चलते चलते
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निराला के भिक्षुक ने भी
खाक छाना था दर दर
मुंशी प्रेमचंद की धनिया भी
बिक चुकी थी अनेको बार
बनिये की दुकान पर
एक कप चाय के लिये।
टालस्टाय की माँ का आँचल भी
लहरा चुका था सरेबाजार कै बार
शेक्सपियर ने भी घूँट घूँट आँसुओं को
पीया था जार बेजार
तुलसी को भी देना पड़ा था जवाब
स्वांतःसुखाय कहकर
शिवकृपा नहीं होती तो शायद
रामबोला ही रह जाते।
फिर मैं कौन
कहाँ
कब
कैसे
कितने दिनो से
किसे बताऊँ
क्यूँ बताऊँ
कबसे
कैसे कितना घिसता हूँ
कलम की नोक
सबकुछ बोलती हैं
आड़ी तिरछी रेखाएं
जिन्हें खींचता रहता हूँ
दिन रात कागज के पन्नो पर
समझ सकते तो समझ लो।
पढ़ सकते तो पढ़ लो
भावनाओं के गहन गह्वर में
पैठकर।
.........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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