मैं
जा रहा हूँ
तुम्हें छोड़कर
इस विश्वास के साथ
कि कभी लौटकर अगर
आना हुआ मिलेंगे फिर उसी
लब्बो लुआब के साथ ऐ शहर।
खुश रहो आबाद रहो
जिन्दाबाद रहो
भले हमें बरबाद कहो
पर हमने जो सजाया
सँवारा निखारा तेरे स्वरूप को
रंग रोगन लगाकर भूलना मत
तुम मुझे याद करना भले यादों में ही सही
ऐ शहर।
मेरा क्या मैं क्या जो कल था
आज भी हूँ आगे भी रहूँगा
लूँगा नहीं कुछ दिया है आगे भी
कुछ न कुछ दूँगा ही
हाँ गर लूँगा तो सिर्फ तेरे आँसू
बदले में दूँगा खुशियाँ हजार चाहे
पड़े मुझे भटकना दर बदर ऐ शहर।
बस एक विनती है मेरी
हो सके तो इतना दुआ करना रब से
न छूटे गाँव अब कभी हमसे
सजायें आँचल माता का
एक बार फिर अपने दम से
जो बिखर कर हो गया था तार तार
जिसके दम तुम लगाते थे ठहाके
हजार ऐ शहर।
..........मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
Comments
Post a Comment