साहित्यकार होते हैं सर्जक
भावनाओं के होते हैं अर्जक
परिमार्जित शब्दों से देते हैं
एक नया कलेवर समाज को
आईना दिखाकर सत्य का
ना काहु से दोस्ती ना बैर
जो दिखा जिसमें बस
झट से लेखनी ने दिया उकेर
कल्पना में जीते हैं
संवेदनाओं के घूँट पीकर
शत्रु या हो मित्र मिलते हैं
गले सबसे भविष्य की उम्मीदें लेकर
हित का साथ न छूटे कभी
इसीलिए तो रचते हैं साहित्य
कुगढ़ को सुगढ़ बनाने में समय
जाया करते हैं लगातार
शायद इसीलिए संज्ञाधारक हैं ये साहित्यकार।।
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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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