कलम बिक रही है।
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हाँ !आज कलम बिक रही है
शायद इसलिये क्योंकि
इसका निर्माण कल कारखानों में हो रहा है
अब वो समय कहाँ रहा
जब खेत की मेढ़ पर अपने से उपजे
सरकंडों को तोड़कर लाता था
चाकू की तेज धार से
तरास कर कलम बनाता था
फिर स्याह काजल को घोरकर
स्याही बनाता था और तब
बोर बोर कर ताड़ के पत्तों पर
एक एक शब्द सजाता था
इसीलिये शायद कलम की मोल
समझ पाता था
तब बाजार कहाँ था जनाब
घर की चौखट या आम की अमराईयों में
या फिर मंदिरों के दरो दीवार पर ही
उपजा करते थे सारे ख्वाब
तब मंच नहीं सजते थे
वारांगनाओं के नृत्य के लिये
महफिलों में ही घुंघरुओं की
झनकार झनकते थे और
फना हो जाते थे दर्शक झूमकर
इसीलिये शायद अब कामायनी ने
घूँघट ओढ़ लिया है क्योंकि वह
वारांगना नहीं थी जिसका मोल लग सके
सजी हुई महफिल में
यशोधरा भी हो गई मौन
क्योंकि अब गौतम बुद्ध बनने को
तत्पर नहीं दिखते
मधुशाला में भी ताला लटक रहा
क्योंकि पीने वाले अब रहे नहीं
चेतना के पंख भी अब फड़फड़ा रहे हैं
उर्द्धवरेता को धराशायी करने को
मेघ भी मंडरा रहे दूत बनकर
खोजते कालीदास को
कृष्ण का बालपन ढूँढ रहा बाबा सूर को
लोरियाँ सुनाने को
बेटियाँ खोजती हैं माता सुभद्रा को
अपनी रूह में
रेत पर उतरने को बेचैन बादल भी
निहारते हैं राह आचार्य जानकी के
आह्वान की
भिखमंगों की आश टिकी है
निराला के कलम पर
नहीं लगता पूरी होंगी इनकी उम्मीदें
क्योंकि आज कलम बिक रही है
हर रोज जनमते फैकटरियों से
सजी बाजारों में
खरीददार खड़े हैं नित लिये
नोटों की गड्डियाँ हजारों में।।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐@मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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