तपती रेत ने राहत की साँस ली
आखिर आज तूने प्यास जो बुझाई
आँखे तरस गई थीं तेरे मनोहारी रूप को देखे बिन
सिहर उठा चितवन तेरे कोमल स्पर्श पा
पर घबराहट है पता नहीं कब तक साथ रहेंगे हम
इसीलिये शायद मेरे तेज थिरकते पाँव थम से गये
फिर भी खुश हूँ कुछ देर ही सही सुकून तो मिला
अंतःसलिला के वाह्य सलिल रूप को निहार कर
विष्णुपाद तृप्त हुआ उभय तट संयोग से।
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@पद्मनाभ*********
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