----:देह विद्युत्-संरक्षण:---
*********************
देह विद्युत् सबसे बहुमूल्य है। तीनों शरीरों (स्थूल, भाव ओर सूक्ष्म) की विद्युत् एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है। वे कम न हों और उनकी उत्तरोत्तर वृद्धि हो। इसके लिए आवश्यक है कि--
कम-से-कम बोलना, अधिक-से-अधिक एकान्त में रहना, प्रकृति के समीप रहना, स्त्री-स्पर्श से अलग रहना, किसी के भी सिर पर हाथ न रखना, मस्तक का स्पर्श न करना, आवश्यक समझ कर ही किसी को आशीर्वाद देना, मूर्खों और दूषित संस्कार वालों से अलग रहना, अपने पैरों का स्पर्श न करने देना, विधवा स्त्री, रोगी, अपाहिज, कपटी व्यक्ति से तो कभी चरण-स्पर्श नहीं कराना चाहिए। ये तत्काल आतंरिक शक्ति का क्षय कर देते हैं। सबसे अधिक शक्ति सूक्ष्मशरीर में होती है। इन सबसे यह तुरन्त प्रभावित होती है जिसका प्रभाव चिन्तन-मनन, ध्यान-जप, पूजन आदि पर पड़ता है। शारीरिक विद्युत् को तो सबसे अधिक क्षीण करता है पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण। इसलिए साधकगण लकड़ी के खड़ाऊं का प्रयोग करते हैं। काठ के तख़्त पर सोते-बैठते हैं।
आसन के विषय में भी बतलाना आवश्यक है। मृग-चर्म के आसन पर बैठकर ध्यान आदि करने से भाव (वासना) शरीर की विद्युत् नियंत्रित रहती है जिससे बुद्धि का विकास होता है। काले कम्बल पर बैठकर ध्यान आदि करने से तीनों शरीरों की विद्युत् शक्ति का किसी भी प्रकार क्षय नहीं होता है। ज्ञान, वैराग्य और सतोगुण का भी विकास होता है। व्याघ्र-चर्म के आसन पर बैठ कर ध्यान आदि करने से सूक्ष्मशरीर की विद्युत् शक्ति की वृद्धि और विकास होता है। समाधि में प्रवेश भी सहज होता है।
Comments
Post a Comment