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Showing posts from May, 2020

आखिर मैं कहाँ हूँ?

आखिर मैं कहाँ हूँ? **************** सम्पूर्ण बंदी का एक लंबा दौर।छोटे मँझले बड़े सभी शिक्षण संस्थान बंद।बड़े मँझोले छोटे सभी कारोबार ठप।सरकारी गैर सरकारी सभी प्रतिष्ठान भी बंद।हर प्रकार के धार्मिक स्थलों में भी ताले लटका दिये गये,राजनीति के मंदिर भी बंद,सभी विधायक, सांसद,मंत्री अपने अपने क्षेत्र में ही रहकर अपने ही घर से अपने दायित्व का निर्वहन करेंगे।सबके सामने जीवन यापन ,परिवार के भरण पोषण की विकट समस्या। सरकारी स्तर पर समस्या का निदान....... 💐सरकारी कर्मचारियों का वेतन भुगतान नियमित होता रहेगा। 💐मजदूरों को राशन के साथ नगद राशि प्रदान करने का प्रावधान। 💐सभी विधायकों, सांसदों, मंत्रियों को पूर्व से निर्धारित वेतन भत्तों में पहले वृद्धि फिर कुछ कटौती कर ससमय राशि का भुगतान। ध्यातव्य......... समाज के शेष तबकों में दो विशेष तबके मंदिरों के वे पुजारी या दैनिक पूजन व्यवस्था में संलग्न ब्राह्मण जिनका आधार सिर्फ मंदिरों में आये दर्शनार्थियों या अपने यजमानों के कल्याणार्थ अनुष्ठान से प्राप्त आय ही था।इसी से उनका एवं उनके आश्रितों का भरण पोषण हुआ करता था।आज सम्पूर्ण बंदी में इनकी आय भी बंद और...

बग्ला साधना।

मां बगलामुखी परिचय एवं साधना नियम । पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। कई लोग संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए।  इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव ने कहा शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं। तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया।  उस समय रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका...

आत्मचिंतन।

आत्मचिन्तन *********** सामाजिकी बड़ा ही दुस्कर कार्य है।इसमे सर्व प्रथम मैं का त्याग और हम को स्वीकार करना  परमावश्यक है।इसमे प्रताड़ना,अवहेलना,आलोचना,असहयोग,अवज्ञा रूपी आभूषणों से सुसज्जित होना अनिवार्य है। शायद यही कारण रहा होगा जब गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर को एकला चालो रे का सिद्धांत प्रतिपादित करना पड़ा होगा।आखिर गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी स्वान्तः सुखाय को ही मान्यता प्रदान की।शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद आदि ने भी तो अकेले ही के दम पर सम्पूर्ण विश्व को भारतीय संस्कृति का लोहा मनवाया।लेकिन इसका मतलब स्वयम्भू होने से नहीं है।विचार विनिमय को भी प्रधानता दी गई है।व्यष्टि और समष्टि में अंतर तो है।किसी के व्यक्तिगत विचार समष्टिगत तभी हो सकते हैं जब उसे वैभिन्यता के मध्य विचारविनिमय की कसौटी पर कस कर खरा उतारा जाय।यदि ऐसा नहीं होता तो वही ढाक के तीन पात वाली लोकोक्ति चरितार्थ होगी। आपकी यदि समाज से अपेक्षा है तो समाज की भी आपसे अपेक्षा रहती है।दोनों की अपेक्षाओं का पूर्ण होना ही सापेक्ष वातावरण के निर्माण मे सहायक होने की संभावना प्रबल करेगा।वैसे तो यह भारत है।महाभारत भी यहीं हुआ था।स...

चरणामृत।

"चरणामृत और पंचामृत में क्या अंतर है..??" 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 मंदिर में या फिर घर/मंदिर  पर जब भी कोई पूजन होती है, तो चरणामृत या पंचामृत दिया हैं। मगर हम में से ऐसे कई लोग इसकी  महिमा और इसके बनने की प्रक्रिया को नहीं जानते होंगे। चरणामृत का अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत और पंचामृत का अर्थ पांच अमृत यानि पांच पवित्र वस्तुओं से बना। दोनों को ही पीने से व्यक्ति के भीतर जहां सकारात्मक भावों की उत्पत्ति होती है,  वहीं यह सेहत से जुड़ा मामला भी है। 👉चरणामृत क्या है.??  〰〰🌼🌼〰〰 शास्त्रों में कहा गया है - अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।। अर्थात : भगवान विष्णु के चरणों का अमृतरूपी जल सभी तरह के पापों का नाश करने वाला है। यह औषधि के समान है। जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। कैसे बनता चरणामृत..??  〰〰🌼〰〰🌼〰〰 तांबे के बर्तन में चरणामृत रूपी जल रखने से उसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं। चरणामृत में तुलसी पत्ता, तिल और दूसरे औषधीय तत्व मिले होते हैं। मंदिर या घर में हमेशा तांबे के लोटे में तुलसी म...

दानंदुर्गतिनाशनम्।

दानं दुर्गति नाशनम्। ................................. शास्त्र बताते हैं दान से दुर्गति का नाश होता है।शायद इसलिए आज दान करना कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण लग रहा है।जिधर भी नजर जाती है दान के ही चर्चे सुनने और देखने में आ रहे हैं।टीवी,अखवार ,सादृश्यचलभाष हो या टोला टाटी,आस पड़ोस ,स्त्री पुरुष सब के सब आजकल दान की ही चर्चा म़े मशगूल दिखते हैं।ऐसा लग रहा है मानो सब एक साथ ही इसी कोरोनाकाल में दुर्गतिमुक्त हो जाना चाह रहे हैं।संभव है कोरोना से मरने का भय भी सता रहा हो।शायद इस कारण भी लोग इसी जनम में दुर्गतिमुक्त हो जाना चाह रहे हों ताकि अगला जनम शायद सुधर जाय।फिर कोरोना या इस जैसी अन्य कोई विपदा नहीं सतावे।खैर जो भी हो दान की महत्ता जब शास्त्र सम्मत है तो अवश्य करना चाहिये।लेकिन हमने दान किया या नहीं इसका प्रमाण मेरे नहीं रहने पर या भगवान चित्रगुप्त के किसी दूत के द्वारा जाँच किये जाने पर प्रमाण स्वरूप उपस्थित किया जा सके यह भी आवश्यक है।आज सब जगह प्रमाण माँगा जा रहा है तो संभव है देवलोक में भी दुर्गतिनाश के लिये प्रमाण माँगा जाये ! ऐसे में यह भी आवश्यक ही है कि जाँच पदाधिकारी स्वरूप देव के सम...

मैंने मैं को।

आज सच में मैंने मैं के हाँथों सौंप दिया अपने आपको और कोई चारा भी तो नहीं बहुत मारे हाँथ  पाँव भी चलाये पर सब व्यर्थ निरर्थक परेशानी का सबब ही रहा तन मन मिजाज बुद्धि बल सब लगाकर देख लिया कुछ काम न आया आज इतमिनान हो गया मैं मैं को सौंपकर आक्रांत रहा करता था  भय से क्या होगा  कैसे होगा कब होगा सोंच लिया अब जो होगा जैसे होगा जब होगा  तैसे होगा जो होगा सब अच्छा ही होगा प्रसन्न हूँ तब जब मैंने सौंप दिया मैं को मैं खुला आसमान स्वच्छ हवायें नदी की निर्मल धार हरे भरे वृक्ष गुल्म लतायें हँसती खिलखिलाती शोर मचाती गौरैयों के झुंड कबूतरों की गुटर गूँ कौओं के काँव काँव कोयल की कुहु सुन सकता हूँ आज सुबह शाम दिनरात तब जब मैंने सौंप दिया  मैं को मैं के हाथ चिरशांति की होती है  अनुभूति तब जब लगाता हूँ ध्यान साफ साफ सुनता हूँ मुरली की मधुर तान देख पाता हूँ मधुर मुस्कान की मुद्रा सिंहवाहिनी के खड्ग खप्पर करधारिणी मुंडमालिनी काल की संहारिणी महाकालसंगिनी कालिका के कल्याणमयी स्लरूप को प्रत्यक्ष समक्ष तब जब सौंप दिया मैने मैं को।। ..........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

ईश्वर का अवतार भारत मे ही क्यों।

*सनातन धर्म के ऊपर वामपंथी आक्षेपों का उत्तर* आजकल एक वामपंथी लेख बहुत प्रचारित हो रहा है, जिसमें कुछ प्रश्न (आक्षेप) किये गए हैं। धर्मविरोधी जन ये प्रश्न करते तो हैं किंतु कभी स्वयं उसका उत्तर नहीं खोजना चाहते। इसका कारण यह है कि इनमें जिज्ञासा अथवा ज्ञान के प्रति श्रद्धा नहीं होती है, मात्र विवाद के आधार पर अपना अस्तित्व दृढ़ करने का निरर्थक प्रयास करते हैं। वैसे तो इनमें से अधिकांश प्रश्न अत्यंत ही निम्नस्तरीय हैं तथा कोई भी सामान्य अध्ययन वाला व्यक्ति इनका उत्तर अत्यंत सरलता से दे सकता है, किन्तु मैं अपनी ओर से कुछ शास्त्रीय आलोक में इनका समाधान कर रहा हूँ - प्रश्न ०१ - सभी देवी देवताओं ने भारत में ही जन्म क्यों लिया? क्यों किसी भी देवी देवता को भारत के बाहर कोई नहीं जानता ? उत्तर ०१ - सर्वप्रथम तो यह गलती सुधारें कि देवताओं ने जन्म लिया है। उनका जन्म लौकिक नहीं होता इसीलिए वे अवतार लेते हैं, जन्म नहीं। जहां उनके जन्म की चर्चा आयी है वहां अवतार का ही अर्थ समझना चाहिए। साथ ही, असंख्यात देवताओं में सभी अवतार नहीं लेते, कुछ देवता ही अवतार ग्रहण करके लोककल्याण का कार्य सम्पादित करते हैं...

एक स्वप्न।

एक स्वप्न समृद्ध भारत का *********************** रात्रि के बारह बज रहल हे।सम्पूर्ण बंदी के चलते सड़़क एकदम सुनसान हो गेल हे।अइसे पहिले रातोभर चहलपहल रह हल।हमर घर के खिड़की सड़क दने खुल हे ई चलते रातभर गाड़ी आउ पैदल आवाजाही के पता चलैत रह हल।ई तो रात हे अब तो दिनो में सन्नाटा लग हे।सब दोकान दौरी भी सबेरहीं बंद हो जाहे।पता न कबतक ई तरह से कटत।लैकन भी सब बाहरे बाहर हथ।चिंता लगल रह हे।समय पर नींदो न आवे।अपने साथ साथ लैकन के भी आमदनी के सब रस्ता बंद हे।सब कल कारखाना ,सरकारी, गैरसरकारी कार्यालय भी बंद हे।ऐसन में अचानक से देश के परधान के घोषणा समृद्ध भारत बनावे के सुन के सोंचे लगली ई कैसे संभव हे?एतने में  गजोधर भाई के फोन आ गेल।मन तो अकुलाईत हल बकि का करुँ फोन उठावहीं पड़ल ।इयार के बात हे।फोन उठैते के साथ ओने से ओही अपन अंदाज में आवाज आयल "सुत गेली का बाबा!माफ करूँ नींद न आवित हे सोंचली अपने से तनि बतिया लेऊँ शायद कुछ मन हलका होयत त का जनी नींदो आ जाये!एने हमहूँ निंदुअऐले नियन बोलली अरे न न गजोधर भाई हमहुँ अभी जगलहीं ही।बोल कैसे इयाद कैल ई घड़ी?हालचाल सब ठीक हौ न?बढ़िया कैल बतिया लेल ढेर दिन ह...

मैं जा रहा हूँ।

मैं  जा रहा हूँ तुम्हें छोड़कर इस विश्वास के साथ कि कभी लौटकर अगर आना हुआ मिलेंगे फिर उसी लब्बो लुआब के साथ ऐ शहर। खुश रहो आबाद रहो जिन्दाबाद रहो भले हमें बरबाद कहो पर हमने जो सजाया  सँवारा निखारा तेरे स्वरूप को रंग रोगन लगाकर भूलना मत तुम मुझे याद करना भले यादों में ही सही ऐ शहर। मेरा क्या मैं क्या जो कल था  आज भी हूँ आगे भी रहूँगा लूँगा नहीं कुछ दिया है आगे भी कुछ न कुछ दूँगा ही हाँ गर लूँगा तो सिर्फ तेरे आँसू बदले में दूँगा खुशियाँ हजार चाहे पड़े मुझे भटकना दर बदर ऐ शहर। बस एक विनती है मेरी हो सके तो इतना दुआ करना रब से न छूटे गाँव अब कभी हमसे सजायें आँचल माता का एक बार फिर अपने दम से जो बिखर कर हो गया था तार तार जिसके दम तुम लगाते थे ठहाके  हजार ऐ शहर। ..........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

बेजरूरत।

निकलो न बेजरूरत तनहा अब गलियों मे शहर की लुटेरे अस्मत के हैं छुपे सब ओर चलो मगर सम्हल के। बेटियां अब सीखो गुर बचाव के खंजर छुपाके रखो पोशाक मे तुम चलो मगर सम्हल के। मुश्किलों मे कहती हो जिसे भाई तुम दरिन्दे हैं वो वीर नहीं चलो मगर सम्हल के बुलबुल न बनकर तुम रहो कि सय्याद सतायें तुम्हें जियो बनकर बाज अब चलो मगर सम्हल के।        ......  ...मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

हिन्दुत्व की मृत्यु।

      खण्डन मण्डन कार्यक्रम समाचार प्रश्न समाधान इतिहास पुराण धर्म निर्णय साधना एवं तंत्र प्रकीर्ण हमारे विषय में हमसे सम्पर्क करें Home     प्रकीर्ण     हिंदुत्व की मृत्यु हिंदुत्व की मृत्यु By   Publishing Bot   205   Facebook   Twitter हिंदुत्व की मृत्यु…. प्रस्तुत विषय विरोधाभास से युक्त हैं क्योंकि विराट सर्वव्यापी सनातन एवं उसके अंदर सन्निहित महान हिंदुत्व, नाशादि भौतिक विकारों से रहित हैं। आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में दो प्रकार के हिन्दू हो गए हैं :- जीवित एवं मृत। यहाँ जीवन या मृत्यु का अर्थ शरीर प्राप्ति या वियोग से नहीं है। तात्पर्य धार्मिक निष्ठा एवं तत्परता से है। प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक है कि वह अपने वर्ण, जाति, आश्रम, कुल एवं पद के अनुरूप कर्तव्य का पालन करते हुए अधिकारों का उपभोग करे। इसके लिए आवश्यक है कि वह धैर्य, श्रद्धा, विनम्रता एवं परिश्रम से साथ मान्य शास्त्रीय परम्परा सम्मत मठ, आश्रम, गुरुमण्डल एवं आचार्यों की शरण ग्रहण करके मान्य प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर उनके ज्ञान से लाभान्वित हो। कर्तव्य एवं अधि...

महाभारत की तीन देवियां।

*महाभारत का निहितार्थ:भाग-3* ========================= *महाभारत की तीन देवियाँ: कुंती, गंधारी और द्रौपदी* =========================== महाभारतकालीन समाज दो युगों के संक्रमण काल की संधि वेला में जी रहा था।धर्म और अधर्म, न्याय और अन्याय, नीति और अनीति,स्वार्थ और परमार्थ तथा शासन और अनुशासन के मध्य पूरी सभ्यता खड़ी थी।स्थिति की भयानकता ऐसी कि राजमहल की बधू अपमानित होकर चिखती- चिल्लाती रही और सिंहासन अंतर्बाह्य नेत्रहीनता की स्थिति में विवश बना रहा।युग के सारे आचार्य, पंडित और मर्यादाधारी महापुरुष कुलबधू के वस्त्रहरण के प्रयास का वीभत्स दृश्य मौन और गौण होकर नग्न आँखों से देखते रह गये,परंत विकर्ण और महात्मा विदुर को छोड़कर किसी ने इस अनाचार, अनैतिक और व्यभिचारपूर्ण कृत्य का विरोध नहीं किया।महाभारत युद्ध का बीज-वपन इसी सभा में हुआ था। ● आइए,संक्षेप में उपर्युक्त तीन देवियों के व्यक्तित्व और कर्तृत्व पर विचार करें।ब्रह्मांडपुराण (3/7/219) में कहा गया है- *अहल्या द्रौपदी तारा कुन्ती मंदोदरी तथा।* *पञ्चकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातक नाशनम्।।* उपर्युक्त नारियों को शास्त्र ने *पंचकन्या* कहा है। नागर...

सनातन धर्म।

🚩सर्वश्रेष्ठ सनातन धर्म 🚩  🌹 संसार में मुख्य रूप से चार धर्म प्रचलित है---हिन्दूधर्म (सनातनधर्म) मुस्लिमधर्म, बौध्दधर्म, और ईसाईधर्म। इन चारों धर्मों में से एक-एक धर्म को मानने वाले करोड़ों मनुष्य हैं। इन चारों धर्मों में भी अवान्तर कई धर्म है। हिंदू धर्म को छोड़कर शेष तीनों धर्मों के मूल में धर्म चलाने वाला कोई व्यक्ति मिलेगा, जैसे-- मुस्लिम धर्म के मूल में मोहम्मद साहब, बौद्ध धर्म के मूल में गौतम बुद्ध और ईसाई धर्म के मूल में ईसामसीह मिलेंगे। परंतु हिंदू धर्म के मूल में कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा। कारण कि हिंदूधर्म किसी व्यक्ति के द्वारा चलाया हुआ धर्म नहीं है, प्रत्युत यह अनादि काल से चला आ रहा है। जैसे भगवान सनातन् (शाश्वत) है, ऐसे ही हिंदू धर्म भी सनातन है, इसलिए हिंदू धर्म को "सनातनधर्म" भी कहते हैं। भगवान ने भी इस सनातनधर्म को अपना स्वरूप बताया है। जिस युग में जब-जब इस सनातन धर्म का ह्रास होता है, हानि होती है, तब-तब भगवान अवतार लेकर इसके संस्थापना करते हैं। तात्पर्य है कि भगवान भी इसकी रक्षा करने के लिए ही अवतार लेते हैं, इसको बनाने अथवा उत्पन्न करने के लिए नहीं। अर्ज...

महाभारत का कारण।

महाभारत सिरियल देखने के बाद कुछ विचार मेरे मन में आये हैं।वे विचार यहाँ  एक आलेख के रूप में प्रस्तुत है। ÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷ *आज के जीवन में महाभारत की प्रासंगिकता* ================================== महाभारत सिरियल अब समाप्ति पर है।कौरव पक्ष के प्रायः सभी मारे गये। हम महाभारत को देखकर कह देते हैं कि दोनों पक्षों ने अधर्म का आश्रय लिया।इसका मुख्य कारण है कि हम धर्म के मर्म को नहीं समझते हैं। ● कौरवों ने लाक्षागृह से लेकर द्रौपदी के चीरहरण तक और उसके बाद भी अनेक अधर्म कृत्य किये।दुर्योधन यह सब कुछ इसलिए करता रहा कि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में उसे भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि की छाया मिलती रही। पिता धृतराष्ट्र सिर्फ़ आँख से ही अंधे नहीं थे,वे विचार से,व्यवहार से और अपने गर्हित संस्कार से से भी अंधे थे।उनकी पुत्र-मोहांधता और गहन थी।यही कारण है कि वनवास से लौटने पर नारायण श्रीकृष्ण की बात को दुर्योधन ने दुत्कार दिया और कहा *शूच्यग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव*। सिंहासन पर बैठा धृतराष्ट्र मौन और गौण बना रहा।महात्मा विदुर समयानुसार अपनी नीति के दर्शन को निर्भीक...

मधुशाला।

मधुशाला। ********* अमृत पीकर क्या होगा चिर शांत जायेगा बैठ  कहीं पीनेवाला जो मिल जाय रस हाला बस पीता जाय मतवाला एक रोज पिये हर रोज पिये पल पल क्षण क्षण पीता जाये चाह नहीं पर मिटे कभी टूटे चाहे कितना प्याला ऊपरवाले ने भेजा है हर हाथ लिये मधुघट प्याला मरघट जाने से पहले ले बैठ तनिक तू मधुशाला स्वागत करने को खड़ी मिलेगी मधुघट हाथ लिये तब मधुबाला।। ..........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।

कामदेव ....एक विहंगम दृष्टि।

कामदेव के तेरह तथ्य जानकर चौंक जाएंगे आप!!!!!     हिन्दू धर्म में कामदेव, कामसूत्र, कामशास्त्र और चार पुरुषर्थों में से एक काम की बहुत चर्चा होती है। खजुराहो में कामसूत्र से संबंधित कई मूर्तियां हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या काम का अर्थ सेक्स ही होता है? नहीं, काम का अर्थ होता है कार्य, कामना और कामेच्छा से। वह सारे कार्य जिससे जीवन आनंददायक, सुखी, शुभ और सुंदर बनता है काम के अंतर्गत ही आते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। आपने कामदेव के बारे में सुना या पढ़ा होगा। पौराणिक काल की कई कहानियों में कामदेव का उल्लेख मिलता है। जितनी भी कहानियों में कामदेव के बारे में जहां कहीं भी उल्लेख हुआ है, उन्हें पढ़कर एक बात जो समझ में आती है वह यह कि कि कामदेव का संबंध प्रेम और कामेच्छा से है। लेकिन असल में कामदेव हैं कौन? क्या वह एक काल्पनिक भाव है जो देव और ऋषियों को सताता रहता था या कि वह भी किसी देवता की तरह एक देवता थे?आजो जानते हैं कामदेव के बारे में 13 रहस्य... कामदेव का परिवार :पौराणिक कथाओं के अनुसार कामदेव भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के पुत्र हैं। उनका विवाह रति नाम की देवी से हुआ...