सबकुछ लेलक लपेट
ई कोरोना
अब तो नींदो न आवे
खाली पेट
का जनि कहिया होव हे
अब लछमी से भेंट।
चौका चुल्हा
सभे हथ पड़ल उपास
लेले मनमें एक विशवास
कुबेर के खजाना के
कहिया खुल हे गेट।
हमनी के महराज से तो
एकदमे न होव हे भेंट
अयलन हल तबकी
कहलन हल आयम जलदी
न करम लेट।
बकि का कहुँ दीठ गड़ौले ही
दुआरी पर असनी बिछौले ही
का जनि कखनी आ जैतन महराज
ले ले ओने से झोली में अनाज कहतन
बाबा लेऊँ आ गेली करेला अपने से भेंट।
माफ करूँ जे होयल गलती
पाँच बरिस में करीत ही बिनती
एक बेर फिर से दे देउँ अपन अशीष
पी के सब खीस
वादा करित ही ई बेर मिले मे
अब अपनन्हीं से
एकदम न होयेत लेट
न करे पड़त हमर वेट
कसम कमल के।।
.......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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