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Showing posts from July, 2020

नश्तर चुभा गई।

जख्म भरने को था तभी मख्खी नश्तर  चुभा गई। भूलते एहसास दर्द का पीड़ा बढ़ा गई। तड़पता रहा मैं खून से खून रिशते रहे। ये भी न बन सका कि आकर कोई मरहम लगा सके।। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

कर लूँगा।

मेरी शादी को  तीन दशक बीत गये शादी के वक्त ही पत्नी से  वादा किया था तुझसे मुहब्बत करूँगा वो आज भी पूछती है कब करोगे मुहब्बत जब पूछती हूँ कहते हो कर लूँगा मैंने भी टका सा जवाब दे दिया आज जब मुहब्बत के दिन आयेंगे कर लूँगा कोई तिथि  थोड़े ना निश्चित की थी। ........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

कर लो।

कर लो सबसे ऐसे सूरज जैसे लेय ना समझे कोई लेय को समझे नहीं कोई वापस देय सागर से जल लेत है मेघ बनाई देत खेतन में जा बरसै जब जन मन हर्ष भयेत कर लेवन नया नहीं है यह विधान पुरान राम राज्य के कर को जानै सोई नृप सुघड़ सुजान @...मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।

बात।

जब भी कोई बात बोलता हूँ उस बात के पीछे भी कोई बात होती है ये सब जानते हैं बिन बात के कोई बात नहीं होती है जनाब यह भी जानते हैं कि बातों बातों मे ही कोई बात होती है न घात होती है न प्रतिघात होती है जब भी बातों की बातें होती हैं तो  दिल पे आघात होती है बात चाहे न्यौते की हो बात चाहे समझौते की हो बात बात के फिरौते की हो हर बार जज्बातों से ही बात होती है गलबातों से बात होती है बात तो बस बातों से होती है बात बात पे बात होती है बात के  आगे बात होती है बात के पीछे बात होती है बात के बीच में भी बात होती है बात के अंत में भी बात होती है पर गजब होता है बात के अंत की भी बात है बाप के बात पर बात होती है माँ के बात पर बात होती है भाई के बात पर बात होती है मित्रों के बात पर बात होती है शाली शाले की बात पर बात होती है सरहज साढ़ू की बात पर बात होती है बच्चों की बात पर तो बात अब पूछो मत आजकल तो हर घर में सबसे प्यारी  पत्नी की हर बात पर बात होती है देश की सरहद पर बात होती है संसद के भीतर भी बात होती है संसद के बाहर भी बात होती है जात पर बात होती है जमात पर बात होती है पर फिर भी जब आपने सामन...

चलते चलते।

चलते चलते ................... निराला के भिक्षुक ने भी खाक छाना था दर दर मुंशी प्रेमचंद की धनिया भी बिक चुकी थी अनेको बार बनिये की दुकान पर एक कप चाय के लिये। टालस्टाय की माँ का आँचल भी लहरा चुका था सरेबाजार कै बार शेक्सपियर ने भी घूँट घूँट आँसुओं को पीया था जार बेजार तुलसी को भी देना पड़ा था जवाब स्वांतःसुखाय कहकर शिवकृपा नहीं होती तो शायद रामबोला ही रह जाते। फिर मैं कौन  कहाँ  कब कैसे कितने दिनो से किसे बताऊँ क्यूँ बताऊँ कबसे  कैसे कितना घिसता हूँ कलम की नोक सबकुछ बोलती हैं आड़ी तिरछी रेखाएं जिन्हें खींचता रहता हूँ दिन रात कागज के पन्नो पर समझ सकते तो समझ लो। पढ़ सकते तो पढ़ लो भावनाओं के गहन गह्वर में पैठकर। .........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

नया आयाम।

जिंदगी की हर घटना एक अंजाम देती है भेंड़चाल से अलग रहने का हर पल पैगाम देती है फिर से मुस्कुराने का नया मुकाम देती है हर हवा के साथ आयी नयी खुशबु जिंदगी जीने का नया आयाम देती है। तूफानों की भी अपनी भाषा होती है उसे भी आपसे कुछ  मिलने की आशा होती है समझ गये अगर भाव तूफान के जिंदगी सँवर जायेगी की अगर ना समझी आपने बनी बनाई सब बिगड़ जायेगी।। ****मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

जुगत बताई है।

तेरी बातों ने सचमुच मेरे दिल में  एक कसक सी जगाई है मेरे सोते जिस्म में फिर से आई तरुणाई है मौसम ने जबसे ली अंगड़ाई है सच कहूँ सारी रात करवटें बदलता रहा तूने मेरी आँखों से नींद उड़ाई है। जब जब भी कोशिश की सोने की सपने में तेरी मधुर मुस्कान नजर आई है अब तो हर साँस में तेरी ही महक समाई है दुआ करता हूँ रब से हर शै यही बढ़ता रहे ये पौध यूँ ही  जो तूने दिल की जमी पे लगाई है टूटा हुआ दरख्त था मैं तो फिर से काँटों की राह में चलने की जुगत बताई है।। .......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

सन्नाटे को चीरती।

खामोश रहकर भी  कभी कभी रहता हूँ सुर्खियों में अखवार के बेवजह बकना भी क्या जरूरी है हर दिन किसी के लिये न काल  न परिधी न सीमायें जिसे कभी लाँघ भी पाऊँ  बेवजह कान दिये रहता हूँ सन्नाटे को चीरती साँयें साँयें की आवाज़ पर। ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

बदला हुआ इतिहास।

आज मेरा शहर  खामोश दिखता है दिन और रात  उदास दिखती है इंसान इंसानियत से फरामोश दिखता है नहीं दिखते जलते हुये दीप किसी दीवट पर स्नेह के अब तो कहीं हर एक बात बकवास लगती है जहां तक जाती है नजर जहाँ में अँधेरे का साम्राज्य दिखता है साँसों से साँसों का मिलन अब तो स्वप्निल आभास दिखता है हँसी ठहाकों का मौसम  काली रात लगती है रहकर मौन पद्मनाभ  तू तो सच में औरों से खास दिखता है तेरे मन को पढ़ना सबके बस की नहीं अब तो हर क्षण  बदला हुआ इतिहास लगता है।। .....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

नयी खुशबु।

जिंदगी की हर घटना एक अंजाम देती है भेंड़चाल से अलग रहने का हर पल पैगाम देती है हर हवा के साथ आयी नयी खुशबु जिंदगी जीने का नया आयाम देती है। तूफानों की भी अपनी भाषा होती है उसे भी आपसे कुछ  मिलने की आशा होती है समझ गये अगर भाव तूफान के जिंदगी सँवर जायेगी की अगर ना समझी आपने बनी बनाई सब बिगड़ जायेगी।। ****मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

बस युँ ही।

बस यूँ ही ............... आज मेरे एक सह्रदय  मित्र ने कहा इतना लिखते हो कहीं छपते क्यों नहीं? मैं भी भला चुप कैसे रहता बोला मैं प्रोफेसर हूँ पर भीम भंटाराव नहीं जो  अखवार में नाम के लिये किसी कार से टकरा जाऊँ! लक्षमी नारायण का कृपापात्र भी नहीं हूँ ना ही कोई गाड फादर हैं मेरे एक ही पिता थे जो अब आसमान मे खो गये कहीं तारों के बीच जिन्हें ढूँढना भी अब मुश्किल है पाँव भी पकड़ूँ तो किसका? साहित्यकार नहीं बस साहित्य का अध्येता हूँ चेतना के पंख अभी उगे नहीं भला उर्द्धवरेता कैसे बन जाऊँ! स्वाभिमान आड़े आता है दीन ईमान सब पलकें झपकाते हैं ऊँगली पकड़ना तो मुश्किल हुआ टाँग खींचने की जुगत ही नजर आती है पर इतना जरुर याद रखना मेरे दोस्त देर है अँधेर नहीं जिसदिन मैं छपूँगा तुम छपाक हो जाओगे। .....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।