Skip to main content

Posts

Showing posts from July, 2022

दुराचरण का नाश सदाचरण से नहीं।

दुराचरण का नाश सदाचरण से कभी नहीं हो सकता । यहाँ लक्ष्य प्रधान होता है ,यदि लक्ष्य धर्मसम्मत है तो येन केन प्रकार से इस लक्ष्य को प्राप्त करना  धर्म सम्मत है । महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था।युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फ़टे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे। वायुमण्डल में घोर उदासी पसरी हुई थी । गिद्ध , कुत्ते, सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा देवब्रत भीष्म शरशय्या पर अकेला सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था।  तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची, "प्रणाम पितामह"! भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी। बोले, " आओ , देवकीनंदन! स्वागत है तुम्हारा ! मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था।” कृष्ण बोले, " क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप !” भीष्म चुप रहे । कुछ क्षण बाद बोले, " पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव !उनका ध्यान रखना, परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रा...

गांव भी शहर हो गेल।

अब तो सपना हो गेल खपड़पोस दूरा पर  ढिबरी बरैत देखला पोरा बिछल बिछौना आऊ मटपर के आग उठौना बाबा के गोदी में बैठ के  रजाई मे झाँकल देह सुनैत परियन के खिस्सा पहाड़ा बीस एकम बिस्सा भेल साँझ मामा के झँकल अँचरा से देखवैत सँझौत मैया के कुलदेउतन से मनवैत मनौत बरखा में चुऐत ओसरा के ओरी बगैचा में आम के अमोरी चुऐत तार के फेदा इयाद आव हे यदा कदा बंधल गोशाला में गैयन के घंटी के धुन कहाँ सुना हे  गांव भी शहर हो गेल एही बुझा हे। .....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

कृष्णावतार।

दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दु:शासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी।   महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।      भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखा...।   भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जब-तक सब देख नहीं लिया, तब-तक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।         धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।      दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला।  द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप ...

सूर्य रहस्यम्।

सूर्यरहस्य - प्रथम अधिकार ॥अथ चैत्राधिकारः॥ मगं प्रसूनमिश्राख्यं सुप्तं मार्त्तण्डभैरवम्। स्वप्ने निदर्शयामास रहस्यं कश्यपात्मजः॥०१॥ सोऽब्रवीदग्रदिवसे निग्रहं मे निबोधय। स्वप्ने दृष्टं रहस्यं विस्मृतमस्ति मयाधुना॥०२॥ सोये हुए, प्रसूनमिश्र के नाम से प्रसिद्ध मगविप्र मार्तण्डभैरव को कश्यपपुत्र भगवान् सूर्य ने अपने रहस्य का स्वप्न में दर्शन कराया। उन्होंने अगले दिन निग्रहाचार्य को कहा कि स्वप्न में जो रहस्य मैंने देखा, उसे मैं भूल गया हूँ, आप उसे मुझे बतायें।  रहस्यं नैव जानेऽहमाह निग्रहदेशिकः। विज्ञातुं यामि देवस्थानस्थसूर्यालयं प्रति॥०३॥ इत्युक्त्वा निग्रहाचार्यो देवं गत्वा समुत्सुकः। स तपस्तप्तुमारेभे भास्कराह्लादहेतवे॥०४॥ तब गुरु निग्रहाचार्य ने कहा कि मैं भी उस रहस्य को नहीं जानता हूँ किन्तु देव नामक स्थान में स्थित सूर्यमन्दिर में उसे जानने की इच्छा से जाता हूँ। इस प्रकार कहकर उत्सुक निग्रहाचार्य ने देव जाकर सूर्यदेव की प्रसन्नता हेतु तपस्या करना आरम्भ किया।  स जजाप महावाक्यं सौरञ्चैव चतुष्पदाम्। आथर्वणीञ्च सूर्यस्य प्राणायामपरायणः॥०५॥ ततश्चाविरभूद्देवो निग्रहस्य कलेवरे। स ...

एकांत वास।

जगाती है नई आस एकांत वास बढ़ाती मिलन की प्यास  एकांत वास नये विचार नई सोंच नई ऊर्जा नया सवेरा लिये जगाता सूरज नित्य बनाता दिन को खास एकांत वास चाँद की चाँदनी गाती है शीतल राग विहँसते तारों को देख हर्षित मन भरता उच्छ्वास एकांत वास ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।