मधुरा भाषा संस्कृत भाषा।
मित्रों श्रावण पूर्णिमा को हम संस्कृत दिवस के रूप में मनाते हैं।ऐसी परम्परा शदियों से चली आ रही है।हम भी इसके निर्वहन में अपने आपको पीछे नहीं रखना चाहते।आज के दिन अनेक संस्थानों, संगठनो के द्वारा गोष्ठियों का आयोजन कर इसके महत्व पर खूब बढ़ चढ़ कर वार्ता होती है।ऐसा लगता है मानो अब हर किसी के घर में आम बोलचाल की भाषा संस्कृत ही होगी।गौर करने वाली बात ये है कि सभी कार्यक्रम किसी भी सामाजिक संगठन या व्यक्ति विशेष के द्वारा ही प्रायोजित होते हैं किसी सरकारी या गैरसरकारी शिक्षण संस्थान के द्वारा नहीं,या होता भी है तो इनकी संख्या इतनी ही होती है जितने में अनुपस्थिति का भान न हो।वह भी सिर्फ आज ही केवल चंद लोगों के द्वारा खानापूर्ति के रूप में।कोई मीडिया भी इसके प्रचार प्रसार से परहेज ही करती है।अगले दिन इसे तब तक के लिये विराम दे दिया जाता है जबतक पुनः संस्कृत दिवस न आ जाये।ऐसे मे यह प्रश्न लाजिमी है कि क्या इतने से हम इस अजर अमर भाषा को संरक्षित कर पायेंगे?क्या विद्यार्थियों या अभिभावकों से इतर चंद तथाकथित संस्कृत प्रेमियों के इस विषय में थोड़ी वार्षिक चर्चा कर लेने मात्र से इसका संरक्षण या पोषण हो पायेगा?वह चर्चा भी मात्र कर्मकांड या पूजा पाठ के रूप में ही इसके उपयोग की।जबकि विदित हो भारतीय भाषा वाङ्गमय में सर्वोपरि स्थान रखने वाली संस्कृत अपने ह्रदय में विश्व के तमाम विषयों को संरक्षित कर चल रही है।बात चाहे विज्ञान के तीनो शाखाओं की हो,चिकित्सा की हो,भूगोल,इतिहास या राजनीति की हो,वास्तु की हो,गणित की हो,अभियंत्रण की हो,तंत्र की या ज्योतिष की हो सबके सब शास्त्रों का विशाल संग्रह भरा पड़ा है।न्याय या दर्शन के जितने सार्थक और सारगर्भित ग्रंथों का जखीरा संस्कृत में है उतना अन्यत्र शायद ही मिलेगा।फिर भी हमने इसे मात्र पूजा पाठ और ब्राह्मणों की भाषा मात्र कहकर इससे अपने आपको अलग कर रखा है।यह भी कह सकते हैं कि चंद लोगों के द्वारा इसके संबंध में दुष्प्रचार कर इसके विनष्ट करने का असफल प्रयास भी किया गया हो।विद्यालयों या महाविद्यालयों में भी इसे आवश्यक न मानते हुये ऐच्छिक भाषा के रूप में ग्रहण का प्रावधान रखा गया।दोष किसे दिया जाय सरकार को,सरकारी तंत्र को या आम जन को?आईये इस बार फिर से हम चंद तथाकथित संस्कृत प्रेमी और आचार्य मिलकर संस्कृत की महत्ता पर कुछ लिख लें,कुछ बोल लें ,कुछ वेबीनार में सम्मिलित होकर अपना भड़ास निकाल लें।फिर मिलेंगे आज ही के दिन अगले वर्ष इसी विषय पर कुछ नवीन भड़ास निकालने के क्रम में।संस्कृत का कुछ तो भला हो ही जायेगा।जयतु संस्कृतम्।
......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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