कलिकाल की महिमा भी अपार है
महाकाल की कृपा से सबका बेड़ा पार है
साधक हो या हो आराधक या फिर कोई हो सद्कर्म का बाधक घातक या संघातक
नर्क के सब दरवाजे बंद हैं तभी तो
यमलोक के कर्मचारी अब फिक्रमंद हैं
प्राण के शरीर से निकलते ही खुल जाते हैं
स्वर्ग के द्वार हो जाता है सबका बेड़ा पार
कल के धरावासी बन जाते हैं सीधे स्वर्गवासी
क्या देखा है लिखा आपने कहीं नर्कवासी।।
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रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"
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