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वंदे बोधमयं नित्यम्।

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गतांक से आगे-----
अपने पीछे के आलेख में मैं चर्चा कर रहा था जीवन के तीन प्रारंभिक पाठशालाओं की,जिनका अस्तित्व ही आज समाप्तप्राय है।आज आँचलवाली माँ का प्रतिशत कम होता जा रहा है।आज अनुशासन प्रिय पिता का प्रतिशत भी कम दीखता है।गुरु से रूपांतरित सर का गुरुगांभीर्य भी समाप्तप्राय हो चुका है।ऐसे में राम जैसे पुत्र की कल्पना कोरी कल्पना ही रह गई है।गुरु कैसा हो इस संबंध में वर्णन करते हुये महाकवि तुलसी लिखते हैं------
वंदे बोधमयं नित्यम् गुरुं शंकर रूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोपि चंद्रः सर्वत्र वन्द्यते।।
गुरु का स्वरूप शंकर सरीखा होना चाहिये, जो बिल्कुल टेढे चंद्रमा को भी त्रैलोक्य पूज्य बना देता है।एक गुरु हम हैं जो एक थोड़ा शैतान छात्र मिला नहीं कि हम उससे अपने आपको अलग कर लेते हैं।कारण स्पष्ट है हममे शंकर जैसा गुरुगांभीर्य नहीं है।हम ध्यानी नहीं, शंकर ध्यानी हैं।जब ध्यान ही नहीं तो धारणा की बात कहाँ।फिर बिना ध्यान और धारणा के समाधि की स्थिति कहाँ।तो न ध्यान न धारणा न समाधि फिर शंकर नहीं।जब शंकर नहीं बन सकते तो गुरु गांभीर्य आयेगा कैसे।बिना गांभीर्य के गुरुत्व की प्राप्ति असंभव ।परिणाम राम के जन्म का अभाव।जब राम नहीं तो राम राज्य कहाँ?हम बड़ी सहजता से कह देते हैं पुत्र अब पुत्र नहीं रहा।मैं पूछता हूँ जब माता माता नहीं रही,पिता पिता नहीं, गुरु गुरु नहीं तो भला पुत्र पुत्र कैसे हो सकता है?वह तो कुपुत्र होगा ही न।
रोपै बिरवा नीम को आम कहाँ ते होये।
इसलिये सच में यदि भारत को रामायण काल का भारत देखना चाहते हैं तो आँचलवती माँ और अनुशासक पिता के साथ ही शंकर रूपी गुरु  बनना होगा तभी भारतीय संस्कृति की रक्षा हो पायेगी हर घर में राम जैसा पुत्र जन्म लेगा फिर राम राज्य की कल्पना को साकार होने से दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती।अतः वर्त्तमान परिवेश में आवश्यकता इस बात की है हम फिर से अपने घरो़ में रामचरिमानस की न केवल स्थापना करें बल्कि उससे स्वयम् जुड़ें और अपने बच्चों को भी जोड़ें।इसकी व्यवस्था कोई सरकार नहीं करेगी आपको स्वयम् करना होगा अपनी खोई अस्मिता की प्राप्ति हेतु भारत को विश्वगुरु बनाने हेतु ,अपनी संस्कृति और संस्कार के संरक्षण हेतु।
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@पद्मनाभ*********

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