चारो तरफ अफरातफरी का माहौल।कहीं धरना कहीं प्रदर्शन कहींं कहीं दोनो।कोई समर्थन कर रहा तो कोई विरोध।पर मुझे लगता है ना ये समर्थन है ना ही विरोध।सच कहें तो ये है मात्र अवरोध।दुहाई दोनो ही दे रहे हैं संविधान के सुरक्षा की।पर संविधान क्या है या क्या होता है संविधान इसकी समझ से शायद दोनो ही परे हैं।मैंने भी संविधान नहीं पढ़ा है ना ही देखा है।कभी अवसर ही नहीं मिला।कारण यह कि कभी चुनाव नहीं लड़ा।चुनाव नहीं लड़ा इसलिये नेता नहीं बना।नेता नहीं बना इसलिये संविधान को देखने या पढ़ने का अवसर भी नही मिला न ही मुझे अधिकार है।क्योंकि इसके लिये अधिकृत तो सिर्फ नेतागण ही हैं,वह भी वे ही जिन्होंने "मसी कागज छुये नहीं कलम गहे नहीं हाथ"को जिन्होंने अपना आदर्श मान रखा है।कौआ कान लेकर जा रहा है दौड़ौ कौये को पकड़ो कान को बाद में देख लेंगे ऐसा माने वाली मेरी जैसी मूर्ख जनता भी नेताजी के पीछे पीछे भागी चली जाती है क्योंकि देश तो इन्हें ही चलाना है।आखिर संविधान का एक एक अक्षर जो इन्होंने चबा डाला है।कुछ ने संविधान को बचाना पढ़ा है कुछ ने डुबाना।फिर अंत में दोनो मिलकर साझा देश चलाना भी सीखा है वह भी संविधान की...