींद जमकर रात को भीनी भीनी गंध के बीच धरती के सिहरते थे रोयें आधी रात को शीतल मंद सुगंध पवन के झकोरों का स्पर्श पा दामिनी के साँसों की छुअन सी. *****@पद्मनाभ.
ये सिलवटें भी बयाँ करती हैं जीवन के हालात की किसी के आह की या फिर बीते पल के प्रवाह की इन्हें देखकर ये न समझ लेना चकरघिन्नी है सुखद अहसास की सम्भव है कसक में करवटें बदली हों उसने पूरी पूरी रात की 💐💐💐💐💐💐💐💐@पद्मनाभ*******
जीना कर दूँगा हराम गर चे लिया राम का नाम जय श्री राम जय श्री राम लाश को ले जाते वक्त सुन लो आदेश है शख्त राम नाम सत्य है कहना हराम जय श्री राम जय श्री राम गल्ती से भी जो लिया राम का नाम हो जायेगा तेरा काम तमाम जय श्री राम जय श्री राम हौआ हो गया है ये एक नाम जिसके लेने से बनते सब बिगड़े काम जय श्री राम जय श्री राम उद्धार किया अहल्या का तर गई शबरी लेकर नाम ताड़का त्रिजटा लंकिनी के पूर्ण हुये मन काम जय श्री राम जय श्री राम ममता माया के उलझन से गर होना है पूर्णकाम तो फिर लेना होगा ही यह नाम जय श्री राम जय श्री राम पर रहो हमेशा सावधान लेने से पहले यह नाम जय श्री राम जय श्री राम। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐@पद्मनाभ💐💐💐