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Showing posts from October, 2020

कोष।

प्रश्न : पंचकोष क्या है? उत्तर : कोष 'मन' की अवस्थाओं के नाम हैं। वे पाँच हैं - अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। अन्नमय और प्राणमय कोष के आधीन जब मन रहता है तो वह अत्यन्त निम्न स्थिति है। इसको काटना बहुत मुश्किल है। गुरु को भी इसको काटने में बहुत प्रयत्न करना पड़ता है। अन्नमय कोष जब कट जाता है तब अन्न की विभिन्नता का मन पर कोई असर नहीं होता। प्राणमय कोष में पंच प्राण होते हैं, जिनमें मन में प्रमाद आदि अनेक दोष उत्पन्न होकर मन को साधना से विरत कर देते हैं। इसके कट जाने पर वह विरत न कर पाएँगे। योगीजन अनेक प्रयत्नों से इनको वश में कर पाते हैं लेकिन प्रेम से अपनेआप ही दोनों कोष कट जाते हैं। मनोमय कोष से साधक को अनेक अनुभव होने लगते हैं और साधक को आनन्द आने लगता है। इसका कट जाना तब जानना चाहिए कि स्त्री की गोद में बैठे हैं और उसके अनेक प्रयत्न करने पर भी मन में विकार नहीं उत्पन्न हो रहा है। विज्ञानमय कोष अहंकार का कोष है। अपनी स्थिति का सूक्ष्म अहंकार साधक को आगे नहीं बढ़ने देता है। आनन्दमय कोष माया की अन्तिम सीढ़ी है। इसमें आने पर संसार की कोई बाधा असर नहीं कर पाती। भाव म...

गली में कुत्तों की फौज।

अचानक से गली में आवारा कुत्तों की फौज देखकर परेशान होना लाजिमी था कारण जानने की  उत्सुकता लिये निकल पड़ा घर से बाहर देखा पड़ोस के दरवाजे पर लगे ठेले से मजदूर उतार रहे थे बासमती चावल ,आँटे,दाल आलू,चीनी, हरी शब्जी की बोरियाँ और गरम मशाले की पैकेट  पत्तलों की बंडल के साथ ही कुछ हरी शब्जियों के भरे बोरे भी साथ में सरसों के तेल और डालडे के टीन भी माजरा कुछ समझ में आया लगता है भोज है देखते देखते ठेले वाला सारे सामान उतारकर  रफुचक्कर हो गया गली के कुत्तों की फौज की आवाज थोड़ी धीमी हो गई शांति का अनुभव हुआ जमकर सोया रातभर होत प्रात जिज्ञासा वश छत की मुंडेर से झाँकने लगा गली में एक भी कुत्ता नजर नहीं आया परेशान हाल एकबार फिर ये देखने पड़ोसी के दरवाजे तक गया कि शायद हलवाइयों ने पक्वान्न बनाना शुरु कर दिया होगा किंतु ये क्या वहाँ तो बड़े बड़े ताले लटक रहे थे माजरा समझ में आया कुत्तों की फौज के हट जाने का भोज कहीं और था यहाँ तो कुछ देर के लिये सारे सामान विश्राम के लिये लाये गये थे।। ......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

एकमात्र मैं ही हूँ।

सिर्फ मैं ही हूँ एकमात्र। ******************* बड़ी विचित्र स्थिति से यह काल खंड बीत रहा है।एक समय था जब किसी भी संगठन में नेतृत्व के लिये समाज से व्यक्तित्व का चयन किया जाता था।आधार होते थे समाज के लिये उनके द्वारा अबतक किये गये क्रियाकलाप।सामाजिक जनों के सुख दुःख में उनकी सहभागिता।शिक्षा या ज्ञान का स्तर।जीवन के सामाजिक अनुभव।कुल ,शील,आचार ,विचार,व्यवहार, एवं भावी सोंच।इसमें धनी या निर्धन कोई भी हो सकता था।निष्पक्ष कार्यशैली भी देखी जाती थी।इसका परिणाम दूरगामी होता था।वह चयनित व्यक्ति सहज भाव में नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता था।क्योंकि उसे भी इस बात का भान होता था कि यदि मेरे क्रिया कलाप में कहीं तनिक भी समाज की अपेक्षा के अनुरूप अंतर आया तो मेरे लिये यह आत्मग्लानि की बात होगी।जीते जी मृतवत् जीवन जीने को विवश हो जाऊँगा।वह इसे पेशा नहीं सेवाभाव से ग्रहण करता था।पद पर रहते पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ अपनी एवं समाज की गरिमा को बचाने का हर संभव प्रयास करता था।आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखती है।अब न चयन न मनोनयन हम यूँ कह सकते हैं कि नेतृत्व का हरण होता है।इसका आधार भूत गुण उसके झूठ...

संख्या १०८का रहस्य।

*संख्या_108_का_रहस्य_और_महत्व*- ••••••••••••••••••••••••• ॥🕉️॥ का जप करते समय 108 प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है ।   *॥ 108 ॥*  यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय ( काल ) से हमारे ऋषि -मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है।   *★ आइये जाने संख्या 108 का रहस्य ★* *स्वरमाला* अ→1 ... आ→2... इ→3 ... ई→4 ... उ→5... ऊ→6  ... ए→7 ... ऐ→8 ओ→9 ... औ→10 ... ऋ→11 ... लृ→12 अं→13 ... अ:→14..  ऋॄ →15.. लॄ →16 *व्यंजनमाला* क→1 ... ख→2 ... ग→3 ... घ→4 ... ङ→5 ... च→6... छ→7 ... ज→8 ... झ→9... ञ→10 ... ट→11 ... ठ→12 ... ड→13 ... ढ→14 ... ण→१15 ... त→16 ... थ→17... द→18 ... ध→19 ... न→20 ... प→21 ... फ→22 ... ब→23 ... भ→24 ... म→25 ... य→26 ... र→27 ... ल→28 ... व→29 ... श→30 ... ष→31 ... स→32 ... ह→33 ... क्ष→34 ... त्र→35 ... ज्ञ→36 ... ड़ 37   ... ढ़ ... 38 --~~~ओ ...

यत्र नार्यस्तु पुज्यंते।

नारी सत्ता पर आए दिनो आघात की खबरों से लवरेज अखवारों के पन्नों को देखकर ऐसा लगता है मानो हमने अपने आपको पूरी तरह से तंगोतबाह करने का मन बना लिया है।हम यूं कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह तंगोतबाही सिर्फ हमारी नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति की होगी।क्योंकि हम जिस नारी शक्ति को तंगोतबाह करने पर तुले हैं वही हमारा उद्गम स्थल है।हम उसके जिन शारीरिक अंगों उर्द्ध्वाधःको अपना शिकार बनाते हैं हम शायद यह भूल जाते हैं कि वही अध्वांग जहाँ हमारा उद्गम स्थल है वहीं वह उर्द्धवांग हमारा पालक है।और हम क्षणिक पिपासा की भंगुर शांति हेतु अपनी ही इन जीवनदायिनी महायंत्रों को भग्न करने पर तुले हैं। आज किसी की यही बिटिया कल किसी की बहु बनकर एक नई सृष्टि की रचना में संलग्न होगी। एक बिटिया का नाश मतलब एक पूरी पीढ़ी का सर्वनाश।हम पढ़े लिखे वा मूर्ख चपाट सब प्रकृति प्रदत्त इन गुणों से परिचित हैं फिर भी ऐसे दुर्नीतिपूर्ण कृत्य से अपने आपको अलग नहीं रख पाते।और तो और संत का लवादा ओढ़कर भी सिर्फ तन के लिबास ही बदलते हैं मन वहीँ अनीतिपूर्ण विचारों वाले सरोवर में गोते लगाता रहता है,तभी तो आशाराम या रामरहीम अवतरित ह...

मत दान।

वोट देना हमारा अधिकार है जनता की सेवा  जनसेवक का अधिकार है किसको दूँ वोट  यहाँ तो जनसेवकों की भरमार है जिधर देखो कुर्सी के लिये ही जूतमपैजार है बेचारी जनता इनके ताने बाने से एकदम लाचार है शिक्षा स्वास्थ्य सुशासन का सब रोते रोना बेचारा ये तो वर्षो से बीमार है सड़क सुरक्षा पहने कच्छा मजबूरी में तन ढँकने को तैयार है फिर भी नयी व्यवस्था लाने को तो वोट देना ही एकमात्र आधार है क्योंकि कहता है संविधान हमारा मत देना आम जन का जन्मसिद्ध अधिकार है।। .........मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।