*सनातन धर्म के ऊपर वामपंथी आक्षेपों का उत्तर*
आजकल एक वामपंथी लेख बहुत प्रचारित हो रहा है, जिसमें कुछ प्रश्न (आक्षेप) किये गए हैं। धर्मविरोधी जन ये प्रश्न करते तो हैं किंतु कभी स्वयं उसका उत्तर नहीं खोजना चाहते। इसका कारण यह है कि इनमें जिज्ञासा अथवा ज्ञान के प्रति श्रद्धा नहीं होती है, मात्र विवाद के आधार पर अपना अस्तित्व दृढ़ करने का निरर्थक प्रयास करते हैं। वैसे तो इनमें से अधिकांश प्रश्न अत्यंत ही निम्नस्तरीय हैं तथा कोई भी सामान्य अध्ययन वाला व्यक्ति इनका उत्तर अत्यंत सरलता से दे सकता है, किन्तु मैं अपनी ओर से कुछ शास्त्रीय आलोक में इनका समाधान कर रहा हूँ -
प्रश्न ०१ - सभी देवी देवताओं ने भारत में ही जन्म क्यों लिया? क्यों किसी भी देवी देवता को भारत के बाहर कोई नहीं जानता ?
उत्तर ०१ - सर्वप्रथम तो यह गलती सुधारें कि देवताओं ने जन्म लिया है। उनका जन्म लौकिक नहीं होता इसीलिए वे अवतार लेते हैं, जन्म नहीं। जहां उनके जन्म की चर्चा आयी है वहां अवतार का ही अर्थ समझना चाहिए। साथ ही, असंख्यात देवताओं में सभी अवतार नहीं लेते, कुछ देवता ही अवतार ग्रहण करके लोककल्याण का कार्य सम्पादित करते हैं। दूसरी बात यह, कि भारत के बाहर भी लोग देवताओं को जानते हैं, किन्तु भिन्न नाम-रूप-गुण के साथ। उदाहरण के लिए, सूर्यतत्व को नियंत्रित करने वाली शक्ति को भारतीय संस्कृति में आदित्य या सविता कहते हैं, तो यूनान में उसे Apollo कहा जाता था। मिस्र में सूर्य का नाम Ra, चीन में Xihe तथा जापान में Amaterasu है। जिस प्रकार से अलग अलग भाषा के लोग पशु, पक्षी, प्राकृतिक संसाधन एवं पारिवारिक सम्बन्धों को अलग अलग नाम से बुलाते हैं, किन्तु तात्पर्य वही रहता है, वैसे ही अलग अलग देशों में भी अलग अलग नाम, रूप एवं विधियों से देवताओं को पुकारा जाता था। देवताओं का यह विशेष गुण है कि उपासक की भावना के अनुसार वे स्वरूपधारण कर लेते हैं। जिसने जितना आध्यात्मिक विकास किया, जिसकी प्रज्ञा का स्तर जैसा रहा, उसने देवताओं के स्वरूप का वैसा ही अनुभव किया।
अब प्रश्न इस बात का है कि देवताओं ने भारत में ही क्यों अवतार ग्रहण किया !! आप हमें यह बताईये, कि जब आप हवाई जहाज से उतरते हैं, तो सीधा अपने घर पर ही उतरते हैं या विमान के अड्डे पर ? जब आप रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं तो वे आपको सीधा आपके सटीक गंतव्य तक पहुंचाती है या अपने सर्वाधिक उपयुक्त निर्धारित स्थान पर ?
ठीक उसी प्रकार, अवतार भी इधर उधर न होकर भारतभूमि में ही होते हैं, क्योंकि यह सर्वाधिक उपयुक्त स्थल है। भारतभूमि की संस्कृति, समाज, कौशल, पवित्रता एवं ज्ञान-विज्ञानसम्मत व्यवस्था के कारण ही यहां दिव्यावतार होते हैं।
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
(ब्रह्मपुराण, अध्याय १९, श्लोक - ०१)
जो समुद्र से उत्तर दिशा, एवं हिमालय से दक्षिण दिशा की ओर स्थित है, उस वर्ष का नाम भारतवर्ष है, जहां की प्रजा भारती(य) कहलाती है।
अतः सम्प्राप्यते स्वर्गो मुक्तिमस्मात् प्रयाति वै।
तिर्य्यत्वं नरकं चापि यान्त्यतः पुरुषा द्विजाः॥
इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यं चान्ते च गच्छति।
न खल्वन्यत्र मर्त्त्यानां कर्म्मभूमौ विधीयते॥
(ब्रह्मपुराण, अध्याय - १९, श्लोक - ०४-०५)
इसी (भारत) से व्यक्ति स्वर्ग जाता है, यहीं के मोक्ष के लिए प्रस्थान करता है, पशु पक्षी आदि की योनि में भी यहीं से जाता है एवं इसे ही कर्मभूमि निर्धारित किया गया है, इसके अतिरिक्त कहीं अन्यत्र यह बात नहीं है।
अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।
यतो हि कर्म्मभूरेषा यतोऽन्या भोगभूमयः॥
अत्र जन्मसहस्राणां सहस्रैरपि सत्तम।
कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्यसंचयात्॥
(ब्रह्मपुराण, अध्याय - १९, श्लोक - २३-२४)
इस पूरे जम्बूद्वीप में भारतवर्ष अत्यंत श्रेष्ठ है, क्योंकि यह कर्मभूमि है, जबकि अन्य सभी भोगभूमि हैं। हज़ारों जन्मों के पुण्य जब संचित होते हैं तब किसी किसी को यहां मनुष्य योनि में जन्म मिलता है।
क्षारोदधेरुत्तरं यद्धिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
ज्ञेयं तद्भारतं वर्षं सर्वकर्मफलप्रदम्॥
अत्र कर्माणि कुर्वन्ति त्रिविधानि तु नारद।
तत्फलं भुज्यते चैव भोगभूमिष्वनुक्रमात्॥
भारते तु कृतं कर्म शुभं वाशुभमेव च।
तत्फलं क्षयि विप्रेन्द्र भुज्यतेऽन्यत्रजन्तुभिः॥
अद्यापि देवा इच्छन्ति जन्म भारतभूतले।
संचितं सुमहत्पुण्यमक्षय्यममलं शुभम्॥
कदा लभामहे जन्म वर्षभारतभूमिषु।
कदा पुण्येन महता यास्याम परमं पदम्॥
(नारद पुराण, पूर्वभाग, प्रथमपाद, अध्याय - ०३, श्लोक - ४६-५०)
खारे समुद्र से उत्तर एवं बर्फ के पर्वत (हिमालय) से दक्षिण के भूभाग को सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला भारतवर्ष जानना
चाहिए। हे नारद ! यहां तीन प्रकार के (उत्तम, मध्यम, अधम) कर्मों को करने के बाद उसके फल को अन्य भोगभूमि में क्रमशः भोगा जाता है। भारत में किया गया शुभ अथवा अशुभ कर्म प्राणियों के द्वारा अन्यत्र (स्वर्ग-नरक आदि सूक्ष्म लोकों में, पुष्कर-शाल्मलि आदि सूक्ष्म द्वीपों में अथवा अमेरिका-रूस आदि म्लेच्छ देशों में) भोगा जाता है। आज भी देवतागण इस भारतभूमि में जन्म लेने के लिए, महान् निर्मल अक्षय पुण्य के सञ्चय हेतु इच्छा करते हैं। वे कहते हैं - "वह दिन कब आएगा, जब हम भारतभूमि में जन्म लेंगे और कब महान् पुण्यबल से परमपद (मोक्ष) को प्राप्त करेंगे !!
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः।
इज्यायुतवणिज्यादि वर्तयन्तो व्यवस्थिताः॥
तेषां सव्यवहारोऽयं वर्तनन्तु परस्परम्।
धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानान्तु स्वकर्मसु॥
(मत्स्यपुराण, अध्याय - ११४, श्लोक - १२-१३)
(इस भारत में) विभागपूर्वक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं उनके मध्य में शूद्रों का वास है जो यज्ञ, रक्षा, व्यापार आदि के माध्यम से व्यवस्थित हैं। वे सभी आपस में अच्छा व्यवहार करते हुए अपने अपने वर्णानुसार कर्म करते हुए, धर्म-अर्थ-काम में लगे रहते हैं।
भारते तु स्त्रियः पुंसो नानावर्णाः प्रकीर्तिताः।
नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्माणि कुर्वते॥
परमायुः स्मृतं तेषां शतं वर्षाणि सुव्रताः।
(कूर्मपुराण, पूर्वभाग, अध्याय - ४७, श्लोक - २१)
भारत में (ब्राह्मणादि) अलग अलग वर्णों वाले स्त्री-पुरुष रहते हैं जो विभिन्न देवताओं के पूजन और विभिन्न आजीविका वाले कर्मों को करते हैं। उनकी परमायु सौ वर्षों की बताई गई है।
(यदि यहां वर्ण का अर्थ शारीरिक रंग से लें, तो भी देखते हैं कि भारत में गोरे, काले, और सांवले, तीनों रंग के लोग बहुतायत से हैं)
शुभानामशुभानां च कर्मणां जन्म भारते।
पुण्यक्षेत्रेऽत्र सर्वत्र नान्यत्र भुञ्जते जनाः॥
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृतिखण्ड, अध्याय - २६, श्लोक - १५)
(अत्यंत प्रबल) शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप भारत में यदि जन्म मिले तो इस पुण्यक्षेत्र में ही उसका फल भोगना होता है, अन्यत्र नहीं। (सामान्य के लिए म्लेच्छ भूमि में जन्म मिलता है और वहीं भोगते हैं, किन्तु अत्यंत तीव्र प्रारब्ध के पाप-पुण्य भारत में ही क्षीण किये जाते हैं)
अवतारो हरेः प्रोक्तो भूभारहरणाय वै।
पापात्मनां विनाशाय धर्मसंस्थापनाय च ।
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, स्कन्ध -०४/अध्यायः ०१, श्लोक - २८)
भगवान् विष्णु के अवतार पृथ्वी के (अधर्मजन्य) भार को दूर करने के लिए होते हैं। पापियों के नाश एवं धर्म की पुनः स्थापना के लिए होते हैं।
जिन म्लेच्छ देशों के लोग, सौ साल पहले तक ढंग से नहाना और धोना नहीं जानते थे, जहां तीन सौ वर्ष पहले तक लोकशिक्षण के लिए सार्वजनिक विद्यालय नहीं थे, जिन देशों में गैलेलियो को केवल इसीलिए दण्डित किया गया कि उसने कुछ अलग बात कही, वहां देवताओं का अवतार होगा ही क्यों ? हमारे यहां तो अनादिकाल से ही निरंतर ज्ञान विज्ञान की भौतिक एवं दिव्यस्तरीय परम्परा रही है। भला आपने सुना है कि रूस या अमेरिका के राष्ट्रपति हमारे देश में आए हों और सीधा किसी अंधेरी गुफा में प्रवेश कर गए हों ? अथवा हमारे ही देश के राष्ट्राध्यक्ष किसी और देश में गए किन्तु वहां के अधिकारियों से न मिलकर किसी खदान में घुस गए ? नहीं न ... वैसे ही देवता भी वहीं और उसी के पास आते हैं, जहां उनके अनुकूल व्यवस्था और उद्देश्यपूर्ति में सहायक लोग होते हैं।
प्रश्न ०२ - जितने भी देवी देवताओं की सवारियां हैं, उनमें सिर्फ वही जानवर क्यों हैं जो कि भारत में ही पाये जाते हैं ? ऐसे जानवर क्यों नहीं, जो कि सिर्फ कुछ ही देशो में पाये जाते हैं, जैसे कि कंगारू, जिराफ आदि ?
उत्तर ०२ - यह प्रश्न ही बड़ा अज्ञानमूलक है। जब भारत में अवतार होंगे तो वैसे पशु ही वाहन बनाये जाएंगे जो भारत में उपलब्ध हों। वैसे मैं एक बात स्पष्ट कर दूं कि देवताओं के वाहन लौकिक पशु नहीं होते हैं, वे पशु पक्षी के जैसे दिखते हैं किंतु धर्ममय होते हैं। धर्म के ही आधार पर देवतत्व स्थित होता है। भगवान् शिव के वाहन नंदीश्वर हैं, जो बैल के रूप में धर्म ही हैं।
वृषो हि भगवान् धर्म:
(स्कन्दपुराण)
देवी का जो सोमनन्दी नामक वाहन है, वह आकृति से सिंह है, किन्तु वह भी धर्ममय ही है।
सिंहं समग्रं धर्ममीश्वरम्
(वैकृतिक रहस्य)
ऐसे ही विष्णुदेव के गरुड़, सरस्वती देवी का हंस, आदि सभी ज्ञानादि के प्रतीक धर्मरूप ही हैं। वैसे देवताओं के अनेक दिव्य विमानों का वर्णन भी शास्त्रों में व्यापकता से प्राप्त होता है।
दूसरी बात, इस प्रश्न में विरोधाभास है। देवताओं के वाहन केवल भारत में ही पाए जाते हैं, ऐसी बात नहीं है, अपितु कंगारू, जिराफ आदि तो एक दो देशों में ही पाए जाते हैं, किन्तु देवताओं के वाहन बहुतायत से लगभग पूरी पृथ्वी में पाए जाते हैं। आजकल लोगों के स्वार्थ, प्रदूषण, शिकार आदि के कारण बहुत स्थानों की जैव विविधता संकट में पड़ गई है किंतु हम आज भी देख सकते हैं कि देवताओं के वाहन जिस आकृति को धारण करते हैं वे भारत के अतिरिक्त भी अन्य अनेकों देशों में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हैं।
उदाहरण के लिए - गंगादेवी का मगरमच्छ, गणेश जी का चूहा, कुमार कार्तिकेय का मोर, देवी का सिंह, विष्णु भगवान् का गरुड़, यमराज का भैंसा, इन्द्र का हाथी और घोड़ा, शनिदेव का कौवा, सरस्वती का हंस, अग्निदेव का भेड़ा, वायुदेव का हिरण आदि प्राणी तो लगभग सारे भूमंडल पर पाए जाते हैं। शिव जी का वृषभ भी पहले व्यापकता से उपलब्ध था किंतु अब म्लेच्छों के प्रभाव से भारत में ही गोवंश संकट की स्थिति में है।
प्रश्न ०३ - सभी देवी देवता हमेशा राज घरानों में ही जन्म क्यों लेते थे ? क्यों किसी भी देवी देवता ने किसी गरीब या शूद्र के यहां जन्म नहीं लिया ?
उत्तर ०३ - आप पहले तो यह स्पष्ट करें कि आप पूछना क्या चाहते हैं ? गरीब के यहां जन्म नहीं लिया, या शूद्र के यहां जन्म नहीं लिया ? क्या तात्पर्य है ? गरीब अलग है, शूद्र अलग है। गरीबी का शूद्र होने से कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ ये नकली शोषण का रोना बन्द करो। सनातनी शास्त्रों में कहां लिखा है कि शूद्र को गरीब ही रहना चाहिए, शूद्र धन संग्रह नहीं कर सकता है आदि आदि ? कहीं नहीं लिखा है ऐसा। हां, यह अवश्य लिखा है कि ब्राह्मण को अकिंचन होना चाहिए, धनसंग्रह से बचना चाहिए, त्यागमय अपरिग्रही जीवन बिताना चाहिए, और इस बात के सैकड़ों प्रमाण मिलेंगे। समाज के नब्बे प्रतिशत कौशल कृत्य एवं आजीविकायें शूद्र के लिए धार्मिक रूप से आरक्षित हैं, जिन्हें यदि ब्राह्मण अपना ले तो दोषी होगा।
रही बात गरीब की, तो किसी भी वर्ण का व्यक्ति गरीब हो सकता है। धनी होना अथवा दरिद्र होना तो निजी प्रारब्ध का विषय है, इसमें शूद्र या ब्राह्मण की बात नहीं है। हमारे देश में तो हरिश्चंद्र, नल, युधिष्ठिर, सुरथ, द्युमत्सेन, आदि पुरातन चक्रवर्ती राजाओं एवं महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी जैसे बड़े बड़े शासकों ने भी अपने जीवन में कई कई बार घोर दरिद्रता एवं अभाव झेला है। हां, इसके बाद भी उन्होंने अन्यायपूर्ण तरीके से किसी शूद्र के धन को छीना नहीं।
भगवान् यूं ही कहीं सोते जागते अवतार नहीं ले लेते हैं। जगत्पिता के माता-पिता बनने के लिए सहस्रों वर्षों की अपार तपस्या एवं भक्ति लगती है। जैसे द्रोण और धरा ने तपस्या की, जैसे कश्यप और अदिति, स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा, कर्दम एवं देवहूति, दक्ष एवं प्रसूति, मेना एवं हिमालय ने तपस्या की, तब जाकर उनके घर दिव्यावतार हुए। तो भगवान् का प्राकट्य कहाँ होगा यह तो तपस्यारत भक्तों के आधार पर निश्चित होता है किंतु अवतार के बाद भगवान् अपने भक्तों के प्रति कृपा करने में भेद नहीं करते। वे विदुर, शबरी, कुब्जा, गणिका, उद्धव, व्याध, निषाद, सुदामा, सुग्रीव, अक्रूर, मोरध्वज, आदि सबों पर कृपा करते हैं। और हां, उसका अवतार तो मनुष्य के अतिरिक्त मछली, कछुआ, हंस, सर्प, सिंह, वाराह, अश्व आदि अनेक योनियों के रूप में होते रहता है, यह उनकी इच्छा एवं अवतार के उद्देश्य का विषय है कि कब कौन सा स्वरूप धारण करेंगे। आपलोग जैसी अनर्गल शंका करते हैं, उससे स्पष्ट है कि कभी वास्तव में शंका समाधान हेतु प्रयास नहीं करते। वैसे एक बात पूछूँ ? बौद्धों का आदि ललितविस्तर ग्रंथ यह क्यों कहता है कि बुद्धावतार केवल ब्राह्मण या क्षत्रिय कुल में ही हो सकता है ?
प्रश्न ०४ - पौराणिक कथाओं में सभी देवी देवताओं की दिनचर्या का वर्णन है, जैसे कि कब पार्वती ने चंदन से स्नान किया, कब गणेश के लिये लड्डू बनाये, गणेश ने कैसे लड्डू खाये.. आदि। लेकिन जैसे ही ग्रंथों की स्क्रिप्ट खत्म हो गयी, भगवानों की दिनचर्या भी खत्म... तो क्या बाद में सभी देवी देवताओं का देहांत हो गया ? अब वो कहाँ है ? उनकी औलादें कहाँ है ?
उत्तर ०४ - पहली बात तो यह कि पुराणों में किसी की "दिनचर्या" का वर्णन नहीं है। पुराणों में ही पुराणों के लक्षण और परिभाषा बताई गई है, पुराणों के एक, पांच एवं दस लक्षण होते हैं।
एक लक्षण में - कल्याणकारी मार्ग का उपदेश है।
पञ्चलक्षणों में - सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित का स्थान है।
दस लक्षणों में - सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति एवं आश्रय का स्थान आता है।
चूंकि सर्वाधिक प्रसिद्ध पांच लक्षण ही हैं, इसीलिए उनका सामान्य परिचय दे देता हूँ। शास्त्रों के नानाविध विषय एवं रहस्य कोई संस्थान बना लेने से, आधुनिक पढ़ाई करके शोध विद्यार्थी या पीएचडी करने से, अथवा समितियों से सम्मानित होकर नहीं गम्य होते। कोई परिवार, समाज, परिषद्, संघ या समिति बनाने से भी शास्त्रों का संरक्षण नहीं होता। मूल परम्परागत आचार्यपीठ एवं शिष्यबल का संरक्षण एवं संवर्धन किये बिना कोई आधारभूत लाभ नहीं हो सकता है।
अनुवादों की वर्तमान शैली ने मूल परिभाषा एवं धारणा को विकृत करने का अक्षम्य अपराध किया है। गूगल से माइथोलॉजी का अर्थ पूछो तो पौराणिक बताता है। हमारे शास्त्रों से पूछो तो सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित के वर्णन से युक्त ग्रंथों को पुराण कहते हैं, ऐसा बताते हैं। इसी को यदि अलग-अलग देखें तो आंग्ल में Origin of Universe, Expansion of Universe, Origin of Life, Systematic division of Time with Theory of Relativity, Chronological order of Events and History आदि के समकक्ष कह सकते हैं।
अंग्रेजी में पढ़कर कितना उन्नत और वैज्ञानिक लगा न ? जबकि संस्कृतनिष्ठ हिंदी में लगा होगा कि पता नहीं क्या क्या कह दिया। संस्कृतनिष्ठ हिंदी में कहें तो अंधविश्वास और माइथोलॉजी लगती है किंतु अंग्रेजी में कहें तो वैज्ञानिक लगता है, यही हमारे समाज की शिक्षित मूर्खता का प्रमाण है। मैं समझ नहीं पाता कि माइथोलॉजी में पौराणिक क्या है एवं पुराणों में माइथोलॉजी क्या है। दो नितांत भिन्न विषय एवं सन्दर्भों का पर्याय रूप में प्रयोग करने का उद्देश्य मात्र सनातनी समाज को सनातनी ज्ञान एवं गौरव से घृणास्पद रीति के द्वारा वंचित रखना ही है।
अब दूसरी बात, पुराणों के संस्करण प्रत्येक ४३,२०,००० वर्ष में, द्वापरांत के समय, किसी योग्य देवतुल्य विद्वान् को वेदव्यास के पद पर स्थापित करके नवीनीकृत किये जाते हैं, जिनमें कुछ पाठभेद के साथ अलग अलग कल्पों का वर्णन होता है। किस कल्प में क्या क्या हुआ, पूरी दिनचर्या का एक एक विवरण, एक एक बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। भविष्य पुराण का मत है कि कल्पों के विस्तार और एक एक का हिसाब असंभव है। कल्प की क्षमता ब्रह्मा के एक दिन के बराबर है। आप ठीक ठीक बता सकते हैं कि आपके पूरे जीवन में कौन सी घटना ठीक किस दिन हुई थी ? नहीं न ... केवल मुख्य मुख्य बातों की तिथि बता सकते हैं। किंतु ९० प्रतिशत के विषय में केवल घटना बता पाते हैं, दिन नहीं। वैसे ही ब्रह्मा के एक एक दिन यानी कल्प में हिसाब नहीं रखे जाते।
केवल मुख्य मुख्य कल्पों के बात उल्लिखित हैं। वैसे भी सौ करोड़ रामायण एवं सौ करोड़ पुराण संहिता में पृथ्वीलोक को मात्र आठ दस लाख तक मिले हैं। हज़ार में बस एक रुपया। तो एक एक बात पृथ्वी वालों को बताई नहीं जा सकती, क्योंकि उनकी क्षमता और अधिकार उतने का नहीं है। सरकार जब बजट निकालती है तो केवल रकम बताती है, एक एक नोट का नंबर नहीं बताती। जब हम अपने इस क्षुद्र जीवन की सामान्य घटनाओं में एक एक दिन का हिसाब नहीं बता सकते तो गूढ़ लीलाओं का एक एक कल्प का हिसाब कैसे रखेंगे ? वर्तमान ब्रह्मा के ही जीवन में अभी तक छत्तीस हज़ार कल्प बीत चुके हैं। उनके नामों तक की गणना सम्भव नहीं है, घटनाओं की बात तो दूर है। मैंने अनेकानेक ग्रंथों के शोध से अभी तक मात्र तीन चार सौ कल्पों के नाम खोजे हैं। केवल वर्तमान ब्रह्मा के भुक्त कल्पों में से मात्र एक प्रतिशत के नाम ...
पूर्वकाल में भी देवता ऐसे सड़क पर घूमते नहीं रहते थे। उस समय भी केवल तपोबल से युक्त अधिकारी को ही उनके दर्शन होते थे। तो देवताओं की स्थिति आज भी वही है, तो पहले थी। पूर्वकाल में लोग अधिक संस्कार और सद्गुणों से युक्त होते थे इसीलिए देवताओं के साक्षात्कार का लाभ बहुतों को मिलता था। अब इसका अभाव हो गया है, ऐसे लोगों की संख्या कम हो गयी है, इसीलिए देवताओं के प्रत्यक्ष सानिध्य का लाभ गिने चुने महात्माओं को ही मिलता है। देवता भी हैं और दैत्य भी। दैत्यों की औलादें आज भी धर्म पर प्रहार कर रही हैं, एवं देवताओं की औलादें उनका प्रत्युत्तर दे रही हैं।
प्रश्न ०५ - ग्रंथों के अनुसार पुराने समय में सभी देवी देवताओं का पृथ्वी पर आना-जाना लगा रहता था, जैसे कि किसी को वरदान देने या किसी पापी का सर्वनाश करने। लेकिन अब ऐसा क्या हुआ जो देवी देवताओं ने पृथ्वी पर आना बंद ही कर दिया ?
उत्तर ०५ - ऐसा नहीं है कि पहले देवगण बराबर पृथ्वी पर आते जाते ही रहते थे। वे तो आवश्यकता के अनुसार ही आवागमन करते हैं। पहले धर्मात्मा अधिक थे, तुम जैसे देश और धर्म के द्रोही कम थे, इसीलिए देवताओं की धर्मसम्मत रीति से उपासना करने वालों की संख्या अधिक होने से देवताओं का वरदान आदि देने के लिए आना जाना अधिक होता था। अब आवश्यकता कम है, तो उस हिसाब से ही आवागमन करते हैं। पहले भी देवताओं का आवागमन होता था तो वे सबको नहीं दिखते थे, अपितु जिससे कार्य है, उसी के सामने प्रकट होते थे, आज भी वे जब आते हैं तो केवल विशेष व्यक्तियों को ही दर्शन मिलता है, सार्वजनिक रूप से सबके सामने नहीं आते हैं।
न देवा यष्टि(दण्ड)मादाय रक्षन्ति पशुपालवत्।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम्॥
(महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय - ३५, श्लोक - ३३)
देवता लाठी लेकर किसी की रक्षा नहीं करते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे सद्बुद्धि से युक्त कर देते हैं। (उसी प्रकार जिसे नष्ट करना चाहते हैं, उसे दुर्बुद्धि दे देते हैं। रावण, दुर्योधन, कंस आदि के नाश का प्रारम्भ उनकी दुर्बुद्धि से ही हुआ)
प्रश्न ०६ - जब भी कोई पापी पाप फैलाता था, तो उसका नाश करने के लिये खुद भगवान् किसी राजा के यहां जन्म लेते थे। फिर 30-35 की उम्र तक जवान होने के बाद वो पापी का नाश करते थे, ऐसा क्यों ? पापी का नाश जब भगवान खुद ही कर रहे है तो 30-35 साल का इतना ज्यादा वक्त क्यों ? भगवान सीधे कुछ क्यों नहीं करते, जिस प्रकार उन्होंने अपने खुद के ही भक्तों का उत्तराखण्ड में नाश किया ?
उत्तर ०६ - इस प्रश्न से ही यह स्पष्ट है कि प्रश्नकर्ता केवल निजी द्वेष से प्रश्न कर रहा है, न कि किसी जिज्ञासा से। साथ ही उसने कभी धर्मग्रंथों का मुख्यपृष्ठ भी नहीं देखा है तभी ऐसे प्रश्न कर रहा है। तीन चरणों में इसका उत्तर देता हूँ।
१) भगवान् "जब भी कोई पापी पाप करता है", तब अवतार ले लेते हैं ऐसा नहीं है। पापियों को दण्ड देने के लिए उन्होंने शासन एवं राजा की व्यवस्था की है।
गुरुरात्मवतां शास्ता राजा शास्ता दुरात्मनाम् ।
इह प्रच्छन्नपापानां शास्ता वैवस्वतो यमः ॥
गरुडपुराण, प्रेतकाण्ड (धर्मकाण्ड), अध्याय - ४६, श्लोक - ०८)
आत्मतत्व के जिज्ञासु पर उनका गुरु शासन करता है, अनुचित आचरण करने वालों पर राजा शासन करता है (उन्हें नियंत्रित करता है चाहे वे बात से समझें, या लात से)। जो लोग यहां पर राजा की दृष्टि से छिपकर पाप करते हैं, उनपर सूर्यपुत्र यमराज शासन करते हैं। यही मत स्कन्दपुराण, महाभारत, नारदस्मृति, आदि का भी है।
पापियों को दण्ड देने का काम पहले तो राजा का है, फिर यमराज का है। यदि कोई व्यक्ति वरदान आदि के दुरुपयोग से अत्यंत प्रबल हो जाए, उसकी नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करने में राजा आदि लौकिक शासक एवं यमराज आदि दिव्य शासक भी समर्थ न हो सकें, तब ऐसी स्थिति में, देवताओं एवं भक्तों की विशेष प्रार्थना पर ही भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं। अथवा स्थितिभेद से यदि किसी व्यक्ति को दण्डस्वरूप राक्षस, वृक्ष, शिला या पशु आदि होने का श्राप मिला हो एवं उसका उद्धार केवल भगवान् के ही द्वारा निश्चित किया गया हो, तभी भगवान् के अवतार लेते हैं।
२) भगवान् बिना अवतार लिए ही दुष्टों का संहार कर सकते हैं, जैसा कि उन्होंने सुमाली, मधु, कैटभ आदि कई दैत्यों को बिना किसी अवतार के ही सीधे देवासुरसंग्राम आदि के अवसरों पर मारा था। हां, यदि विशेषरूप से अवतार लिया हो तो भी सदैव ३०-३५ वर्ष की आयु तक प्रतीक्षा नहीं करते हैं। श्रीकृष्ण के रूप में भगवान् ने कुछ दिनों की आयु से ही राक्षसों का संहार प्रारम्भ कर दिया था। दस वर्ष की भौतिक आयु तक वे पूतना, तृणावर्त, अघासुर, बकासुर आदि अनेकानेक राक्षसों का शमन कर चुके थे। श्रीराम के रूप में भी भगवान् ने ताड़का आदि का संहार चौदह वर्ष की आयु में ही किया था। भुशुण्डि महारामायण में तो ब्रह्माजी ने श्रीरामावतार के कई बाललीलाओं का वर्णन करते हुए भगवान् श्रीराम ने अत्यंत बाल्यकाल में ही जिन राक्षसों का वध किया है, उनके नाम और घटनाओं का वर्णन किया है।
३) भगवान् कई बार संसार में लम्बा समय इसीलिए व्यतीत करते हैं क्योंकि उनका कार्य केवल अधर्मियों का नाश करने का ही नहीं है, अपितु धर्ममार्ग की स्थापना करने का भी है। स्वयं श्रीहनुमान् जी प्रभु श्रीराम जी उपासना करते हुए कहते हैं कि - हे प्रभो ! आपकी यह जो लीला है, यह जो अवतार है, वह केवल राक्षसों के वध के लिए नहीं है। वह मनुष्यरूप में इसीलिए है, ताकि मानवीय आदर्शों का आचरण करते हुए आप मनुष्यों को उसी आदर्श की शिक्षा दें।
मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणम्
रक्षोवधायैव न केवलं विभो:
(श्रीमद्भागवत महापुराण, पञ्चम स्कंध, अध्याय - १९, श्लोकार्द्ध - ०५)
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