नारी सत्ता पर आए दिनो आघात की खबरों से लवरेज अखवारों के पन्नों को देखकर ऐसा लगता है मानो हमने अपने आपको पूरी तरह से तंगोतबाह करने का मन बना लिया है।हम यूं कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह तंगोतबाही सिर्फ हमारी नहीं अपितु सम्पूर्ण मानव जाति की होगी।क्योंकि हम जिस नारी शक्ति को तंगोतबाह करने पर तुले हैं वही हमारा उद्गम स्थल है।हम उसके जिन शारीरिक अंगों उर्द्ध्वाधःको अपना शिकार बनाते हैं हम शायद यह भूल जाते हैं कि वही अध्वांग जहाँ हमारा उद्गम स्थल है वहीं वह उर्द्धवांग हमारा पालक है।और हम क्षणिक पिपासा की भंगुर शांति हेतु अपनी ही इन जीवनदायिनी महायंत्रों को भग्न करने पर तुले हैं।
आज किसी की यही बिटिया कल किसी की बहु बनकर एक नई सृष्टि की रचना में संलग्न होगी।
एक बिटिया का नाश मतलब एक पूरी पीढ़ी का सर्वनाश।हम पढ़े लिखे वा मूर्ख चपाट सब प्रकृति प्रदत्त इन गुणों से परिचित हैं फिर भी ऐसे दुर्नीतिपूर्ण कृत्य से अपने आपको अलग नहीं रख पाते।और तो और संत का लवादा ओढ़कर भी सिर्फ तन के लिबास ही बदलते हैं मन वहीँ अनीतिपूर्ण विचारों वाले सरोवर में गोते लगाता रहता है,तभी तो आशाराम या रामरहीम अवतरित होते हैं।
यदि सही मायने में समाज को रामरहीम या आशाराम जैसे दरिन्दों से बचाना है और एक नये सुसभ्य समाज का निर्माण करना है तो अपने जनन एवं पालन पूर्ण शक्ति संपन्न महाशक्ति की रक्षा करनी होगी।इसे हम भारतवासी जिसके अंतस् में देवी आराधना के प्रति विशेष आस्था रहती है ,वही कर सकता है।क्योंकि भारत की नारी भोग्या नहीं पूज्या की संज्ञा से अभिहित होती है।आज जिस राम और कृष्ण की हम पूजा करते हैं उसे भी किसी नारी ने ही जन्म दिया था।जिस वाहेगुरु या पैगम्बर मुहम्मद को मानने वाले उन्हें अपना आराध्य मानते हैं उनका जन्म भी किसी नारी कोख से ही हुआ था।रामकृष्ण,विवेकानन्द जैसे महापुरुष भी किसी न कीसी नारी के ही कोख से पैदा हुये।आज के या पूर्व के सभी राष्ट्र के कर्णधार नेतृत्व में अग्रणी माननीय या सामान्य अथवा पुलिस प्रसाशन से जुड़े अधिकारियों को भी किसी न किसी माँ ने ही जन्म दिया है।इनके तथा हम सबके घर में भी किसी न किसी रूप म़े आज भी बेटियाँ पल रही हैं।जो लोग भी इस प्रकार के गर्हित कर्म में संलग्न हैं या होते हैं वे भी किसी न किसी माँ की ही संतान हैं।उनके घर में भी किसी न किसी रूप म़े बेटियाँ पल बढ़ रही हैं।कल्पना करें यदि ऐसे ही कुकृत्यों की शिकार इनकी अपनी संतानें होती हैं तो इनकी प्रतिक्रिया फिर क्या होगी।कुछ दिनों पूर्व कश्मीर की एक घटना याद आ रही है मुझे जब वहाँ के एक कद्दावर नेता की बेटी का अपहरण आतंकवादियों के द्वारा कर लिया गया था।बदले में भारत के जेल में बंद कुछ आतंकवादियों को तत्कालीन भारत सरकार के द्वारा रिहा करने का आदेश दिया गया था।चुकि बात एक बड़े नेता की थी इसलिये कदम भी बड़े उठे।आज बात एक आम इंसान की होती है इसलिये अपनी नकामी का ठिकरा चंद अफसरों ,पुलिस पदाधिकारियों के मत्थे फोड़ कर मामले को रफा दफा कर दिया जाता है।क्या इससे समस्या का समाधान संभव है?जब तक इसके लिये संस्कार परक शिक्षा की व्यवस्था नहीं होती हमें नहीं लगता कि इसका सहज समाधान निकल पायेगा।अब आवश्यकता इस बात की है कि सभी शिक्षण संस्थानों एवं सामाजिक संगठनों के माध्यम से हर घर में सामाजिक जागरण का कार्यक्रम निरंतर चलाया जाय।स्त्री पुरुषों के बीच हर रिश्ते की अहमियत बताई जाये।यदि अभी से इसके लिये हम जागरुक नहीं होंगे तो आनेवाले वक्त में स्थिति और भयावह होगी।हम जिस पुरुषत्व का दंभ भरते हैं वह यूँ ही धरा रह रह जायेगा।जिस प्रकार बलात्कार और हत्याओं का क्रम जारी है वैसे में जब नारी जाती ही नहीं रहेगी तो पुरुषों के जन्म क्या पुरुषों के कोख से होंगे?प्रकृति ने सृष्टि के विकासक्रम को गति प्रदान करने के ही इन महाशक्तियों को इस धराधाम पर स्त्री रूप में अवतरित किया है।यदि इसी प्रकार इनका अपमान होता रहा तो एकदिन इस धरा को स्त्रीविहीन होने से कोई रोक नहीं सकता।
शास्त्र वचन है....."यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता"।
......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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