सिर्फ मैं ही हूँ एकमात्र।
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बड़ी विचित्र स्थिति से यह काल खंड बीत रहा है।एक समय था जब किसी भी संगठन में नेतृत्व के लिये समाज से व्यक्तित्व का चयन किया जाता था।आधार होते थे समाज के लिये उनके द्वारा अबतक किये गये क्रियाकलाप।सामाजिक जनों के सुख दुःख में उनकी सहभागिता।शिक्षा या ज्ञान का स्तर।जीवन के सामाजिक अनुभव।कुल ,शील,आचार ,विचार,व्यवहार, एवं भावी सोंच।इसमें धनी या निर्धन कोई भी हो सकता था।निष्पक्ष कार्यशैली भी देखी जाती थी।इसका परिणाम दूरगामी होता था।वह चयनित व्यक्ति सहज भाव में नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता था।क्योंकि उसे भी इस बात का भान होता था कि यदि मेरे क्रिया कलाप में कहीं तनिक भी समाज की अपेक्षा के अनुरूप अंतर आया तो मेरे लिये यह आत्मग्लानि की बात होगी।जीते जी मृतवत् जीवन जीने को विवश हो जाऊँगा।वह इसे पेशा नहीं सेवाभाव से ग्रहण करता था।पद पर रहते पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ अपनी एवं समाज की गरिमा को बचाने का हर संभव प्रयास करता था।आज स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखती है।अब न चयन न मनोनयन हम यूँ कह सकते हैं कि नेतृत्व का हरण होता है।इसका आधार भूत गुण उसके झूठ,फरेब,धनबल,बाहुबल ही मूल होते हैं।शिक्षा,ज्ञान,अनुभव,निष्ठा ,विचार,चरित्र, कुल,शील एवं समाजिक सरोकार सब गौण होते हैं।वाक्चातुरी की प्रधानता दिखती है।परिणाम भी प्रत्यक्ष होते हैं।स्थायित्व का अभाव,सामाजिक विद्वेष,वैयक्तिक ईर्ष्या, वैचारिक शून्यता,शैक्षणिक स्तरहीनता, मानापमान समान,भाषाशैली अमर्यादित, इतने सारे दुर्गुणों के बाद भी स्वयम् को मर्यादित समझने का भावबोध एक विशेष गुण के रूप में परिक्षित होता है।हमारे विचार भी तदनुरूप मुंशी प्रेमचंद जी की शैली में"जैसी बहे बयार तैसी कीजै पीठ"वाली बन जाते हैं।काश वह पुरानी पद्धति आ पाती तो शायद एक स्वच्छ समाज का निर्माण होता।वर्तमान के कीचड़ की सड़ांध से निजात मिल पाता।
.......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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