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वन्दे बोधमयं नित्यम्।

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वंदे बोधमयं नित्यम् गुरुं शंकर रूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोपि चंद्रःसर्वत्र वंद्यते ।।
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आज निराला साहित्य परिषद् एवं मानस मंच के तत्वावधान में महामना गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती का आयोजन किया गया।इस पावन अवसर पर यद्यपि मैं एक श्रोता की हैसियत से गया था किन्तु अपने आत्मीय आयोजक एवं मंच के संचालक भाई राजीव पाठक जी के आग्रह को नकार नहीं सका और गोस्वामी जी को समर्पित अपने गद्यांजलि के क्रम में अपने विचारों को भी उद्भाषित किया।महामना की अमर कृति श्री राम चरित मानस के बालकाण्ड में श्री राम के बाल्यकाल का वर्णन करते हुये उन्होंने एक सामान्य मानव से महामानव बनने की बात बतलाते हुये लिखा है-----
प्रात काल उठि के रघुनाथा 
मातु पिता गुरु नावहिं माथा।।
संस्कृत के विद्वानों ने भी कहा है-----
अभिवादन शीलस्य नित्यम् वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्द्धंते आयुर्विद्या यशोबलम्।।
अर्थात् राम नित्यप्रति प्रातः जागने के उपरांत सर्वप्रथम अपनी माताओं को,पिता को और गुरुचरणों को नमन करते थे।आगे उनके जीवन में इसका प्रभाव दिखलाते हुये महाकवि कहते हैं-----
गुरुगृह गयौ पढ़न रघुराई अल्पकाल विद्या सब पाई।
अर्थात् जब राम गुरुकुल में विद्या अध्ययन हेतु जाते हैं तो अल्पवय में ही सारी विद्याओं का अर्जन कर लेते हैं।यहाँ तक बात समझ में आती है।माता पिता एवं गुरु का आशीर्वाद प्रत्यक्ष दीखता है।किन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि जीवन का आरंभ जिन तीन पाठशालाओं से होता है वे क्या आज भी वर्त्तमान हैं?जवाब यदि हाँ है तो फिर राम पैदा क्यों नहीं हो रहे?जवाब यदि ना में है तो प्रश्न यह कि आखिर ये तीन पाठशालायें कहाँ विलुप्त हो गई ं? आइये विचारें इसे।प्रथम पाठशाला माँ का आँचल जो कि अब नहीं है।द्वितीय पाठशाला पिता का अनुशासन ,इसका भी अभाव,तृतीय पाठशाला गुरु ,जो अब रहे नहीं।तो फिर राम जैसे पुत्र की कल्पना हम कैसे कर सकते हैं?माँ बनी ममी जिसका हिन्दी रूपांतरण मृत ,पिता डैडी बने इसका भी हिन्दी रूपांतरण डेड अर्थात् मृत गुरु पहले बने शिक्षक तबतक तो कुछ ठीक पर अब तो हो गये सर जिसका हिन्दी अर्थ महाशय।इनकी भी गुरुता समाप्त।क्योंकि ये अकेले महाशय तो हैं नहीं।
शेष आगे क्रमशः----
@पद्मनाभ*********

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