न भाषा न भाव फिर भी बातें हो रही समभाव की दिखा रहे हैं ताव ऐंठ रहे हैं मूँछें करते बात हर क्षण हमें अपनाव की।। न वैचारिक शाम्य नहीं दिखती सौम्यता व्यवहार में जलती ज्वाला क्रोध की अपशब्दों की लिये माला हाँथों में खड़े रहते सदैव तत्पर स्वागतार्थ।। सुधारवादी नीति के समर्थक निरर्थक हुजूम लगाने को बेचैन करते भागदौड़ पटरियों पर समाज के अपनी फ्रेमयुक्त तस्वीर लिये।। बातों में साफगोई मंच पर किस्सा वही पुराना कोई धार धार जार जार घड़ियाली आँसू बहाता हर कोई दादा जी के हाँथी का सिक्कड़ लिये।। 💐💐💐💐💐@पद्मनाभ💐💐💐💐💐