डरता हूँ अब अखबार से।
रोज सबेरे डरता हूँ
अब अखबार से।
खबर न हो कोई
बच्ची के बलात्कार से।
किसी लफंगे के बहकावे मे
कहीं भाग गई कोई लड़की।
हस्त्र क्या होगा कल उसके
डरता हूँ इस सोच से।।
मिली है नंगी लाश
किसी यौवना की।
बीती होगी कल की रात
उसके कैसे डरता हूँ
इस सोच से।।
एक बेरहम पति ने
कर दिया कत्ल
अपनी पत्नी का
उसे रोकती थी शराब गोशी से।
एक नवजात बच्ची फेकी
रात मिली है झाड़ी मे।
बेदर्द है वह माँ कितनी
डरता हूँ इस सोंच से।।
बाहर किया बेटे, बहू ने
घर से वृद्ध माँ,बाप को।
चाहिए दौलत अपने नाम
डरता हूँ इस सोंच से।।
.........मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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