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सूर्यार्घ्य।

दीपावली में सारा घर साफ हो गया
छठ तक पूरी तरह पवित्र भी हो जायेगा
आस्था और विश्वास का साथ जो है
अब शायद गंदगी नहीं फैलेगी
क्योंकि गंगा भी अब मैली नहीं रही
नमामी गंगे जो हम कह रहे
सूरज का गुस्सा भी नरम हुआ है
शाम से सुबह तक इसका अहसास भी होता है
पूरे दिन के तेवर का क्या
इतना तो चलेगा ही
कभी विषुवत् तो कभी मकर पर वह रहेगा ही
हम सब समझते हैं बूझते भी हैं
फिर भी कभी गर्मी तो कभी नर्मी की
शिकायत करते ही हैं
पता नहीं एक सा कब होगा
मौसम
जब सब मिलकर कहेंगे
हम एक हैं
हम नेक हैं
ये तो वो कहता था
अनेक हैं
यह भी सत्य है
कि हम अनेक भी हैं पर एक हैं
देखो न
सूरज के बारह नाम हैं
फिर भी है तो सूरज ही
आखिर कोई आदित्यार्घ्य
रव्यार्घ्य मित्रार्घ्य भानवार्घ्य
मारिच्यार्घ्य विरंचिर्घ्यार्घ्य
क्यों नहीं देता ?सब देते हैं
बस सूर्यार्घ्य ही।
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