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Showing posts from December, 2020

कृष्ण क्राइस्ट हो गये।

कृष्ण  अब क्राइस्ट हो गये संत हो गये हैं संता इसीलिये तो माथा पटकने पर भी कोई काम नहीं बनता। चरणामृत को भूल बपतिस्मा पी रहे हैं घी का दीपक छोड़  मोमबत्ती जला रहे हैं गीता को छोड़ ओल्डटेस्टामिन का पाठ पढ़ा रहे हैं। श्रीमन्नारायण नाम जप भूल जिंगल बेल गा रहे हैं पंचामृत त्याग  दारू से नहा रहे हैं हरिनाम अष्टयाम अब होता कहाँ नव वर्ष भूल गये हम तो फर्स्ट जनवरी मना रहे हैं भारतीयता दूर कर इंडियन कहला रहे हैं।। ....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

गीता जयंती।

आज गीता जयन्ति है न,तो आइये इस सम्बन्ध में ही कुछ बातें कर लूँ...... मोक्ष की अवधारणा “मोक्ष”लुभाने के वजाय, भ्रमित करते रहा है सदा। हो सकता है कि इसकी महिमा-गरिमा को ठीक से समझ ही नहीं पाया होऊँ। अन्यथा बड़े-बड़े सन्त महात्माओं का चरमलक्ष्य— मोक्ष भ्रमित क्यों करता! हाँ, इतना अवश्य सुना है कि कुछ ऐसी भी महान विभूतियाँ हुयी हैं, जिनके समक्ष स्वर्ग और मोक्ष भी नतमस्तक है। ये गुण विशेषकर भक्तों में ही पाया जाता है, जो सदा इन दोनों को ठुकराते रहते हैं— न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे। न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।।आचार्यशंकर को पराम्बा के श्रीमुख के सामने ज्ञान-विज्ञान,स्वर्ग, मोक्ष सब व्यर्थ प्रतीत हुआ। भक्तप्रवर तुलसी ने भी कुछ ऐसी ही अवहेलना की है मोक्ष की— धर्म न अर्थ न काम रुचि पद न चहौं निर्वाण....। दार्शनिकों ने हेय, हेतु, हान और हानोपाय की अवधारणा से चिन्तन की शुरुआत करके, जीवन-मृत्यु के अबाध कष्ट से मुक्त होने की बात सुझायी है। यानी कि संसार में बारम्बार जन्म लेना (विविध योनियों में) और पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त होना ही सर्वाधिक हेय है और इससे सदा-सर्वदा...

गीता जयंती।

🚩🙏🏻 *गीता जयंती विशेष* 🚩🙏🏻 हिन्दू संस्कृति में यह दिन श्रीमद् भगवद्गीता की प्रतीकात्मक जयंती के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवद्गीता के दर्शन मात्र का बड़ा लाभ होता है। यदि इस दिन गीता के श्लोकों का वाचन किया जाए तो मनुष्य के पूर्व जन्म के दोषों का नाश होता है।  हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 25 दिसंबर को है। एक-दूसरे के प्राणों के प्यासे कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध शुरू होने से पहले योगीराज भगवान श्रीकृष्ण ने 18 अक्षौहिणी सेना के बीच मोह में फंसे और कर्म से विमुख अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को छंद रूप में यानी गाकर उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहते हैं। चूंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, अत: इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता पड़ा। भगवद्गीता में कई विद्याओं का वर्णन है, जिनमें चार प्रमुख हैं- अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या। माना गया है कि अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है। साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व...

यह भी कुक्कर है।

यह भी कुक्कुर है। **************** मेरे एक मित्र हैं ।चीकु पाण्डे नाम है।बड़े ही सम्भ्रान्त और पैसे वाले रसूख वाले इंसान हैं।घर भी बहुत ही बढ़िया है उनका ।सरकारी नौकरी करते थे।अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं।अपनी पत्नी बच्चों के साथ अधिकांश समय अपने शानदार घर में ही व्यतीत करते हैं।दो गाय भी पाल रखे हैं।एक छोटा सा बगान भी है।इसमें रंग विरंगे मौसमी फूलों के पौधे भी लगा रखे हैं।फोन पर बराबर बातें होती रहती थीं।अनेक बार आग्रह किया था कभी आईये बैठकर साथ चाय पीयेंगे बहुत दिन हो गये हमलोगों के मिले हुये।नौकरी के चक्कर में समय मिला नहीं।बराबर भागदौड़ चलता रहा।अब निश्चिंत हुये हैं।कल मेरी भी इच्छा हुई चलें आज शाम की चाय चीकु भाई के साथ ही ली जाये।चल पड़ा कड़ाके की ठंढ में गरम चाय और पकौड़े की उम्मीद लिये चीकु भाई के शानदार घर को देखने और उनसे गप करने।ज्योंही दरवाजे पर पहुंचा एक जानवर को देखकर स्तब्ध रह गया।बिल्कुल शेर जैसी आकृति,शांत स्वभाव चुपचाप बरामदे में आ रही धूप का आनंद ले रहा था।मुझे देखकर एकबार गर्दन घुमाई एक लंबी साँस ली फिर गर्दन झुका लिया।मैं तो डर गया लेकिन बड़े से चौड़े पट्टे से बँधा देखकर र...

समाज सेवा।

समाज सेवा या समाज से मेवा? ************************                एक सच्ची घटना का बयान करने की इच्छा हुई है।यदि इस से किसी व्यक्ति विशेष को ठेस लगे तो क्षमा चाहूँगा, क्योंकि मेरा मकसद किसी को ठेस पहुचाना नहीं अपितु वर्तमान सामाजिक परिवेश मे परिवर्तन लाने का प्रयास मात्र है।    आज से लगभग बीस वर्ष पूर्व अपने समाज के एक अतिदीन परिवार के कन्या की शादी में मदद करने को सोच कर अपने एक अभिन्न मित्र के साथ समाज के तथाकथित सम्भ्रांत एवं सामाजिक विकास के लिए लंबी लंबी डींगे मारने वाले लोगों के दरवाजे दरवाजे दस्तक दी।कुछ लोगों ने ग्यारह इक्कीस रुपये कुछ ने अपने घर से जजमनिका में प्राप्त वस्त्र और कुछ ने  थोड़े से अनाज भी दान किए।मेरे द्वारा किए जा रहे इस कार्य की सराहना भी की।हम दोनो मित्रों का उत्साह वर्द्धन भी किया।वहीं कुछ ऐसे सम्भ्रांत सज्जन भी मिले जिन्होंने यह कहते हुए हमारा उत्साह भंग करने का प्रयास किया कि तोहनी के आउ कोई काम न हब पढ़े लिखे के समय में कहाँ ई सब पचड़ा में पड़ल ह।का कहियो बाबू मन तो हमरो हल मदद करे के बकि हमरा हीं बड़ा भारी...

सच्चा किसान।

ये जमीन ही जिसकी शान है ये मिट्टी ही  जिसकी आन है फसल का उगना ही जिसका प्राण है करता है श्रम दिन रात समझो राष्रट्रोन्नति हेतु यही उसका प्रतिदान है ये धरती होती है सिंचित जिसके स्वेद से वही तो सच्चा किसान है ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

ढेरो अंतरंग।

बारात सज धज कर  दुल्हन के घर प्रस्थान को तैयार सूचना मिली दूल्हे के भाई की अर्थी सज रही है बाजा मौन हो गया बत्ती बुझ गई बाराती कोस रहे भगवान को पानी फेर दिया क्या होगा अब जरा बोलो उसका चटकारे लेकर खाने वाले थे हम जिस पकवान को आज रात रुक जाते कल ले जाते तुम दुल्हे के भाई के प्राण को सारा मजा किरकिरा हो गया दो घूँट हलक के नीचे गई थी अभी अब क्या फिर से ऐसी मस्ती छायेगी कभी भाभियों बहनो के संग होकर अधनंग नाचने को तैयार मेरे  ढेरो अंतरंग बेचारे मायूस हो गये। .....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

देह नहीं।

गेह की चिन्ता है नेह की नहीं प्रकाश चाहिये पर स्नेह नहीं सौंदर्य प्रिय है देह नहीं धरती से आसमान तक एकक्षत्र राज्य हमारा हो हम किसी के भले न हुये सब पर अधिकार हमारा हो चंदा हो सूरज हो नभ में चमकता सितारा हो हमसे करे प्यार हर कोई हमारा न कोई प्यारा हो नयी सोंच नयी दुनिया नयी उम्र का किरदार हूँ मैं कर्म कुछ करुँ न करुँ कर्मफल सद्रूप हमारा हो।। ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

मैं बहुत दुखी हूँ।

मैं बहुत दुखी हूँ *************** मैं बहुत दुखी हूँ आपको सुखी देखकर बहुत हाँथ पाँव मारे सिर पटक पटक कर फोड़ डाला अपना फिर भी खुशी न मिली क्योंकि मैं बहुत दुखी हूँ आपको सुखी देखकर रोया चिल्लाया हर किसी को अपना दर्द बताया भरी महफिल में खूब धूम मचाया पर किसी ने मुझ पर रहम नहीं खाया दर दर जाकर भी दुआ की भीख माँगी पर मुराद पूरा नहीं हो पाया किसी पर भी  मेरी बातों का सिक्का जम नहीं पाया इसीलिये अब मैं अंतर्मुखी हूँ क्योंकि मैं बहुत दुखी हूँ आपको सुखी देखकर। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

हमरो माथा हे।

हमरो माथा हे। ************* आज बटेसर भाई के बेटा के बराती गेली हल।बड़ी बढ़ियाँ बेवसथा हल।नसता पानी से लेके खाना तक में समधी के तरफ से इंतजाम बड़ी बढ़िया कैल गेल हल।देख के मिजाज बड़ी खुश भेल।समाज के ढेर मनी लोग से मिले के मोका भी मिलल।खूब नाच गान भी भेल।बैंड बाजा के धुन पर लैकन बुढ़वन जमनकन सब के सब खूब नाचलन भी।अब तक सबकुछ ठीके ठाक चलैत हल।सबकोई जनवासा में बैठल हली लड़की दने से धुआ पानी आ गेल।गोड़धोई होये लगल।एतने में बड़ी जोर से हल्ला उठल।मार सार के ।अभी निकाल हियाँ से एकरा।ई अपन लक्षन न छोड़ सक हे।मना कैली हल तैयो एकरा सब लेइये ऐलन।जान हली ई जायत त कुछ न कुछ ऐसन करबे करत कि रंग म़े भंग हो जायेत।ई जहाँ भी जा हे न अपने चैन से रहे न केकरो रहे दे हे।चले घड़ी भी एतना समझौली हल कि देख चलित हें त असथिर से रहिहें,कुछ ऐसन ओइसन काम मत करिहें  जेकरा से अशांति होये ,बिना मतलब के लड़ाई झगड़ा न हो जाये।कहबो कैलक हल कि न चचा एकदम शांत रहबो ले ले चल हमरो।बकि ई मानत सार काहेला ।एकरा शांति सोहैबे न करे।हल्ला सुन के हमहुँ सबके बीच में चल गेली।देखली कि बटेसर भाई एकदम गरम हथ।लगतरिये चिल्ला रहलन हे।खैर हमरा पर नजर...

सबसे समृद्ध भाषा।

ये पोस्ट  अद्भुत एवं अतुलनीय है.... क्या आप जानते है विश्व की सबसे ज्यादा समृद्ध भाषा कौन सी है..... अंग्रेजी में 'THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG' एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए, मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया जिसमे चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है।  अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये।- *क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।* *तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।*  अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं। श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के *सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाये दे रहे हैं वो भी क्रमानु...

टोल नाका।

टोल नाका *********** बुधन अस्वस्थ हो गया  खुद से चलने के लायक भी अब नहीं रहा मंगरु ने दौड़कर पड़ोसी से कहा बाबु जरा फोन कर देते नीली बत्ती वाली गाड़ी वाले को जो सड़क पर बिना रुके भागती चली जाती है शायद बुधन अब रुकने वाला नहीं गाड़ी आती है  कुछ लोग बुधन को टाँग कर नीली बत्ती वाली गाड़ी में सवार कर देते हैं मंगरु भी साथ बैठकर  चल देता है गाड़ी रुकती है कुछ सफेदपोश कुछ हरितपोश हाँथों में अनेक यंत्र लिये आते हैं नब्ज टटोलते हैं आगे पीछे दायें बायें घुमाकर बुधन के शरीर को जाँच लेते हैं वापस मुँह लटकाये चल देते हैं सारी बोलकर तब तक बुधन पूछ बैठता है मैं कहाँ हूँ  मंगरु धीरे से बोलता है टोल नाके पर रसीद कट गई है गाड़ी अब गंतव्य तक जायेगी आगे बुधन मौन हो जाता है दुबारा मंजिल तक पहुँचते निस्तब्ध निढाल शरीर लिये।। .......मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

मैं बह रहा था।

मैं बह रहा था भाव में वो बह रहा था बहाव में हम दोनो ही बह रहे थे प्रकृति प्रदत्त उतार चढ़ाव में अंतर सिर्फ इतना सा था मैं सवार था नाव में वो बह रहा था  नदी के बहाव में मेरी भावनाओं का  उतार चढ़ाव भी  होता था  लहरों के अंतर से वो भी कभी ऊपर कभी नीचे हो जाता था  लहरों के झुकाव में गंतव्य भी एक से थे दोनो के अपनी मंजिल तक किनारा भी लगना था कहीं न कहीं दोनो को भाव में बहें या बहाव में बहा तो रहा था हम दोनो को खेवनहार ही फर्क बस इतना था मेरी भावनायें बह रह रही थीं उसके सिर्फ शरीर बह रहे थे  पानी के बहाव में।। ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।