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Showing posts from September, 2020

राम के वनवास का काल चौदह वर्ष।

भगवान् राम का वनवास सिर्फ चौदह वर्ष ही क्यों‌? माता कैकयी ने महाराज दशरथ से भरत जी को राजगद्दी और श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास माँगा, हो सकता हैं की बहुत से विद्वानों के लिए ये साधारण सा प्रश्न हो ,लेकिन जब भी ये प्रश्न मस्तिष्क में आता हैं संतोषजनक उत्तर प्राप्त करने के लिए मन बेचैन हो जाता हैं।  प्रश्न ये हैं की श्री राम को आखिर चौदहवर्ष का ही वनवास क्यों ? क्यों नहीं चौदह से कम या चौदह से ज्यादा ? भगवान् राम ने एक आदर्श पुत्र, भाई, शिष्य, पति,मित्र और गुरु बन कर ये ही दर्शाया की व्यक्ति को रिश्तो का निर्वाह किस प्रकार करना चाहिए। राम का दर्शन करने पर हम पाते है कि अयोध्या हमारा शरीर है जो की सरयू नदी यानि हमारे *मन* के पास है। अयोध्या का एक नाम अवध भी है। (अ वध) अर्थात जहाँ कोई या अपराध न हों। जब *इस शरीर का चंचल मन सरयू सा शांत हो जाता है और इससे कोई अपराध नहीं होता तो ये शरीर ही अयोध्या कहलाता है।* शरीर का तत्व (जीव), इस अयोध्या का राजा दशरथ है। *दशरथ का अर्थ हुआ वो व्यक्ति जो इस शरीर रूपी रथ में जुटे हुए दसों इन्द्रिय रूपी घोड़ों (५ कर्मेन्द्रिय ५ ज्ञानेन्द्रिय) को अपने वश म...

गीता उपदेश।

क्या हैं वो गीता के उपदेश जो इंसान के भीतरी मन की उठापटक को शांत कर उसे सफल जीवन व्यतीत करने में सहायता देते हैं????? निवेदन है, प्रस्तुति पूरी पढ़े,,,,, आज हम भगवद्गीता के उपदेशों के बारे में चिन्तन करेंगे जो हमारे जीवन के उद्देश्य से जुड़ा है, मुझे भगवद्गीता का लेखन का सौभाग्य मिला जो मेरे जीवन का उद्देश्य था, मैंने पाया कि गीता में जीवन के सभी प्रश्नों का उत्तर है, मुझे कुछ श्लोक इतने सटीक लगें और अनुभव हुआ कि कुछ संदेश आपके साथ सांझा करूँ। वैसे तो गीता अध्यात्म जीवन का दर्पण है, भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, जो अपने आप में अद्भुत है, सज्जनों! गीता दुनिया के उन चंद ग्रंथों में शुमार है, जो आज भी सबसे ज्यादा पढ़े जा रहे हैं और जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर व्याख्या की जा रही है।  इसके अठारह अध्यायों के करीब सात सौ श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर इंसान के जीवन में काम आता हैं, आज हम आपको इस आर्टिकल के माध्यम से गीता के कुछ चुनिंदा सूत्रों से रूबरू करवा रहे हैं, जो मानव जीवन के हर प्रकार से बहुत उपयोगी और जरूरी ह...

अधिकमास।

मलमास (पुरुषोत्तम मास) 2020 की जानकारी ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ 18 सितंबर से 16 अक्टूबर हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, जिसे अधिकमास, मल मास या पुरूषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है।  सनातन धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत की Sanatan धर्मपरायण जनता इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवद् भक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों में संलग्न रहती है। ऐसा माना जाता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा-पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है। यही वजह है कि श्रद्धालु जन अपनी पूरी श्रद्धा और शक्ति के साथ इस मास में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि यदि यह माह इतना ही प्रभावशाली और पवित्र है, तो यह हर तीन साल में क्यों आता है? आखिर क्यों और किस कारण से इसे इतना पवित्र माना जाता है? इस एक माह को तीन विशिष्ट नामों से क्यों पुकारा जाता है? इसी तरह के तमाम प्रश्न स्वाभाविक रूप से हर जिज्ञासु के मन में आते हैं। तो आज ऐसे ही कई प्रश्नों के उत्तर और अधिकमास को गहराई से जानते हैं...

महाभारत... एक समग्र दृष्टिकोण।

"महाभारत" एक दृष्टिकोण। ************************ भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा संस्कार का दर्पण है महाभारत।यह विश्व का सबसे महानतम ग्रंथ है।इसकी महत्ता का आकलन इसी से किया जा सकता है कि यह न केवल एक विस्तृत इतिहास है अपितु वैदिक धर्म का भी एक धरोहर है।शायद यही कारण है कि इसे" पंचम वेद" की संज्ञा प्रदान की गई।किरातार्जुनीयम्,शिशुपालवधम् एवं नैषधीय चरितम् जैसे संस्कृत के तीन महाकाव्यों का कथानक भी इसी महाकाव्य के क्रोड से उत्पन्न है।कविकुलगुरु कालिदास जैसे विद्वानों ने भी इस महान ग्रंथ को ही अपना आधार बनाया है।भारत के अतिरिक्त पाश्चात्य विद्वानों ने भी इसकी पटकथा पर आधारित अनेक ग्रंथ लिखे।    "श्रीमद्भगवद्गीता"जैसे विश्व मान्य ग्रंथ और महान दार्शनिक काव्य का उद्गम भी इसे ही माना गया है।विभिन्न विद्वानों ,चिंतकों के मतानुसार इसे सर्वशास्त्र संग्रह की संज्ञा प्रदान की गई है। भारतीय साहित्य वाङ्मय के इस गौरवशाली ग्रंथ का सर्जक महर्षि वेदव्यास को माना गया है।इसके विषय में यह प्रचलित है "यन् न भारतम् तन् न भारतम्"।"कृष्णद्वैपायन" के रूप में प्...

आयुर्वेद और बवासीर।

बावासीर (पाइल्स)ःःतन्त्रात्मकआयुर्वेद बावासीर (पाइल्स) के लिए एक अनुभूत महौषधि सुझा रहा हूँ।  मोचरस (सेमल का गोंद) 50ग्राम, मुन्नक्का (बीज निकाल कर) 50ग्राम और पीले गेंदे का फूल 50ग्राम तीनों को थोड़े जल के साथ बिलकुल चिकना पीस कर 94गोलियां बना लें। गोलियों का आकार बड़ा होगा, किन्तु इतना बड़ा भी नहीं कि निगलने में कठिनाई हो। तैयार हो जाने के बाद गोलियों को थाली में रखकर, मंगल और शनि के मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर लें- कम से कम एक-एक हजार मन्त्रों से। अब खूनी बावासीर के रोगी इसे मंगलवार से और वादी वावासीर के रोगी शनिवार से सुबह-दोपहर-रात एक-एक गोली सुषुम जल (वार्मवाटर) के साथ 31 दिनों तक लागातार सेवन करें। बत्तीसवें दिन शेष बची एक गोली को अपने सिर पर तीन बार घुमा कर,बाहर फेंक दें,और भावना करें कि उनका रोग भी बाहर हो गया।  ध्यान रहे-इस तन्त्रात्मक आयुर्वेदिक औषधि के सेवन में लापरवाही (नागा) नहीं होना चाहिए। व्यवधान होने पर पूरी विधि बेकार हो जायेगी,और फिर से सबकुछ दुहराना पड़ेगा। इस प्रयोग को मैंने बहुतों पर किया है और आशातीत सफलता भी मिली है।अस्तु।

आँखें।

पता नहीं कब कहाँ कौन काम आ जाये कह नहीं सकता। अब तो  कभी किसी को कुछ करने से रोक नहीं सकता। देखिये न एक तिनका  छोटा सा जिसका कोई वजूद नहीं। लेकिन उड़कर अगर पड़ जाये आँखों में  दर्द होने से कोई रोक नहीं सकता। कल तक मोबाईल बच्चों के बिगड़ने का साधन हुआ करता था। तब  हम छीन लेते थे बच्चों के हाथ से मोबाईल वह रोता रह जाता था। डर था आँखों की रोशनी न गुम  हो जाये कहीं। पर आज अहले सुबह से देर शाम तक कक्षाएँ संचालित हो रही हैं मोबाईल पर। नर्सरी से एम.ए .तक मास्टरी से डाक्टरी तक वकालत से इंजीनियरिंग तक। माध्यम है मोबाईल शिक्षा का ज्ञानार्जन का जीवन के परिमार्जन का। अब आँखें खराब नहीं होंगी फरमान है आलाकमान का राष्ट्र के शीर्ष विद्वान का। कर लो तैयारी भविष्य की आपका चश्मा तो उतर गया इन नर्सरी के नौनिहालों को लगने वाला है मोटा सीसा जल्द ही। आँख के डाक्टर बैठे हैं तैयार साजो सामान लेकर कर रहे हैं इंतजार बच्चे के साथ आपके आने का। कोरोना तो चला जायेगा लेकिन बच्चों के आँख की रोशनी कौन लौटायेगा? .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

गयाश्राद्ध।

श्राद्ध व पितृ पक्ष वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक ******************************** श्राद्ध_की_परिभाषा---------!! पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है-उसे श्राद्ध कहतेहै-- श्रद्धया_पितृन्_उद्दिष्य_विधिना_क्रियते_यत्कर्म_तत्_श्राद्धम्! श्रद्धा से ही श्राद्ध की निष्पत्ति होती है! श्रद्धार्थमिदं_श्राद्धम्--श्रद्धया_कृतं_सम्पादितं_श्रद्धया_दीयते_यस्मात्_तच्छ्राद्धम्**तथा_श्रद्धादौ_इदं_श्राद्धम्। अर्थात अपने मृत पितृगणों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किया जाने वाला कर्मविशेषं को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है। इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं!जिसका वर्णन मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों ,पुराणों ,वीरमित्रोदय ,श्राद्धकल्पलता, श्राद्ध तत्व ,पितृदयिता आदि अनेक ग्रंथो में प्राप्त होता है। महर्षि पराशर के अनुसार देश,काल तथा पात्र में हविष्यादि विधिद्वार जो कर्म तिल(यव)और दर्भ (कुश)तथा मन्त्रो से युक्त होकर श्रद्धापूर्वक किया जाए वही श्राद्ध है।  महर्षि वृहस्पति तथा श्राद्ध तत्व में वर्णित महर्षि पुलस्त्य के अनुसार-- जिस कर्म विशेष में दुग्ध-घृत-मधु से युक्त सुसंस्कृत (अच्छी प्...