Skip to main content

Posts

Showing posts from January, 2020

समर्थन या विद्रोह।

चारो तरफ अफरातफरी का माहौल।कहीं धरना कहीं प्रदर्शन कहींं कहीं दोनो।कोई समर्थन कर रहा तो कोई विरोध।पर मुझे लगता है ना ये समर्थन है ना ही विरोध।सच कहें तो ये है मात्र अवरोध।दुहाई दोनो ही दे रहे हैं संविधान के सुरक्षा की।पर संविधान क्या है या क्या होता है संविधान इसकी समझ से शायद दोनो ही परे हैं।मैंने भी संविधान नहीं पढ़ा है ना ही देखा है।कभी अवसर ही नहीं मिला।कारण यह कि कभी चुनाव नहीं लड़ा।चुनाव नहीं लड़ा इसलिये नेता नहीं बना।नेता नहीं बना इसलिये संविधान को देखने या पढ़ने का अवसर भी नही मिला न ही मुझे अधिकार है।क्योंकि इसके लिये अधिकृत तो सिर्फ नेतागण ही हैं,वह भी वे ही जिन्होंने "मसी कागज छुये नहीं कलम गहे नहीं हाथ"को जिन्होंने अपना आदर्श मान रखा है।कौआ कान लेकर जा रहा है दौड़ौ कौये को पकड़ो कान को बाद में देख लेंगे ऐसा माने वाली मेरी जैसी मूर्ख जनता भी नेताजी के पीछे पीछे भागी चली जाती है क्योंकि देश तो इन्हें ही चलाना है।आखिर संविधान का एक एक अक्षर जो इन्होंने चबा डाला है।कुछ ने संविधान को बचाना पढ़ा है कुछ ने डुबाना।फिर अंत में दोनो मिलकर साझा देश चलाना भी सीखा है वह भी संविधान की...

जय गणतंत्र।

जय गणतंत्र ************ जीते जी अपमान किया मरने पे सम्मान दिया भारती तेरे खातिर मैंने अपना जीवन कुर्बान किया। दोष मेरा बस इतना था चाणक्य जमीं पर जन्मा था बुद्ध किरण से होकर प्रेरित आइंस्टीन को मात दिया। तेरी नजरों में मैं पागल था तुझे नहीं पता मैं घायल था तेरी ही अनपढ़ संतानों ने निज स्वार्थ हेतु था दगा दिया। सात समंदर पार गया तूने समझा सब भार गया मैंने भी पर प्रण ठानी थी अपनी ही मिट्टी में तज प्राण दिया। मेरे मृत देह से भी न तुमने नेह किया कुछ क्षण को भी न टिकने को गेह दिया लावारिस सा सड़क किनारे पड़ा रहा तेरे नालायक बेटों ने कहाँ एंबुलेंस का दान दिया।। कर विदा मुझको तुम हो गये स्वतंत्र मैं भी न रहा अब  परतंत्र सब मिल गाओ जय गणतंत्र खुश रहो सब आज मेरा मान किया मुझको भी पद्मविभूषण दान दिया।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 सूबे बिहार की धरती के अमर्त्यपुत्र पद्मविभूषण वसिष्ठ नारायण सिंह को समर्पित।💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 @**********पद्मनाभ।

नजरें टिक जाती हैं।

मैं  सज़दे भी करता हूँ उसके ही दर पर जहाँ जहाँपनाह के सर झुकते हैं। उसके दरोदीवार से भी दूर रहता हूँ जहाँ उलूकाधिपति की  कृपा बरस रही होती। जानता हूँ लक्ष्मी उल्लू के बगैर रह नहीं सकती आखिर सवारी जो करनी है बेचारा हंस करे तो क्या करे हंसवाहिनी जो बैठी है एक आँख वाले उल्लू को देखकर एकबारगी अनगिनत आँखें निहारती हैं जरूर,पर हंस पर नजर पड़ते ही नजरें टिक जाती हैं।। @**********पद्मनाभ।

आँखें नम नहीं होतीं।

मैंने तो अश्क भी अब उधार लेना सीख लिया लाख कोशिशें कीं पर आँखें नम नहीं होतीं हिचकियों के रफ्तार कम नहीं होते यादों का आना बदस्तूर जारी है आखिर कदम साथ ही बढ़े थे।। @**********पद्मनाभ।

गौओं के अंश।

गौओं के अंश आज कुत्ते खा रहे हैं गौशाले में बैठी भैंस पगुरा रही है मजबूरी में बेचारी गायें कचरे चबा रही हैं ऊपर से तुर्रा ये कि इन्हें चबाना नहीं आता हमने तो घास डाल दिया है नाद में बाकी जो बचा है देख लेंगे चुनाव के बाद में इतना काफी है जिंदा रहने को।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 वित्तरहित शिक्षाकर्मियों को सादर समर्पित 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 @**********पद्मनाभ।

दिल एक मंदिर है।

क्या बताऊँ एक दिन वो दिख गई सामने प्यार का पौध लहराने लगा मन में मैंने कहा आ जाओ दिल एक मंदिर है टेक दो मथ्थे वो बोली जरूर आऊँगी रूक जा मन तो बना लूँ पहले वो आई भी  देखकर दिल में लड्डू फूटे  मन ने कहा गुरु अब तो तेरे दुःख के दिन छूटे दरवाजे पर देख कर खड़ा मेरे मुँह से निकल पड़ा बाहर क्यों हो खड़ी अंदर आ जाओ मन में जल रही है फुलझड़ी वो बोली  थोड़ी सब्र तो कर इतनी जल्दी तू ना मर दिल तेरा मंदिर है मंदिर में होते हैं देवता तूने दर्शन का दिया नेवता  सुनकर मुझे तसल्ली तो मिली फिर बोली हँसकर मैं बेढंगी थोड़े हूँ मुझे पता है मंदिर जाने का ढंग और फिर उसने तो  अपनी चप्पल उतार ली।। @**********पद्मनाभ।

अबला--सबला।

अबला --सबला ************* दादाजी ने घर चलाने को  पैसे दिये थे चंद पैसे हो गये खतम दादा जी के आते ही बड़े प्यार से बोलीं दादी और थोड़ीअबला। मेरी पत्नी पढ़ी लिखी है समझदार है हुजूर मैंने ये सोचकर चंद पैसे दिये ढंग से घर चलायेगी जरूर  पढ़ा लिखा इंसान हूँ साहित्यिक जमात की पहचान हूँ कलम चलाता हूँ अपने आजू बाजू देखकर जो समझ आता है लिख जाता हूँ कवि सम्मेलनों में जाता हूँ मंच पर सम्मान पाता हूँ कभी रामनामी तो कभी किनारीदार अंगवस्त्र भी पाता हूँ हाँ एक बात है भाई इसमें नकद नहीं होती कमाई मंच तक जाने में अपनी जेब से नकद राशि लगाता हूँ इस बात को कभी समझ नहीं पाती लुगाई लौटकर आते ही घर मेरी पढ़ी लिखी प्राण प्यारी दौड़कर आई आँखें तरेरी  होठ बिचकाये हाँथ फैलाये काकी के स्वर में बोली जो कुछ भी कमाकर लाया है सबला।। @**********पद्मनाभ।।

वित्तरहित।

नीति है या अनीति है ये वित्तरहित शिक्षा नीति है। देकर अनुदान बढ़ा दिया मान समाज में मिलने लगा सम्मान। शरीर से निकलने को अब तैयार हैं सबके प्राण। माता पिता पत्नी भ्राता बच्चे सब हैं बेहाल किसी भी क्षण तैयार हैं सब मिल करने को विषपान। प्रबंधन की है ठाट बैठे बैठे तोड़ रहे हैं खाट। शिक्षक शिक्षकेतर करते काम प्रबंधन के साथ यूनियन भी मिल करते हैं आराम। अनुदान की राशि का करते बंदरबाँट होते लट्ठ लेकर ऐसे खड़े जैसे हरियाणवी जाट। बिहार और झारखंड में सब हो गये झंड भूखे प्यासे तड़प रहे पेल रहे हैं दंड। न असन न बसन तन पर फिर भी स्वाति बूँद की आस शायद कलेजा तर हो कभी मिटे गले की प्यास। रक्त मांस सब सूख गये हड्डी शेष बची है फेंके अनुदान के टुकड़ो पर भी लूटन की ही धूम मची है। अंधी बहरी लूली लंगड़ी सरकार बेवजह करती रहती तकरार शर्म हया सब पी गई धोकर रह गई केवल दलालों की होकर। आश्वासनों का देकर प्राशन करती रहती है हम पर शासन साथ सटे हों जब ये दुःशासन कैसे होगा अंत कौन करेगा वित्तरहित व्यवस्था का नाशन।। @**********पद्मनाभ।