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देह विद्युत संरक्षण।



           ----:देह विद्युत्-संरक्षण:---
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      देह विद्युत् सबसे बहुमूल्य है। तीनों शरीरों (स्थूल, भाव ओर सूक्ष्म) की विद्युत् एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है। वे कम न हों और उनकी उत्तरोत्तर वृद्धि हो। इसके लिए आवश्यक है कि--
       कम-से-कम बोलना, अधिक-से-अधिक एकान्त में रहना, प्रकृति के समीप रहना, स्त्री-स्पर्श से अलग रहना, किसी के भी सिर पर हाथ न रखना, मस्तक का स्पर्श न करना, आवश्यक समझ कर ही किसी को आशीर्वाद देना, मूर्खों और दूषित संस्कार वालों से अलग रहना, अपने पैरों का स्पर्श न करने देना, विधवा स्त्री, रोगी, अपाहिज, कपटी व्यक्ति से तो कभी चरण-स्पर्श नहीं कराना चाहिए। ये तत्काल आतंरिक शक्ति का क्षय कर देते हैं। सबसे अधिक शक्ति सूक्ष्मशरीर में होती है। इन सबसे यह तुरन्त प्रभावित होती है जिसका प्रभाव चिन्तन-मनन, ध्यान-जप, पूजन आदि पर पड़ता है। शारीरिक विद्युत् को तो सबसे अधिक क्षीण करता है पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण। इसलिए साधकगण लकड़ी के खड़ाऊं का प्रयोग करते हैं। काठ के तख़्त पर सोते-बैठते हैं।
      आसन के विषय में भी बतलाना आवश्यक है। मृग-चर्म के आसन पर बैठकर ध्यान आदि करने से भाव (वासना) शरीर की विद्युत् नियंत्रित रहती है जिससे बुद्धि का विकास होता है। काले कम्बल पर बैठकर ध्यान आदि करने से तीनों शरीरों की विद्युत् शक्ति का किसी भी प्रकार क्षय नहीं होता है। ज्ञान, वैराग्य और सतोगुण का भी विकास होता है। व्याघ्र-चर्म के आसन पर बैठ कर ध्यान आदि करने से सूक्ष्मशरीर की विद्युत् शक्ति की वृद्धि और विकास होता है। समाधि में प्रवेश भी सहज होता है।
     

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रावण का काम तमाम।

रावण का काम तमाम । ****************** माना कि मैं अत्याचारी था देव मनुज सब पर ही भारी था। सीता का कर अपहरण  नारी का अपमान किया। प्रकृति विरुद्ध सब काम किया इसीलिये तो तुमने मृत्युदान दिया। मैं तो मरकर परलोक गया अपनी सत्ता सब सौंप गया। फिर भी हर वर्ष बुलाते हो पुतले को आग लगाते हो दुनिया को ये समझाते हो। रावण को मैंने जला दिया लंका का दीपक बुझा दिया। एक प्रश्न मैं तुमसे करता हूँ उम्मीदें प्रत्युत्तर की रखता हूँ। रावण तो जीवित रहा नहीं कुंभकरण भी बचा नहीं। लंका भी जलकर राख हुई मेघनाद की भी साख गई । फिर भी सीता अब क्यों रोती है नित नारी अपह्रत क्यों होती है? पुतले को आग लगा करके अपने को राम कहाते हो। बलात्कारिता निज सीता को बचा नहीं तुम क्यों पाते हो ? रामत्व तुम्हारा रहा नहीं या रावण है बचा कहीं? सौगंध तेरा तुझको देता हूँ जिस क्षण बन जाओगे तुम राम  होगा छिपे हुये रावण का काम तमाम। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"

टोटके।

*🥦तांत्रोत्क वनस्पति टोटके🥦* 🕉️🏹🚩🔔🐚📿🔱 छोटे-छोटे उपाय हर unघर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत् जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं।हमारे आसपास पाए जाने वाले विभिन्न पेड़-पौधों के पत्तों, फलों आदि का टोटकों के रूप में उपयोग भी हमारी सुख-समृद्धि की वृद्धि में सहायक हो सकता है। यहां कुछ ऐसे ही सहज और सरल उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है, जिन्हें अपना कर पाठकगण लाभ उठा सकते हैं। ♦बिल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है। ♦अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे। ♦नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा। ♦संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे। ♦आक की जड़ :...

कैसे उसे बुलाऊँ मैं

नयनो से हैं रूठी नीदें सपन कहाँ सजाऊँ मैं। दूर हो गइ रूह जिगर से वापस  कैसे  लाऊँ  मैं। सूख गये आँसू आँखों के कैसे  धार   बहाऊँ   मैं। सुनने वाला पास नहीं जब हालेदिल किसे सुनाऊँ मैं। बाती है पर स्नेह नहीं जब फिर कैसे दीप जलाऊँ मैं। रिसते हों जब जख्म ह्रदय में मरहम   कहाँ  लगाऊँ   मैं। हार गया हूँ तनहा रहकर कैसे   उसे   बुलाऊँ   मैं। फूलों की खुशबु जब आती दिल  को  कहाँ  सजाऊँ  मैं। ....मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"