भारतीय जीवनशैली हो या साहित्य,कला अथवा संस्कृति सबकी पहचान कृष्ण से ही बनती है।भारत की राजनीति अथवा भारतीय धर्म के मर्म को जानना है तो कृष्ण को जानना ही होगा,क्योंकि कृष्ण का चरित्र ही भारतीय अस्मिता का आधार है।एकमात्र कृष्ण ही हैं जिनमें सोलहो कलायें विद्यमान हैं।जिस प्रकार पूनम का चाँद सोलह कलाओं से युक्त होने के कारण पूर्ण चंद्र की संज्ञा पाता है ठीक वैसे ही श्रीकृष्ण भी पूर्ण ब्रह्म हैं।मानवीय स्वरूप का समग्र दर्शन हमें कृष्ण के रूप में प्राप्त होता है।नृत्य,गीत,नाद,सौंदर्य,वाक्पटुता,राजनीति,योग,आध्यात्म का समग्र चिंतन उपलब्ध है कृष्ण में।गोपालन,गोचारण,गोदोहन से लेकर विप्रचरणवंदन तक यदि देखना समझना हो तो श्रीकृष्ण के निकट जाना ही होगा।समाज के सबसे पिछले पायदान पर बैठे व्यक्ति को सम्मानित करने की कला या रणांगण में आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण समझना चाहते हैं तो बिना श्रीकृष्ण शरणागति के असंभव है।इस कर्ममय संसार में बिना कर्मयोग के जाने यदि हम आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तो असफलता ही हाँथ लगती है।इसीलिये श्रीमद्भगवद्गीता में कर्मयोग के माध्यम से सफल जीवन का मर्म समझाया है कृष्ण ने।श्री कृष्ण के विविध रूपों के दर्शन कर कभी कभी हम असमंजस में पड़ जाते हैं,समझ नहीं पाते आखिर कृष्ण को हम क्या माने?व्रजगोपियों संग रास रचाना और द्वारकागमन के पश्चात् कृष्ण के वियोग में गोपियों का रुदन।उद्वव के लाख समझाने के बाद भी कृष्ण दर्शन को अपने प्राणोत्सर्ग तक कर देने का संकल्प।यह मानवीय प्रेम की पराकाष्ठा ही तो है।भक्तों के बीच कृष्ण का लाख विकृत स्वरूप प्रदर्शित किया जाय किन्तु उन्हें कृष्ण का बस एक ही स्वरूप याद रहता है"यत्र योगेश्वरोकृष्णःतत्र श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवानीतिर्मतिर्मम।"।रस ,राग ,प्रेम ,भोग,कर्म,योग किसी भी दृष्टिकोण से विचार करें "कृष्णमयं जगत् सर्वं"ही दिखेगा।
रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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