बारात सज धज कर
दुल्हन के घर प्रस्थान को तैयार
सूचना मिली
दूल्हे के भाई की अर्थी
सज रही है
बाजा मौन हो गया
बत्ती बुझ गई
बाराती कोस रहे भगवान को
पानी फेर दिया
क्या होगा अब जरा बोलो
उसका
चटकारे लेकर खाने वाले थे
हम जिस पकवान को
आज रात रुक जाते
कल ले जाते तुम
दुल्हे के भाई के प्राण को
सारा मजा किरकिरा हो गया
दो घूँट हलक के नीचे
गई थी अभी
अब क्या फिर से
ऐसी मस्ती छायेगी कभी
भाभियों बहनो के संग
होकर अधनंग
नाचने को तैयार मेरे
ढेरो अंतरंग
बेचारे मायूस हो गये।
.....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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