आज गीता जयन्ति है न,तो आइये इस सम्बन्ध में ही कुछ बातें कर लूँ...... मोक्ष की अवधारणा “मोक्ष”लुभाने के वजाय, भ्रमित करते रहा है सदा। हो सकता है कि इसकी महिमा-गरिमा को ठीक से समझ ही नहीं पाया होऊँ। अन्यथा बड़े-बड़े सन्त महात्माओं का चरमलक्ष्य— मोक्ष भ्रमित क्यों करता! हाँ, इतना अवश्य सुना है कि कुछ ऐसी भी महान विभूतियाँ हुयी हैं, जिनके समक्ष स्वर्ग और मोक्ष भी नतमस्तक है। ये गुण विशेषकर भक्तों में ही पाया जाता है, जो सदा इन दोनों को ठुकराते रहते हैं— न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे। न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः।।आचार्यशंकर को पराम्बा के श्रीमुख के सामने ज्ञान-विज्ञान,स्वर्ग, मोक्ष सब व्यर्थ प्रतीत हुआ। भक्तप्रवर तुलसी ने भी कुछ ऐसी ही अवहेलना की है मोक्ष की— धर्म न अर्थ न काम रुचि पद न चहौं निर्वाण....। दार्शनिकों ने हेय, हेतु, हान और हानोपाय की अवधारणा से चिन्तन की शुरुआत करके, जीवन-मृत्यु के अबाध कष्ट से मुक्त होने की बात सुझायी है। यानी कि संसार में बारम्बार जन्म लेना (विविध योनियों में) और पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त होना ही सर्वाधिक हेय है और इससे सदा-सर्वदा...