दीपावली में सारा घर साफ हो गया
छठ तक पूरी तरह पवित्र भी हो जायेगा
आस्था और विश्वास का साथ जो है
अब शायद गंदगी नहीं फैलेगी
क्योंकि गंगा भी अब मैली नहीं रही
नमामी गंगे जो हम कह रहे
सूरज का गुस्सा भी नरम हुआ है
शाम से सुबह तक इसका अहसास भी होता है
पूरे दिन के तेवर का क्या
इतना तो चलेगा ही
कभी विषुवत् तो कभी मकर पर वह रहेगा ही
हम सब समझते हैं बूझते भी हैं
फिर भी कभी गर्मी तो कभी नर्मी की
शिकायत करते ही हैं
पता नहीं एक सा कब होगा
मौसम
जब सब मिलकर कहेंगे
हम एक हैं
हम नेक हैं
ये तो वो कहता था
अनेक हैं
यह भी सत्य है
कि हम अनेक भी हैं पर एक हैं
देखो न
सूरज के बारह नाम हैं
फिर भी है तो सूरज ही
आखिर कोई आदित्यार्घ्य
रव्यार्घ्य मित्रार्घ्य भानवार्घ्य
मारिच्यार्घ्य विरंचिर्घ्यार्घ्य
क्यों नहीं देता ?सब देते हैं
बस सूर्यार्घ्य ही।
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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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