अबला --सबला
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दादाजी ने घर चलाने को
पैसे दिये थे चंद
पैसे हो गये खतम
दादा जी के आते ही
बड़े प्यार से बोलीं
दादी और थोड़ीअबला।
मेरी पत्नी पढ़ी लिखी है
समझदार है हुजूर
मैंने ये सोचकर चंद पैसे दिये
ढंग से घर चलायेगी जरूर
पढ़ा लिखा इंसान हूँ
साहित्यिक जमात की पहचान हूँ
कलम चलाता हूँ
अपने आजू बाजू देखकर
जो समझ आता है लिख जाता हूँ
कवि सम्मेलनों में जाता हूँ
मंच पर सम्मान पाता हूँ
कभी रामनामी तो
कभी किनारीदार अंगवस्त्र भी पाता हूँ
हाँ एक बात है भाई
इसमें नकद नहीं होती कमाई
मंच तक जाने में अपनी जेब से
नकद राशि लगाता हूँ
इस बात को कभी समझ नहीं पाती लुगाई
लौटकर आते ही घर
मेरी पढ़ी लिखी प्राण प्यारी दौड़कर आई
आँखें तरेरी
होठ बिचकाये
हाँथ फैलाये
काकी के स्वर में बोली
जो कुछ भी कमाकर लाया है
सबला।।
@**********पद्मनाभ।।
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