हवा का रुख बदल रहा है
संभल कर चलना पथिक
तेज आँधियों में कहीं
उड़ न जायें सपने तेरे।
कैद करने को आतुर हैं
मछुआरे नदी के तीर पर
बंसी में चेरा लगाये जोह रहे हैं बाट
तेरे आने की पानी की सतह पर।
पाँव जमाये रखना
तब तक जमीं पर तुम
जब तक तूफान का दौर
थम न जाये।
अमावश की रात से
पूनम की चाँदनी तक
पहुँचने में वक्त लगता है
धीरज की लौ कहीं बूझने न पाये।
.....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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