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न भाषा न भाव।

न भाषा न भाव फिर भी बातें हो रही समभाव की दिखा रहे हैं ताव ऐंठ रहे हैं मूँछें करते बात हर क्षण हमें अपनाव की।। न वैचारिक शाम्य नहीं दिखती सौम्यता व्यवहार में जलती ज्वाला क्रोध की अपशब्दों की लिये माला हाँथों में खड़े रहते सदैव तत्पर स्वागतार्थ।। सुधारवादी नीति के समर्थक निरर्थक हुजूम लगाने को बेचैन करते भागदौड़ पटरियों पर समाज के अपनी फ्रेमयुक्त तस्वीर लिये।। बातों में साफगोई मंच पर किस्सा वही पुराना कोई धार धार जार जार घड़ियाली आँसू बहाता हर कोई दादा जी के हाँथी का सिक्कड़ लिये।। 💐💐💐💐💐@पद्मनाभ💐💐💐💐💐

आत्ममंथन।

आत्ममंथन। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 गर झांकने का मन करे झांक लो एक बार अपने गिरेबान में गर देखने का मन करे आँखें बंद कर बस एक बार देख लो अपनी आत्मा के भीतर गर रोकना ही चाहते हो किसी को तो एकबार देख लो रोक कर अपने मन को गर चाहते हो बदलना तो देख लो बस एक बार बदलकर अपनी सोंच को मिलना चाहते हो अगर किसी से तो देख लो मिलकर बस अपने आप से मिल जायेगा वो सब जो तुमने अब तक चाह रखा है पाने को अब तक।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐@पद्मनाभ💐💐💐💐💐

स्वर्गवासी।

कलिकाल की महिमा भी अपार है महाकाल की कृपा से सबका बेड़ा पार है साधक हो या हो आराधक या फिर कोई हो सद्कर्म का बाधक घातक या संघातक नर्क के सब दरवाजे बंद हैं तभी तो यमलोक के कर्मचारी अब फिक्रमंद हैं प्राण के शरीर से निकलते ही खुल जाते हैं स्वर्ग के द्वार हो जाता है सबका बेड़ा पार कल के धरावासी बन जाते हैं सीधे स्वर्गवासी क्या देखा है लिखा आपने कहीं नर्कवासी।। 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐💐 💐💐💐💐💐 💐💐💐💐 💐💐💐 💐💐 💐       💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐💐

अंतर।

जिस दिन इस अंतर को समझ जाओगे उस दिन तुम ईश्वर के दिये वरदान को पाओगे सिर्फ मनु की संतान होने से तुम मनुष्य नहीं कहलाओगे तुमसे तो भले ये पशु हैं बुद्धिहीन कहलाते हैं पर अपने नायक के इशारों को समझ जाते हैं।। 💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐💐

साहित्यकार।

साहित्यकार होते हैं सर्जक भावनाओं के होते हैं अर्जक परिमार्जित शब्दों से देते हैं एक नया कलेवर समाज को आईना दिखाकर सत्य का ना काहु से दोस्ती ना बैर जो दिखा जिसमें बस झट से लेखनी ने दिया उकेर कल्पना में जीते हैं संवेदनाओं के घूँट पीकर शत्रु या हो मित्र मिलते हैं गले सबसे भविष्य की उम्मीदें लेकर हित का साथ न छूटे कभी इसीलिए तो रचते हैं साहित्य कुगढ़ को सुगढ़ बनाने में समय जाया करते हैं लगातार शायद इसीलिए संज्ञाधारक हैं ये साहित्यकार।। 💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐💐

सूर्यार्घ्य।

दीपावली में सारा घर साफ हो गया छठ तक पूरी तरह पवित्र भी हो जायेगा आस्था और विश्वास का साथ जो है अब शायद गंदगी नहीं फैलेगी क्योंकि गंगा भी अब मैली नहीं रही नमामी गंगे जो हम कह रहे सूरज का गुस्सा भी नरम हुआ है शाम से सुबह तक इसका अहसास भी होता है पूरे दिन के तेवर का क्या इतना तो चलेगा ही कभी विषुवत् तो कभी मकर पर वह रहेगा ही हम सब समझते हैं बूझते भी हैं फिर भी कभी गर्मी तो कभी नर्मी की शिकायत करते ही हैं पता नहीं एक सा कब होगा मौसम जब सब मिलकर कहेंगे हम एक हैं हम नेक हैं ये तो वो कहता था अनेक हैं यह भी सत्य है कि हम अनेक भी हैं पर एक हैं देखो न सूरज के बारह नाम हैं फिर भी है तो सूरज ही आखिर कोई आदित्यार्घ्य रव्यार्घ्य मित्रार्घ्य भानवार्घ्य मारिच्यार्घ्य विरंचिर्घ्यार्घ्य क्यों नहीं देता ?सब देते हैं बस सूर्यार्घ्य ही। 💐💐💐💐💐@मनो http://xn--81b.com/ 💐💐💐💐

माँ गंगे।

करता हूँ मैं नमन तुम्हारी माँ गंगे स्वीकार करो उद्धार किया है सगर तनय का मेरा बेड़ा पार करो।। शिव की जटा से बहनेवाली विष्णुचरण में वास किया दीन दुखी पापी प्राणी.हो सबका बेड़ा पार किया।। पान किया अनुपान किया स्पर्श किया स्नान किया नाम लिया फिर तर गये चाहे श्रद्धा का ही दान दिया।। भूलोक नही है भुवर्लोक तक महिमा तेरी न्यारी गाते हैं सब ऋषिगण मिलकर मैं जाऊँ तेरी बलिहारी।। अवतरण दिवस तेरा है माता बलि बलि जाऊँ हे जगत्राता तर जाता है भवसागर से सानिध्य तेरा जो पाता।। सुन ले पुकार कर क्षमादान हूँ सुत तेरा नादान पुत्र कुपुत्र भले हो जग में माता होती सदा महान।।                             🎂🎂नमामि गंगे🎂🎂                              💐💐मनोज💐💐