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गोपी चीर हरण।

.    #परम_पवित्र_कथा_है_गोपी_चीर_हरण_की,
 
           बड़ा गंभीर प्रसंग है,
     चौरासी कोस के ब्रजमंडल में रहने वाली जो गोपी है, प्रातः ब्रह्म मूहूर्त में उठ जाती हैं, प्रातः चार बजे से लेकर साढ़े पांच बजे तक का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है, सर्दी के दिनों में प्रातः चार बजे बहुत अन्धकार रहता है।

     चार बजे सर्दी के दिनों में गोपी उठकर जातीं, पूरे कपड़े उतारकर यमुना किनारे रख देतीं और बिल्कुल निर्वस्त्र होकर यमुना स्नान करतीं, यमुना स्नान करके वे फिर अपने वस्त्रों को पहन लेती और कात्यायनी माता की पूजा करतीं, माता कात्यायनी की धूप-दीप नैवेद्य से पूजा करके मांगती है क्या? 

        #कात्यायनी_महामाये__महायोगि_न्यधीश्वरि।
        #नन्द_गोप_सुतं_देवि_पतिं_मे_कुरू_ते_नमः।।

     हे माता कात्यायनी ! हम आपके चरणों में प्रणाम करतीं है, नन्दगोप के पुत्र श्री कृष्ण ही हमें पति रूप में मिले, ऐसा आशीर्वाद दे दो। 
     ऐसा सुन्दर भाव, इस भाव का कोई शब्दों में क्या वर्णन करेगा, एक दिन गोपियों को मार्ग में कृष्ण मिल गये एक महीने तक जब उन्होंने व्रत किया।

     कन्हैया मार्ग में मिलकर बोले- देवियों, आप यमुना स्नान करती हो मेरे को सब मालूम है, यमुना स्नान करके कात्यायनी की पूजा करौ ये भी हमकूं पत्तों है, कात्यायनी मां की पूजा करके हमें पतिरूप में मांगौ ये भी मैं जानू, लेकिन स्नान करने की जो तुम्हारी पद्धति है ये बिल्कुल अच्छी नहीं है, क्यों? क्योंकि वेद कहता है, किसी भी जलाशय में निर्वस्त्र होकर स्नान मत करो।

     निर्वस्त्र होकर स्नान करने से दो प्रकार का अपराध है- लौकिक अपराध और धार्मिक अपराध, धार्मिक अपराध यह है कि जल का जो स्वामी है उसका नाम है वरूण देवता, यदि हम जल में निर्वस्त्र या नग्न होकर नहाते हैं तो वरूण देवता का अपराध हो जाता है, ये अच्छी बात नहीं, दूसरा अपराध है लौकिक, आप जल में निर्वस्त्र स्नान करती हो, तुम नारी हो।

     मानलो कोई आकर तुम्हारे वस्त्रों को किनारे से उठाकर ले जाये तो फिर बाहर कैसे निकलोगी? इसलिये मेरा तुम से कहना है कि ऐसे स्नान मत किया करो, गोपियां बोली, बड़े आयें हमें समझाने वाले, यहाँ चार बजे सवेरे कौन आवै? हम तो ऐसे ही न्हायेंगे, कृष्ण ने सोचा- ये ऐसे नहीं मानेगी, इनको तो यथार्थ में ही बताना पड़ेगा। 

     सज्जनों ! एक दिन गोपियां स्नान करने गयीं, पूरे वस्त्र उतारकर किनारे रख दिये, जै श्रीकृष्ण, जै श्रीकृष्ण करके नहा रही हैं, मेरे गोविन्द ने बढ़िया मौका देखकर गोपियों के पूरे वस्त्रों को लेकर के कदम्ब के ऊपर चढ़ गये, गोपियां तो नहा रही है आराम से, इतने में एक गोपी ने कहा- बहना अब नहाती ही रहोगी कि बाहर भी निकलोगी, कात्यायनी की पूजन भी तौ करनौ है।

     जैसे ही निकलने के लिए तैयार हुई, किनारे की ओर देखा तो वस्त्र नहीं है, हे भगवान्, हमारे वस्त्रन् ने कौन लै गयौ? बिचारी कंठभर जल में खड़ी है, निकलें तो निकलें कैसे? गोपियों ने जब किनारे खड़े कदम्ब के वृक्ष पर नजर डालकर देखा तो कदम्ब की डाली पर श्रीमानजी बिराजे हुए हैं, कपड़े भी टंगे है, लाला, अरे ओ कन्हैया, हमारे वस्त्र आपने क्यूँ चुरा लिये।

     कन्हैया बोले- मैंने कोई वस्त्र नहीं चुराये, बोली, कदम्ब पर टांग रखे है यही तो वस्त्र हैं, कन्हैया बोले- ये तो मेरे कदम्ब पै फूल आये हैं, गोपी बोली- इतने बड़े-बड़े फूल? हरे, पीले, लाल, नीले, बैंगनी, रंग-बिरंगे फूल? कन्हैया बोले- मेरो कदम्ब दुनियां से निरालो है, इस पर तो ऐसौ ही बडौ-बडौ फूल आवै।

         श्यामसुन्दर ते दास्यः करवाम तवोदितम्।
         देहिवासांसि धर्मज्ञ नो चेद् राज्ञे ब्रुवामहे।।

     गोपियों ने कहा- लाला, आप जो कहोगे हम करेंगे, हमारे वस्त्र हमको दै दियौ, कन्हैया ने कही- सुनो, यदि ये कदम्ब पर तुम्हारे वस्त्र है और तुम्हें अपने वस्त्र चाहिये तौ एक ही काम हो सकता है, एक-एक गोपी जल से बाहर निकलकर कदम्ब के नीचे आवो और अपने कपड़े लेकर चली जाओ।

       भवत्यो यदि मे दास्यो मयोक्तं वा करिष्यथ।
       अत्रागत्य स्ववासांसि प्रतीच्छन्तु शुचिस्मिताः।।

     गोपियां बोली- बाहर निकलने के योग्य तो हम है ही नहीं, यदि होती तो आपसे प्रार्थना ही क्यों करतीं? आप पूरे वस्त्रों को नीचे डालकर उधर चले जाओं फिर हम निकलकर पहन लेंगी, कन्हैया बोले- ऐसौ तो नांय हो सकै, यदि तुम्हें अपने वस्त्र चाहिये तो जल से बाहर निकलो और अपने-अपने वस्त्र लेकर चली जाओ।

     यहाँ चार प्रकार की गोपियां है- शुद्र स्वभाव की, वैश्य स्वभाव की, ब्राह्मण स्वभाव की और क्षत्रिय स्वभाव की, शुद्र स्वभाव की कहती कि हे स्याम सुन्दर हम आपकी दासी है, आप जैसा कहेंगे वैसा करेंगे हमें हमारे कपड़े दे दो, वैश्य स्वभाव वाली कहती हम आपसे लड़ाई झगड़ा नहीं चाहती हमें अपने कपड़े दे दो, क्योंकि वैश्य लोग राजीपा ही करते हैं लड़ाई नहीं।

     ब्राह्मण स्वभाव वाली कहती आप धर्मात्मा है आपके बाबा भी धर्मात्मा है, आपकी बड़ी कृपा होगी हमें हमारे कपड़े दे दो, चौथी है क्षत्रिय प्रकृति कि, हे श्याम सुन्दर कपड़े दे दो नहीं तो देख लेना, एक गोपी ने दूसरी गोपी को देखा, ये तो ब्रह्म है? ये तो भगवान् हैं इनके सामने हजार वस्त्र पहने तो भी सब निर्वस्त्र हैं, इनसे काहे का संकोच? जल से बाहर सब गोपियां आयीं, अपने वस्त्रों को लेकर चली गयीं।

     वस्त्र-हरण के इस प्रसंग पर कुछ लोग कहते हैं कि ऐसा कृष्ण ने क्यों किया? कोई स्त्री नहा रही हो उसके वस्त्रों को लेकर कदम्ब पर चढ़ जाना ये कोई सभ्य पुरूष का लक्षण तो नहीं है, ये तो आचरणहीन पुरूष का लक्षण है, धर्म के संस्थापक कृष्ण ही जब ऐसे है फिर समाज पर इसका क्या असर होगा? सज्जनों! कृष्ण चरित्र की इस झांकी को हम तीन रूपों में देखे, ध्यान दिजिये- यदि श्रीकृष्ण भगवान् हैं तो भगवान् को कोई दोष नहीं लगता।

             समरथ कहुं नहिं दोष गोसाई।
             रवि पावक सुरसरि की नाई।।

     तुलसीदासजी ने तो कहा- में समर्थ उसी को कहुँगा जिसमें कोई दोष नहीं हो, कपड़े चुरा कर ले गये और मांगा तो दे दिया, अब आप कहें यदि भगवान् मानव बनकर आये हैं तो ऐसा क्यों किया? ये तो कामी पुरुष का लक्षण है, यदि श्रीकृष्ण को हम मनुष्य ही समझें तो भी इसमें कोई दोष नहीं है, कृष्ण ने गोपियों के वस्त्र जब चुराये तब से उनकी उम्र थी साढ़े पांच वर्ष की।

     और साढ़े पांच वर्ष के बालक के मन में काम की भावना नहीं होती, साढ़े पांच वर्ष का क्या जाने काम वासना को? वस्त्र चुराकर ले गये और मांगा तो दे दिया, तीसरा भाव बड़ा सुन्दर है, कृष्ण है ईश्वर, गोपी है जीव, वस्त्र है अविधा, कृष्ण रूपी ईश्वर ने जीव रूपी गोपियों के अविधा रूपी वस्त्र को चुराया, किसी लहंगा-फरिया को नहीं चुराया, उस अविधा रूपी वस्त्र में ज्ञान भरकर उन्हें वापिस कर दिया, ये ही चीरहरण की लीला का एक तात्पर्य है।

     बन्धुओं ! परमात्मा मेरे ह्रदय में हैं और परमात्मा आपके ह्रदय में भी हैं, पर ना आपको दीखता है ना मुझे दीखता है क्यों? क्योंकि परमात्मा के और हमारे बीच में अज्ञान का एक काला पर्दा पड़ा है, ये काला पर्दा हटे तो परमात्मा के दर्शन हो।

                            जय श्री कृष्ण

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