सबके घर में दीप जलेंगे मेरे घर अँधियारा होगा।
इस दो रंगी नीति से आखिर कब छुटकारा होगा।।
उनके घर में फुटे फटाखे मेरे घर पर धुआँ धुआँ।
उनके बच्चों की किलकारी मेरे बच्चे हुआँ हुआँ।।
कैसी यह नीति कैसा रिवाज है यह।
बिन पेंदी के टहरी सा समाज है यह।।
एबीसीडी का ज्ञान नहीं पर हुकूमत छाँट रहे।
एम.ए.,पी.एच. डी.करके खाली हाँड़ी झाँक रहे।।
लगातार वर्षों से ये मुफ्त में ज्ञान को बाँट रहे।
उम्मीदों की देहली पर ही जीवन अपना काट रहे।।
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उन सभी वित्तरहित कर्मियों को जो कि विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों में कार्यरत्त रहकर अपने जीवन को सरकार या प्रबंधन या फिर तथाकथित अहितकारी कर्मचारी संघ के मनमाने पन के शिकार हो रहे हैं, को आनेवाली दीपावली की बहुत बहुत बधाई,शुभकामनाएं।
आपका ही एक शोषित मित्र।
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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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