आज मेरा शहर
खामोश दिखता है
दिन और रात
उदास दिखती है
इंसान इंसानियत से
फरामोश दिखता है
नहीं दिखते जलते हुये दीप
किसी दीवट पर
स्नेह के अब तो कहीं
हर एक बात बकवास लगती है
जहां तक जाती है नजर
जहाँ में अँधेरे का साम्राज्य दिखता है
साँसों से साँसों का मिलन
अब तो स्वप्निल आभास दिखता है
हँसी ठहाकों का मौसम
काली रात लगती है
रहकर मौन पद्मनाभ
तू तो सच में औरों से खास दिखता है
तेरे मन को पढ़ना सबके बस की नहीं अब तो
हर क्षण बदला हुआ इतिहास लगता है।।
.....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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