टोल नाका
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बुधन अस्वस्थ हो गया
खुद से चलने के लायक भी
अब नहीं रहा
मंगरु ने दौड़कर पड़ोसी से कहा
बाबु जरा फोन कर देते
नीली बत्ती वाली गाड़ी वाले को
जो सड़क पर बिना रुके
भागती चली जाती है
शायद बुधन अब रुकने वाला नहीं
गाड़ी आती है
कुछ लोग बुधन को टाँग कर
नीली बत्ती वाली गाड़ी में
सवार कर देते हैं
मंगरु भी साथ बैठकर
चल देता है
गाड़ी रुकती है
कुछ सफेदपोश
कुछ हरितपोश
हाँथों में अनेक यंत्र लिये
आते हैं
नब्ज टटोलते हैं
आगे पीछे दायें बायें
घुमाकर बुधन के शरीर को
जाँच लेते हैं
वापस मुँह लटकाये
चल देते हैं
सारी बोलकर
तब तक बुधन पूछ बैठता है
मैं कहाँ हूँ
मंगरु धीरे से बोलता है
टोल नाके पर
रसीद कट गई है
गाड़ी अब गंतव्य तक
जायेगी आगे
बुधन मौन हो जाता है
दुबारा मंजिल तक पहुँचते
निस्तब्ध निढाल शरीर लिये।।
.......मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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