अँगुष्ठा से कनिष्ठा तक
हस्तपादात्
एकीकृत नहीं
अँगुलियाँ
तो फिर
किस बूते
करते हैं
हम
एका की बात?
स्वरूप भिन्न
आकार अलग
प्रकार बहुतेरे
खान पान
असन बसन
तन मन धन
चिन्तन मनन
धारणा अवधारणा
कुछ भी तो
मेल नहीं खाती
सिर्फ पुरखों की थाती
वही संझा वही पराती
कुछ आत्मसाती
कुछ आत्मघाती
फिर भी कहते सब
एकता हमारा मूलमंत्र है
भले मन में चल रहा
सतत षड्यंत्र है।।
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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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