💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐जानामिधर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्मं
न च मे निवृत्तिः।
केनापि देवेन ह्रदि स्थितेन यथा नियुक्तोस्मि
तथा करोमि।।
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जब धर्माधर्म की बात चलती है तो मानव यह कहकर अपने मनोभाव व्यक्त करता है कि मैं सब जानता हूँ।किन्तु क्या करूँ ,न तो धर्म में मेरी प्रवृत्ति है और न ही अधर्म से निवृत्ति ही हो पाती है।ऐस लगता है मानो कोई देवता हमारे भीतर बैठा है जो मुझे ऐसा करने को प्रेरित करता है।वस्तुतः मानव का यह कहना सत्य ही है।वह देव और कोई नहीं ये उस मानव मन के भीतर बैठी उसकी कामना होती है जिसके वशीभूत हो वह आचरण करता है।कहता है मेरा मन ऐसा करने को कहा इसलिये मैंने ऐसा किया।अर्थात् मानव मन के वशीभूत होता है ,मन मानव के वशीभूत नहीं होता।जिस दिन मन मानव के वशीभूत हो जाये उस दिन ये जान लेना चाहिये कि अब हमारे ऊपर परमपिता की अहैतुकी कृपा आनी आरंभ हो चुकी है।एतदर्थ येन केन प्रकारेण हमें अपनी कामनाओं पर विजय प्राप्त करने को सतत प्रयत्नशील रहना चाहिये।इन कामनाओं के कारण ही हम नानाविध पाप कर्मों में निरत रहकर धर्म की प्रवृत्ति से विमुख होते हैं और संसार में दुःख का कारण बनते हैं।अतः इससे निवृत्ति हेतु ही भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा क्षेत्रे क्षेत्रे धर्मं कुरु का आधान किया गया है।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐वन्दे बोधमयं नित्यम्💐💐💐💐
@पद्मनाभ**********
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