मैं बह रहा था
भाव में
वो बह रहा था
बहाव में
हम दोनो ही
बह रहे थे
प्रकृति प्रदत्त
उतार चढ़ाव में
अंतर सिर्फ इतना सा था
मैं सवार था
नाव में
वो बह रहा था
नदी के बहाव में
मेरी भावनाओं का
उतार चढ़ाव भी
होता था
लहरों के अंतर से
वो भी कभी ऊपर कभी नीचे
हो जाता था
लहरों के झुकाव में
गंतव्य भी एक से थे
दोनो के
अपनी मंजिल तक
किनारा भी लगना था
कहीं न कहीं दोनो को
भाव में बहें या बहाव में
बहा तो रहा था हम दोनो को
खेवनहार ही
फर्क बस इतना था
मेरी भावनायें बह रह रही थीं
उसके सिर्फ शरीर बह रहे थे
पानी के बहाव में।।
......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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