भारी था
भारी है
रहेगा आगे भी भारी
सब पर जनेऊधारी।
आजाद ही पैदा हुआ
आजाद सफर जीवन का
आजादी लेकर स्वप्न विदा हुआ
ब्रह्मलोक संसारी।
कुछ तो बातें खास रही हैं
आजादी से अबतक
सबके मन में आश रही हैं
ब्रह्मज्ञान विश्वास रहा है
चाहे नर हो या नारी।
कभी तोड़ा कभी जोड़ा
देखकर ऊँची उड़ान
कभी मुखमोड़ा
अंततः मन में चिंतन कर भारी
बनने को बेताब हुये
अब स्वयम् "जनेऊधारी"।।
.....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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